अब बीते सोमवार को, जम्मू कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (state investigation agency) ने श्रीनगर की एक स्पेशल कोर्ट में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की. इसमें जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (jammu kashmir libration front )के तत्कालीन प्रमुख यासीन मलिक को सरला भट्ट ( sarla bhatt ) के अपहरण और हत्या का मुख्य आरोपी बताया गया है. अधिकारियों ने इस घटनाक्रम को “आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर” बताया और कहा कि यह “जम्मू-कश्मीर में पुराने आतंकी अपराधों की जांच में सबसे महत्वपूर्ण कामयाबियों में से एक” है.
यह मामला 18 मार्च 2024 को जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक के आदेश पर एसआईए को सौंपा गया था.
इस मामले के आरोपियों में यासीन मलिक शामिल हैं, जो अभी किसी अन्य मामले में न्यायिक हिरासत में हैं. एक अन्य आरोपी खुर्शीद अहमद चल्कू ( khurshid ahmed chalku ) हैं, जो फरार हैं और माना जाता है कि वो पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में जा छिपा हैं. चार्जशीट के मुताबिक़ तीन अन्य आरोपी – अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू – अब जिंदा नहीं हैं.
इन्डियन एक्प्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ चार्जशीट में कहा गया है कि “प्रत्यक्षदर्शी सबूत, मेडिकल और बैलिस्टिक जांच के नतीजे, आतंकी दावे वाला नोट मिलना, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, गवाहों के बयान और आसपास की परिस्थितियां मिलकर सबूतों की एक ऐसी ठोस और विश्वसनीय कड़ी बनाती हैं जो साबित करती है कि यह हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ जेकेएलएफ (JKLF) की खूनखराबा करने की साजिश का हिस्सा थी. इसका मकसद दहशत फैलाना और उन्हें कश्मीर घाटी से जबरन पलायन के लिए मजबूर करना था.” जांच में यह बात सामने आई कि 18 अप्रैल 1990 को भट का अपहरण किया गया था. “यासीन मलिक के निर्देशों पर” जेकेएलएफ से जुड़े चार आतंकवादियों ने उन्हें राइफल से गोली मारने से पहले शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया और उन पर हमला किया.
पुलिस ने कहा है कि यह घटना ” जेकेएलएफ के उस संगठित अभियान का हिस्सा थी, जिसका मकसद कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों की टारगेट किलिंग (चुनिंदा हत्या) करके दहशत फैलाना, बड़े पैमाने पर पलायन के लिए मजबूर करना और अपने अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाना था.”
जांचकर्ताओं ने आरोप साबित करने के लिए सुरक्षित गवाहों के बयान, स्वतंत्र चश्मदीदों के बयानों, मेमो, घटनास्थल की पहचान, मेडिको-लीगल सबूतों, शरीर पर गोली के कई प्रवेश और निकास घावों, गंभीर आंतरिक चोटों और शारीरिक प्रताड़ना के निशानों का सहारा लिया.
घटनास्थल से मिले एक नोट की भी जांच की गई, जिसमें जेकेएलएफ ने हत्या की जिम्मेदारी ली थी. हालांकि केन्द्रीय फोरेंसिक साइंस प्रयोगशाला (CFSL) नई दिल्ली यह पक्के तौर पर नहीं बता सकी कि लिखावट किस शख्स की है,” लेकिन पुलिस ने कहा कि घटना के तुरंत बाद छपी मीडिया रिपोर्टों से इस नोट की “स्वतंत्र रूप से पुष्टि” होती है.
एसआईए के मुताबिक़ , सबूतों से यह भी पता चला कि जेकेएलएफ ने “सरला भट को गलत तरीके से मुखबिर बताया था.” जेकेएलएफ का मानना सरला ने 8 अप्रैल 1990 को नरवारा में सुरक्षा बलों की छापेमारी में सरला की भूमिका थी . इस केस में जेकेएलएफ जिसमें के कई आतंकवादी पकड़े गए थे और भागते समय मोहम्मद यासीन मलिक घायल हो गया था. जांच में यह निष्कर्ष निकला कि यह आरोप “महज एक बहाना” था, जिसका इस्तेमाल पहले से तय टारगेट किलिंग ( target killing) को सही ठहराने के लिए किया गया था.
जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा 2008 में अपने ही मामलों के सर्वे के आधार पर तैयार की गई एक रिपोर्ट से पता चला कि 1989 से आतंकवादियों ने 209 कश्मीरी पंडितों की हत्या की थी – जिनमें से 109 की हत्या अकेले 1990 में हुई थी. वैसे कश्मीरी पंडित समूहों का कहना है कि यह संख्या इससे कहीं ज़्यादा है.













