जंतर मंतर पर धरने के लिए जब दिल्ली पुलिस ने इजाजत नहीं दी तो इनको हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अमित महाजन ( justice amit mahajan) ने यूएफबीयू की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस बाबत दिल्ली पुलिस को आदेश दिया है कि यदि जंतर मंतर नहीं तो बैंक कर्मियों को किसी और स्थान पर धरने की इजाजत दी जाए. दरअसल , दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश वकील प्रतीश सभरवाल ने ऐतराज़ जाहिर करते हुए तर्क दिया था कि जंतर- मंतर पर कानून व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है .
यह बैंक यूनियनें मिलकर बैंकिंग क्षेत्र के उन लगभग 90% कर्मचारियों की नुमायन्दगी का दावा करती हैं जो देश की अर्थव्यवस्था की गाड़ी के अहम पहिए को चलाते हैं . सैंकड़ों – हजारों में नहीं , इनकी संख्या लाखों में है . वर्तमान विवाद के केंद्र में इन कर्मचारियों की चार मुख्य मांगें हैं: पांच दिन का बैंकिंग सप्ताह लागू करना, सरकार की परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव (pli) स्कीम में बदलाव, इस स्कीम पर आपसी बातचीत और अन्य लंबित मुद्दों का समाधान.
वैसे , फिलहाल सबसे बड़ा मुद्दा दो साप्ताहिक अवकाश का है. वर्तमान में महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार की छुट्टी होने के कारण यह सिर्फ दो हफ्तों में ही संभव हो पाता है . कुल मिलकर देखा जाए तो कर्मचारी महीने में दो छुट्टियां बढ़ाने की बात कह रहे हैं . हैरानी की बात यह है कि उनकी मांग से इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ( indian banks’ association ) भी इत्तेफाक रखती है . यह एसोसिएशन भारत में सक्रिय के तमाम बड़े देशी और विदेशी क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों का संगठन है. वर्तमान में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के चेयरमेन सी एस सेट्टी ( challa sreenivasulu setty) आईबीए ( iba ) की प्रबंध समिति के भी अध्यक्ष ( chairman ) हैं . यानि बैंक प्रबंधन अपने कर्मचारियों को पांच दिन का हफ्ता ( five day week ) देने को राजी है लेकिन सरकार यानि वित्त मंत्रालय यह मंजूर नहीं कर रहा.
यह तो तब है जब खुद वित्त मंत्रालय की तरफ से , 5 दिसंबर 2023 को सांसद सुमित्रा वाल्मीकि के सवाल के जवाब में राज्य सभा में स्वीकार किया गया था कि आईबीए ने पांच दिन के बैंक सप्ताह प्रस्तावित किया हुआ है . अब सवाल उठता है कि लाखों कर्मचारियों से जुड़ा यह मुद्दा दो साल से मंत्रालय के पास लम्बित क्यों है ? सरकार ने अब तक इस सरल से विषय पर निर्णय क्यों नहीं लिया ? यही नहीं जब खुद बैंक का प्रबंधन अपने कर्मचारियों को अन्य विभागों और सर्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों की तरह सप्ताह में दो अवकाश का हक देने को सहमत है तो सरकार को क्या आपत्ति है ..!
यूबीएफयू ने विभिन्न यूनियनों और सदस्यों को लिखे एक पत्र में कहा गया है कि 5 दिन की बैंकिंग लागू करने की हमारी मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है. इस मांग पर मार्च 2024 में पिछले वेतन संशोधन समझौते के तहत सहमति बनी थी और हस्ताक्षर किए गए थे. इसलिए, हम हड़ताल करने जा रहे हैं.
दिलचस्प है कि ऐसा भी नहीं है कि बैंकों के पास साधन नहीं है या मुनाफा न हो रहा हो. ऐसा होता तो खुद बैंक प्रबंधन कर्मचारियों के लिए ‘ फाइव डे वीक ‘ लागू करने पर तैयार ही न होते. हैरानी की बात तो यह है कि पिछले कई साल से बैंकों की शाखाओं और खातों की संख्या में बेशुमार बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन कर्मचारियों की संख्या बढ़ने की बजाय घटी है.
चार साल के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में खातों की संख्या में 15 करोड़ का इजाफा हुआ वहीं जो मुनाफा 2021 -22 में 66 हजार करोड़ रूपये था वो 2025 -26 तक लगभग तिगुना यानि 1 लाख 90 हजार करोड़ भी पार कर गया.
दूसरी तरफ प्राइवेट बैंकों की कहानी सरकारी बैंकों से थोड़ी अलग है . उनकी शाखाएं बढ़ीं , खाते बढ़े , मुनाफा बढ़ा और कर्मचारी भी बढ़े. निजी क्षेत्र के बैंकों में चार साल के अंतराल में कर्मचारियों की संख्या में 1 लाख 12 हजार की वृद्धि हुई. मार्च 2021तक जो 6 लाख 26 हजार थे वो मार्च 2025 तक 7 लाख 38 हज़ार हो गए. इस दौरान उनकी लगभग 11 हजार शाखाएं बढ़ीं उनका मुनाफा भी लगभग तिगुना के आसपास बढ़ा. वित्त वर्ष 2021 में भारत के प्राइवेट बैंकों का मुनाफा 70 हजार करोड़ के आसपास था वो 2024-25 में बढ़कर 1 लाख 90 हज़ार करोड़ के आसपास जा पहुंचा.
विरोध को दबाने की कोशिश :
लम्बे समय से अपनी मांगे पूरी न होने के कारण विरोध स्वरूप बैंक कर्मियों 11 और 18 सितम्बर को शांतिपूर्ण तरीके से धरना देने का प्लान बनाया था लेकिन उनका आरोप है कि ऐन वक्त पर दिल्ली पुलिस (delhi police ) ने उनको रोक दिया. लिहाज़ा 28 सितम्बर से धरना शुरू करने के लिए स्थान आवंटित किए जाने को लेकर बैंक यूनियनों ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया .










