भारत की राजधानी दिल्ली की एकमात्र नदी को बचाने की जद्दोजहद में अब प्रादेशिक सेना ( territorial army ) को भी झोंक दिया गया है. अच्छा ख़ासा प्रशासनिक अमला होने और करोड़ों का धन बरबाद करने के बावजूद संभवत: असरदार परिणाम न मिलने पर यह कदम उठाया गया है . इसके लिए प्रादेशिक सेना की ‘ यमुना टास्क फ़ोर्स ‘ ( yamuna task force) बनाई गई है जिसने लेफ्टिनेंट कर्नल अनुराग सिंह की कमांड के तहत काम शुरू कर दिया है . वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि यमुना को प्रदुषण मुक्त करने की योजना के लिए 1000 करोड़ रूपये की धनराशि का प्रावधान किया गया है .
यमुना टास्क फोर्स के कमान अधिकारी , लेफ्टिनेंट कर्नल अनुराग सिंह ने कहा, “भारतीय सेना और भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने यहां यमुना टास्क फोर्स बनाने का फैसला किया… इसमें भारतीय सेना के शामिल होने से लोगों की उम्मीदें और आशाएं भी जुड़ी हैं, और हम हमेशा उन पर खरा उतरेंगे.”
अनुराग सिंह ने बताया कि यमुना टास्क फोर्स को मार्च में टेरिटोरियल आर्मी की 137 कंपोजिट इकोलॉजिकल टास्क फोर्स बटालियन (जिसे आमतौर पर गंगा बटालियन के नाम से जाना जाता है और जो प्रयागराज में स्थित है) के हिस्से के तौर पर बनाया गया था. उन्होंने कहा कि यमुना की सफाई को चुनौती के तौर पर नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और हासिल किए जा सकने वाले मिशन के तौर पर देखा जाना चाहिए, जिसका मकसद सकारात्मक बदलाव लाना है.
टास्क फोर्स ने स्पष्ट लक्ष्यों और मापे जा सकने वाले नतीजों के साथ एक व्यापक एक्शन प्लान तैयार किया है. अनुराग सिंह ने बताया कि इस काम पर निगाह रखने के लिए निगरानी समिति ( steering committee) है जिसकी हर पखवाड़े में एक बैठक होती है .
लेफ्टिनेंट कर्नल अनुराग सिंह ने आगे कहा, “हमने अपने सालाना, साप्ताहिक और रोज़ाना के प्रोग्राम सौंप दिए हैं, जो नतीजों पर आधारित, मापे जा सकने वाले और ठोस परिणामों पर केंद्रित हैं. इसलिए, इन व्यवस्थाओं के साथ, मैं इसे चुनौती के तौर पर नहीं, बल्कि लोगों और भारतीय सेना दोनों की भागीदारी के मौके के तौर पर देखता हूं.”
उन्होंने बताया कि यमुना टास्क फोर्स में दो अधिकारी, पांच जूनियर कमीशंड अधिकारी और 125 जवान शामिल हैं.
अधिकारी ने बताया कि टास्क फोर्स का काम दिल्ली में यमुना के लगभग 22 किलोमीटर लंबे हिस्से में गश्त करना, साफ नदियों के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाना और नदी में कचरा व अन्य चीजें फेंकने से रोकना है.
यमुना को खतरा उसमें बहकर आते प्रदूषित पानी व गंदे नालों से तो है ही उस मानसिकता से भी है जो पूजा पाठ की बची या इस्तेमाल शुदा सामग्री को नदी में बहाने की गरज से उसे डाल देते हैं . उनको लगता है कि पवित्र वस्तुओं को उस नदी में भाया जाए जिसे वे पवित्र मानते हैं . देवी देवताओं की खंडित मूर्तियों से लेकर किताबें , फूल पत्तिया , नारियल , प्रसाद और यहां तक कि कपड़े भी यमुना के हवाले कर दिए जाते है .
गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा के दौरान भी देवी देवताओं की मूर्तियां बड़ी मात्रा में भारतीय नदियों में डुबोई जाती हैं जिनमें तरह तरह के रंग – पेंट लगे होते हैं. यह केमिकल युक्त रंग न सिर्फ नदी का प्रदुषण बढ़ाते हैं बल्कि उसमें रहने वाले जन्तुओं को भी नुक्सान पहुंचाते हैं .













