डीजीपी नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से सवाल पूछे

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आईपीएस सुशांत कुमार नाथ ( फाइल फोटो )
आईपीएस सुशांत कुमार नाथ ( फाइल फोटो )

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से पूछा है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक के पद पर नियुक्ति के लिए  विचाराधीन अधिकारियों की लिस्ट में शामिल भारतीय पुलिस सेवा के  वरिष्ठ अधिकारी  सुशांत कुमार नाथ का ईमानदारी प्रमाण पत्र (integrity certificate) क्यों वापस ले लिया गया. अदालत ने सवाल किया कि क्या सब-इंस्पेक्टर की भर्ती से जुड़े मामले में श्री नाथ को अभियुक्त के तौर पर देखा जा रहा है ? इस केस की जांच  केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो ( सीबीआई) कर रही है .

राज्य सरकार ने मई में संघ लोक सेवा आयोग ( यूपीएससी –  UPSC)  को 11 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का एक पैनल भेजा था ताकि मौजूदा पुलिस महानिदेशक ( डीजीपी – dgp ) के उत्तराधिकारी को चुना जा सके, लेकिन सीबीआई  के यह कहने के बाद कि इस मामले में नाथ से पूछताछ की ज़रूरत पड़ सकती है, सरकार ने पैनल से नाथ का नाम हटा लिया.

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ( cji suryakant ) , जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें सीबीआई  के संदेश के कारण डीजीपी पद के लिए चुने जाने वाले अधिकारियों की सूची से नाथ का नाम हटाने को चुनौती दी गई थी.

कोर्ट ने आज पूछा कि क्या राज्य सरकार, ओडिशा पुलिस भर्ती बोर्ड के पूर्व चेयरमैन नाथ का ईमानदारी प्रमाण पत्र वापस लेकर उन्हें इस मामले में आरोपी मान रही है.

कोर्ट ने पूछा, “ईमानदारी प्रमाण पत्र रोकना बहुत ज़्यादा है. क्या आप उन्हें आरोपी की श्रेणी में रख रहे हैं?”

कोर्ट ने आगे कहा कि इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि सरकार ने प्रक्रिया का सही क्रम नहीं अपनाया (यानी गाड़ी को घोड़े के आगे रख दिया).श्री नाथ का ईमानदारी प्रमाण पत्र वापस लेने के नतीजों को समझाने के लिए, कोर्ट ने एक ज़िला जज का उदाहरण दिया, जिनसे उनके रिकॉर्ड रूम में हेराफेरी के मामले में पूछताछ की ज़रूरत पड़ सकती है.

कोर्ट ने पूछा, “मान लीजिए कि किसी न्यायिक संस्थान के रिकॉर्ड रूम या मालखाने में हेराफेरी की जांच शुरू होती है. X उस संस्थान का ज़िला जज है. उनसे इस बारे में पूछताछ हो सकती है. उनकी जांच हो सकती है. उचित मामले में, उन्हें आरोपी भी बनाया जा सकता है लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि रिकॉर्ड रूम के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई है, क्या ज़िला जज की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (apar) में कोई प्रतिकूल टिप्पणी होगी जिसके परिणामस्वरूप उनका ईमानदारी प्रमाण पत्र रोक दिया जाएगा?”

जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसी कार्रवाई से अधिकारी की छवि पर “सवालिया निशान” लग सकता है. कोर्ट ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या नाथ से पूछताछ के बारे में सीबीआई का जवाब ईमानदारी प्रमाण पत्र रोकने के लिए काफ़ी था.

सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज कोर्ट को बताया कि सीबीआई  की जांच अभी भी चल रही है. उन्होंने यह भी बताया कि श्री नाथ के प्रदर्शन मूल्यांकन (performance appraisals) में आपराधिक जांच के बारे में कोई ज़िक्र नहीं था.

श्री  मेहता ने कहा कि सीबीआई  के अनुरोध के बाद, राज्य सरकार ने उन्हें सूची से हटा दिया और सिर्फ  दस अधिकारियों के ईमानदारी प्रमाण पत्र के साथ पैनल में शामिल करने के लिए एक संशोधित प्रस्ताव भेजा. तुषार  मेहता ने कहा, “पूरी सावधानी और ज़रूरी जांच-पड़ताल के तहत, राज्य ने सभी योग्य अधिकारियों के ईमानदारी से जुड़े सर्टिफ़िकेट की समीक्षा की. यह सिर्फ़ एक व्यक्ति के लिए नहीं किया गया था. अगर किसी दूसरे अधिकारी के बारे में भी कुछ पता चलता, तो उन्हें भी उचित रूप से सूचित किया जाता. ”

एक दिन पहले यानि बुधवार को कोर्ट ने राज्य से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या उन्हें सीबीआई  की उस मांग के बारे में पता था जिसमें नाथ से पूछताछ करने की बात कही गई थी, जब उनका नाम डीजीपी  के पद के लिए अधिकारियों के पैनल में शामिल किया गया था.

इस पर तुषार मेहता ने कहा कि यह प्रक्रिया पिछले डीजीपी  के रिटायर होने से छह महीने पहले शुरू हुई थी और जब राज्य को बाद में तथ्यों के बारे में पता चला, तो यूपीएससी  को सूचित न करना अपनी ड्यूटी में कोताही होती. उन्होंने इसे यूपीएससी से पारदर्शिता का तकाजा बताया.

इसके जवाब में,  नाथ की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने कहा कि एक साल की जांच के बाद उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.

उन्होंने कहा, “माना कि मेरा रिकॉर्ड शानदार रहा है. मेरे ख़िलाफ़ कोई शिकायत नहीं रही है, कोई कानाफूसी तक नहीं हुई. सुशांत कुमार नाथ के ख़िलाफ़ एकमात्र बात सीबीआई  का वह पत्र है जिसमें कहा गया है कि ‘उनसे पूछताछ की ज़रूरत पड़ सकती है’. किसी भी एफआईआर में मेरा नाम तक नहीं है. निश्चित रूप से आरोपी के तौर पर तो बिल्कुल नहीं. मैं  एफआईआर  में आरोपी नहीं हूं, जांच अभी भी चल रही है और लीक हुए प्रश्न-पत्र कभी नहीं मिले.”

कोर्ट ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या राज्य के लिए इस मामले के बारे में यूपीएससी  को सूचित करना ज़रूरी था या नहीं.

जस्टिस बागची ने कहा, “हमें इस बात पर विचार करना है कि क्या ईमानदारी सर्टिफिकेट के साथ-साथ अन्य सभी सामग्री भी यूपीएससी के सामने पेश की जानी चाहिए या नहीं, जिसमें ये केस रिकॉर्ड भी शामिल हैं. बेशक, ईमानदारी सर्टिफ़िकेट का जो मुद्दा आपने उठाया है—कि क्या इसे वापस लिया जा सकता है—हम उस पर भी विचार करेंगे.”