वन्दे मातरम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बहस , भारत सरकार से पूछा गया क्या पूरा गाना ज़रूरी है ?

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सुप्रीम कोर्ट
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भारत के राष्ट्र गीत वन्दे मातरम को लेकर तभी से विवाद छिड़ा हुआ है जबसे इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन …’  से पहले  सभी 6 अंतरों के साथ गाने की अनिवार्यता की गई है. इसे राजनीतिक आदेश समझे  जाने के कारण झमेला बढ़ गया है वहीं इसका धार्मिक पहलू भी है . अब कर्नाटक के जाने माने  गायक टीएम कृष्णा की ‘ वन्दे मातरम से जुड़ी उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई है  जिसमें 2026 के कानून संशोधन और सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों के गायन से जुड़े निर्देशों को चुनौती दी गई है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस पर सुनवाई कर रही है.  इसी में बहस के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि किसी व्यक्ति के अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगीत के एक या सभी अंतरे नहीं गाने पर आपराधिक कार्रवाई का सवाल संवैधानिक जांच के दायरे में आ सकता है.  इसी सवाल को ध्यान में रखते हुए  पीठ ने केंद्र सरकार को याचिका पर दो हफ्ते में अपना जवाब दाखिल करने को कहा है.

क्या है पूरा  मामला :
कर्नाटक संगीत के  गायक और मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित  कलाकार टीएम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में 2026 में संशोधित राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 ( Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) की धारा 3 को चुनौती दी है.  इस धारा के तहत अब राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ साथ राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को भी समान कानूनी संरक्षण दिया गया है. केन्द्रीय  गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी  याचिका में चुनौती दी गई है, जिनमें निर्धारित सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे छह अंतरों के गायन की बात कही गई है.

याचिकाकर्ता की दलील है कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1), 19(1)(a), 21 और 25(1) से जुड़े सवाल उठाए गए हैं.

संशोधित प्रावधान के तहत अगर कोई शख्स  जानबूझकर   राष्ट्रगान (national anthem )  या राष्ट्र गीत (national song)  के गायन को रोकता है या ऐसे गायन में लगी सभा में व्यवधान पैदा करता है, तो उसे तीन साल  तक का कारावास , जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकते हैं .

धार्मिक नजरिए से आपत्ति : 
टी.एम. कृष्णा की याचिका में मुख्य रूप से वंदे मातरम के आखिरी  चार अंतरों को गाने लेकर ऐतराज़ है .  याचिका के अनुसार, इन अंतरों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ हैं. याचिकाकर्ता की दलील  है कि इन अंतरों को अनिवार्य रूप से गाने के लिए मजबूर  करना किसी व्यक्ति की अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार प्रभावित कर सकता है.

मामले में  बहस के दौरान पीठ की मौखिक टिप्पणी रही कि अदालत को यह तय नहीं करना है कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए,  वो सरकार को करना है . लेकिन पीठ इस  सवाल की जांच करेगी कि धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर वंदे मातरम् न गाने वाले व्यक्ति के अधिकारों को संविधान के तहत संरक्षण हासिल  है या नहीं.

अपराध का मामला बनता है या नहीं : 
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने मामले में स्थापित सिद्धांत का उल्लेख कर 1986 के ( बिजोय इमैनुअल बनाम केरल राज्य ) फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति को दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए.

अदालत ने इशारा दिया कि अगर कोई शख्स  वास्तविक अंतरात्मा या धार्मिक आपत्ति के कारण राष्ट्रगीत के एक या सभी अंतरे नहीं गाता, तो केवल इस आधार पर आपराधिक अभियोजन का सवाल अलग तरीके से देखा जाना होगा. वैसे मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया और केंद्र सरकार से इस संवैधानिक चुनौती पर जवाब मांगा है.

ऐतिहासिकता और तथ्य :
टीएम कृष्णा की याचिका में वंदे मातरम् के ऐतिहासिक इस्तेमाल का भी जिक्र  किया गया है. इसमें कहा गया है कि 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम के गायन को पहले दो अंतरों तक सीमित करने का फैसला लिया था. याचिका के मुताबिक़ , यह फैसला मुस्लिम सदस्यों की तरफ से किए गए ऐतराज के बाद लिया गया था और राजेंद्र प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू तथा रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं ने इस व्यवस्था का समर्थन किया था.

याचिका में साथ ही यह भी दावा किया गया कि संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को ‘ जन गण मन ‘ को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया, जबकि वंदे मातरम् को संविधान सभा द्वारा औपचारिक रूप से राष्ट्र गीत ( national song)  के रूप में अपनाए जाने का कोई समान औपचारिक प्रावधान नहीं है.