लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के हाथों डिग्री से मना किया

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भारत के सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत
भारत के सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत
हैदराबाद में नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (national academy of legal studies and research ) से इस साल ( 2026 ) पास  होने वाले बैच के छात्रों का कहना है कि वे भारत के मुख्य न्यायधीश के पद पर बैठे न्यायमूर्ति  सूर्यकांत ( justice suryakant) के हाथों से स्नातक डिग्री नहीं लेंगे. इन छात्रों ने नलसर (NALSAR) यूनिवर्सिटी को पत्र लिखकर मांग की है कि वे अपने दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि  भारत के मुख्य न्यायाधीश (chief justice of india ) सूर्यकांत के नाम पर फिर से विचार करें.

यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर (vice chancellor), रजिस्ट्रार और फैकल्टी को संबोधित यह पत्र 23 जुलाई को सौंपा गया था. क्योंकि  दीक्षांत समारोह की तारीख अभी तय नहीं हुई है और मुख्य अतिथि के नाम पर अभी भी चर्चा चल रही है, इसलिए छात्र चाहते थे कि कोई भी फैसला लेने से पहले उनकी राय पर विचार किया जाए.

छात्रों की मुख्य आपत्ति जस्टिस सूर्यकांत  ( cji suryakant) की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ  के उस जवाब को लेकर थी, जो 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर “चलो संसद” मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई से जुड़ी दायर  याचिका पर दिया गया था.

छात्रों के पत्र के अनुसार, जब 22 जुलाई को एक वकील ने  सीजेआई सूर्यकांत   के सामने इस मामले की तत्काल सुनवाई के लिए बात रखी, तो सीजेआई  ने वकील से कहा,

“हमारा समय बर्बाद न करें और अपना समय भी बरबाद  न करें.”

पत्र में कहा गया है कि जब वकील ने कथित पुलिस कार्रवाई का वीडियो सबूत दिखाने की पेशकश की, तो चीफ जस्टिस  ने कहा,

“हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है , हमारे पास उन्हें देखने का वक्त  नहीं है.”

छात्रों ने एक अलग पत्र-याचिका का भी ज़िक्र किया जो पहले से ही सीबीआई के पास है. इसमें 20 जुलाई को जंतर मंतर और  संसद के रास्तों के आसपास  की  पुलिस कार्रवाई में सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने की मांग की गई है. इस याचिका में महिलाओं और बच्चों समेत 170 से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों के घायल होने और ‘डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ केस ( dk basu versus state of west  bengal case ) में तय सुरक्षा उपायों के संभावित उल्लंघन का हवाला दिया गया है.

दीक्षांत समारोह के महत्व पर ज़ोर देते हुए छात्रों ने लिखा कि यह ऐसा पल होना चाहिए जिसमें यूनिवर्सिटी के मूल्य – जैसे “संवैधानिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता, न्याय तक पहुंच और शिकायतों पर तर्कपूर्ण तरीके से ध्यान देना” – उसके फैसलों में झलकें.

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट विरोध-प्रदर्शन के समर्थन में प्रदर्शन करते हुए  नालसर लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों की फ़ाइल फ़ोटो. साभार : द हिन्दू
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट विरोध-प्रदर्शन के समर्थन में प्रदर्शन करते हुए नालसर लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों की फ़ाइल फ़ोटो. साभार : द हिन्दू

उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मानित व्यक्ति से डिग्री लेना सही नहीं लगेगा, जिनका हालिया सार्वजनिक व्यवहार प्रदर्शनकारी नागरिकों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता के गंभीर आरोपों को नज़रअंदाज़ करने वाला रहा हो.

छात्रों ने यूनिवर्सिटी से मुख्य अतिथि के चयन पर फिर से विचार करने और कोई भी अंतिम फैसला सुनाने या निमंत्रण भेजने से पहले पास आउट होने वाले बैच से सलाह-मशविरा करने को कहा है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर आगे चर्चा करने के लिए तैयार हैं – चाहे वह छात्र प्रतिनिधियों के साथ बैठक के ज़रिए हो या किसी और ऐसे तरीके से जिसे यूनिवर्सिटी सही समझे. खबरों के मुताबिक, 2026 बैच के करीब 70 छात्रों ने इस मांग-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे.  दो दिन बाद, 2027 से 2031 बैच के लगभग 380 और छात्रों ने भी अपना समर्थन दिया. नालसर  ने अभी तक दीक्षांत समारोह की तारीख का ऐलान नहीं किया है और न ही सीजेआई  सूर्यकांत के इसमें शामिल होने की पुष्टि की है.

आन्दोलन से सीजेआई सूर्यकांत से संबंध :  
उल्लेखनीय यह भी है कि भारत में  छात्रों और युवाओं के चल रहे  आंदोलन ‘ कॉकरोच जनता पार्टी ‘ ( cockroach janta party ) के  नामकरण का ताल्लुक भी सीजेआई की एक उस टिप्पणी से है जिसमें उन्होंने समाज के एक वर्ग को ‘ कॉकरोच ‘ की संज्ञा दी थी . इसी संदर्भ में  महाराष्ट्र  के मूल निवासी और विदेश में पढ़ाई के लिए गए अभिजीत दीपके ने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘ कॉकरोच जनता पार्टी ‘ के नाम से सोशल मीडिया पर अभियान शुरू किया  जो कुछ ही दिनों में देखते ही देखते तब आन्दोलन बन गया जब दिल्ली के जन्तर मंतर पर धरना  शुरू हुआ. शुरुआत नीट पेपर  लीक और उसके फलस्वरूप कई छात्रों की आत्महत्या के लिए ज़िम्मेदार केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से हुई थी . पहले पहल इससे छात्र और युवा जुड़े . वामपंथी विचार वाली पार्टी के छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन ( all india students association ) यानि आइसा  की  अध्यक्ष नेहा बोरा व अन्य छात्र  नेता जन्तर मंतर पर ही आमरण अनशन पर बैठ गए .

कॉकरोच जनता पार्टी ( सीजेपी ) के  इस आंदोलन को मजबूती तब और मिली जब अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद और शिक्षक इंजीनियर सोनम वांगचुक ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. कई अन्य सेलेब्रिटी , लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी व राजनीतिक व्यक्तियों ने भी आन्दोलन से खुद को जोड़ा. इसी के साथ आन्दोलनकारियों ने ऐलान कर दिया कि वे 20 जुलाई को संसद कूच करेंगे. पुलिस ने सोनम वांगचुक को जबरन वहा से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया जहां उनको एक तरह से हिरासत में रखा गया. अब तक  जन आन्दोलन बन गए इस धरने से  समाज का बड़ा वर्ग जुड़ गया और देश के अलग अलग इलाकों से ही नहीं विदेश तक से लोग आन्दोलन का हिस्सा बनने  यहां आने लगे. अब यह सिर्फ नीट पेपर लीक या धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तक का आंदोलन नहीं रहा. इसमें  शिक्षा व्यवस्था से संबंधित विभिन्न मुद्दे और भारत में बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी जुड़े.

सीजेपी आन्दोलन से जैसे जैसे ज्यादा लोग जुड़ते गए जन समर्थन के साथ साथ जन्तर मन्तर का यह मंच यह विभिन्न मुद्दों पर नाकाम रही केंद्र  सरकार की आलोचनाओं  को सुनने सुनाने का केंद्र बन गया . लोगों के इस आक्रोश और उसके असर का सरकार सही अंदाजा न लगा सकी. पुलिस समेत  पूरा  सरकारी तंत्र पहले पहल तो इसे सोशल मीडिया या  चंद हजार लोगों  तक सीमित अभियान समझता ही रहा , 19 जुलाई तक वह अगले दिन होने जा रहे घटनाक्रम का सही से अंदाजा नहीं लगा सका था . लिहाज़ा तैयारी भी उन्होंने 8 – 10 हजार लोगों के आने के हिस्साब से की थी . उसी नजरिए से जगह जगह बैरीकेडिंग , यातायात व्यवस्था और फ़ोर्स की तैनाती की गई . जब 20 जुलाई को सुबह से ही नई दिल्ली की तरफ तरफ लोगों के समूहों का आना शुरू हुआ तब सरकारी तंत्र सक्रिय हुआ परन्तु बहुत देर हो चुकी थी . ऐसे में सरकारी तंत्र  के लिए कानून व्यवस्था को संभालने की तैयारी करने के लिए  समय बेहद कम बचा था. उस पर दिल्ली पुलिस का नेतृत्व बिलकुल नया था. आईपीएस अनुराग कुमार  को तीन दिन पहले ही राजधानी की पुलिस की कमान सौंपी गई थी जो दो दशक तक ख़ुफ़िया एजेंसी में काम करने के कारण दिल्ली की रूटीन पुलिसिंग और कानून व्यवस्था से लगातार  परे रहे थे.  ऐसी सूरत में वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी.

काम चलाऊ प्लानिंग के बीच पुलिस ने 20 जुलाई की सुबह धरनास्थल और आसपास के इलाके में इंटरनेट सेवा बंद करवा दी. फ़ोर्स बढ़ा दी . केन्द्रीय पुलिस बल खासतौर से सीआरपीएफ की दंगा निरोधक फ़ोर्स की कई कम्पनियां बुला ली गई . इसके बावजूद बेरिकेडिंग  नाकाम होने लगी , भीड़ बढ़ने लगी . शांतिपूर्ण तरीके से भी आगे जा रहे लोगों को रोकने में नाकाम फ़ोर्स ने लाठियां चलानी शुरू कर दी . सादावर्दी पुलिसकर्मी  सड़क  छाप गुंडों की तरह मारपीट   कर रहे थे. इंटरनेट बंद होने के बावजूद वे तस्वीरें वायरल होने लगीं जिसमें फ़ोर्स बेदर्दी से प्रदर्शनकारियों को पीट रही थी .  पुलिसकर्मी उन  गिरते  पड़ते भागते लोगों को भी पीट रही थी जिनको उसे सिर्फ  तितर बितर करना था. इन तस्वीरों को देख आक्रोशित लोग ज्यादा तादाद में नई दिल्ली की तरफ निकले. इनमें वे लोग भी जुड़ गए जिनके परिवार से कोई धरना स्थल पर गया था. लिहाज़ा भीड़ बढ़ती गई. कई घायल हुए. कुछ खतरनाक तरीके से जख्मी हुए जिनमें पुलिसकर्मी भी थे.