दरअसल एम्स की कार्यकारी निदेशक डॉ दत्ता की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी. ऐसे में उनके हृदय की स्थिति जाने के लिए कुछ टेस्ट करने की ज़रूरत पड़ी लेकिन इस तरह की जांच के लिए कैथ लेब की सुविधा चाहिए होती है जोकि एम्स गोरखपुर में शुरू नहीं हो पाई थी . ऐसे में कोई और उपाय न होने पर डॉ विभा को प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा जहां कैथलैब की उपलब्धता थी . हालांकि वहां जांच के बाद डॉ विभा लौट आई लेकिन यह खबर फैल गई कि एम्स निदेशक को अपना उपचार कराने प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.
हृदयाघात होने , धमनियां ब्लॉक होने या इस तरह के किसी रोग के उपचार के दौरान हृदय और धमनियों की स्थिति कैथलैब में देखी जाती है. इसके लिए एंजियोग्राफी या कुछ अन्य जांच भी वहीं की जाती है. स्टंट डालने यानि एंजियोप्लास्टी करने या पेस मेकर लगाने जैसे उपचार भी कैथलैब में होते हैं . सालों पुराने एम्स गोरखपुर में इस तरह की बेहद ज़रूरी सुविधा का न होना मरीजों के उपचार के नजरिए से सवाल तो खड़े करता ही है यहां से डॉक्टरी की डिग्री लेने वालों की पढ़ाई पर भी शक करने की गुंजायश छोड़ता है .
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित एम्स में शैक्षणिक सत्र 2019-20 से एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू हुईथी . तब 50 छात्रों को दाखिला मिला. यही नहीं 7 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरखपुर एम्स का उद्घाटन किया. 30 जून 2025 को गोरखपुर एम्स का पहला दीक्षांत समारोह भी संपन्न हो गया . हालांकि, अब तक संस्थान में कैथ लैब की सुविधा शुरू नहीं हो पाई है.
एक अधिकारी ने कहा है कि कैथ लैब पर काम करीब 70 फीसदी पूरा हो चुका है. जरूरी मशीनें और उपकरण जल्द आने वाले हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एम्स में कैथ लैब इस साल दिसंबर तक शुरू हो सकता है.










