49 वर्षीय सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस माधव जे. जामदार की सिंगल-जज बेंच ने पुलिस से पूछा कि क्या सरकारी फैसलों का विरोध करने पर केस दर्ज करके नागरिकों को “सरकार का गुलाम” बनाया जा रहा है …? और वे विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते ? सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी का कहना है कि वह सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (socialist democratic party of india) के महासचिव हैं और उन्हें एक साल के लिए शहर से बाहर निकाल दिया गया था.
जस्टिस जामदार यह जानना चाहते थे कि मुंबई पुलिस ने याचिकाकर्ता के पिछले विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर के आधार पर शहर बदर आदेश ( externment order ) क्यों जारी किया, जिनमें ‘ बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’, ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए गए थे.
हाल ही में हुए परीक्षा पेपर लीक मामले और याचिकाकर्ता की दलील का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने पूछा कि नागरिक विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते या नारे क्यों नहीं लगा सकते ?
जस्टिस जामदार ने कहा, “विरोध करना नागरिकों का अधिकार है. याचिकाकर्ता ने बस ‘ बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’, ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए हैं… नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते और ऐसे नारों के लिए एक्सटर्नमेंट के आदेश क्यों?”
कोर्ट ने पुलिस को चेतावनी दी:
पुलिस को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि वे जनता के सेवक हैं, न कि सरकार के बड़े अधिकारियों के.
याचिकाकर्ता चौधरी ने पुलिस उपायुक्त (ज़ोन 6- चेंबूर क्षेत्र ) के 3 दिसंबर, 2025 के एक्सटर्नमेंट आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें एक साल के लिए शहर से बाहर निकाल दिया गया था.
चौधरी की याचिका में दावा किया गया कि तड़ीपार की कार्यवाही अक्टूबर 2025 में एक ‘कारण बताओ नोटिस’ (show cause notice) के साथ शुरू हुई थी, जो विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में 2019 और 2024 के बीच उनके खिलाफ दर्ज कई एफआईआर के आधार पर जारी किया गया था. उनका आरोप है कि इस कार्यवाही ने उन्हें नागरिक चुनावों के दौरान दूर रखा, जो “वैध लोकतांत्रिक असहमति को दबाने” के बराबर है. चौधरी की तरफ से पेश हुए वकील पायोषी रॉय और इब्राहिम हरबत ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ़ सभी एफआईआर आईपीसी की धारा 188 (सरकारी अधिकारी के आदेश का पालन न करना) के तहत दर्ज की गई थीं. यह एफआईआर उन विरोध प्रदर्शनों के लिए थीं जिन्हें चौधरी ने आयोजित किया था या जिनमें वे शामिल हुए थे. जिनमें सीएए और एनआरसी ( CAA , NRC) पर सरकार के फैसलों, बाबरी मस्जिद के मुद्दे और ज्ञानवापी मस्जिद को सील करने से जुड़े विरोध प्रदर्शन शामिल थे.
वकीलों ने कहा कि इनमें से किसी भी मामले में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 लागू नहीं होती. यह धारा पुलिस को किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ़ शहर से बाहर निकालने (externment) का आदेश जारी करने का अधिकार देती है जो किसी व्यक्ति या संपत्ति को खतरा या नुकसान पहुंचाने वाला अपराध करने वाला हो.
वकील रॉय ने कहा कि चौधरी को , बिना उन्हें खुद को बेगुनाह साबित करने का मौका दिए , सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने या उनमें शामिल होने के लिए शहर से बाहर निकाला गया. इसलिए, उनके खिलाफ़ की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया जाना चाहिए.
राज्य के वकील ने याचिकाकर्ता और अन्य प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए कुछ नारों की ओर इशारा किया और तर्क दिया कि यह कार्रवाई कानून के अनुसार थी क्योंकि पुलिस अधिकारियों द्वारा अनुमति न दिए जाने के बावजूद विरोध प्रदर्शन किए गए थे.
महाराष्ट्र में विधायकों द्वारा “देश भर में हो रही हॉर्स ट्रेडिंग” (दलबदल) के जरिए पार्टियां बदलने की हालिया घटनाओं का जिक्र करते हुए, जस्टिस जामदार ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता “वॉशिंग मशीन” के जरिए पार्टी बदलने पर भी विचार कर सकते थे.
अपने आदेश में, जस्टिस जामदार ने मुंबई पुलिस की कार्रवाई को “दोषपूर्ण” और “दुर्भावनापूर्ण” बताया और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत “नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने” और “सम्मान के साथ जीने” की आज़ादी है .
जस्टिस जामदार ने कहा कि “रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों या कामों से किसी व्यक्ति या संपत्ति को खतरा, नुकसान या डर पैदा हो रहा है या ऐसा करने का इरादा है.”
आदेश में कहा गया है, “हालांकि, यह महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के तहत शहर से बाहर निकालने का आदेश जारी करने का आधार नहीं हो सकता है.”
जस्टिस जामदार ने “स्थापित कानूनी स्थिति” का उल्लेख किया कि शहर से बाहर निकालने का आदेश एक असाधारण उपाय है और ऐसे आदेश का असर किसी नागरिक को पूरे भारत में स्वतंत्र रूप से घूमने के उसके मौलिक अधिकार से वंचित करना होता है. बेंच ने राज्य से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) की कार्रवाई को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया और कहा, “महाराष्ट्र सरकार द्वारा याचिकाकर्ता को सिर्फ़ भारत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने के कारण राज्य से बाहर निकालने की कार्रवाई, याचिकाकर्ता के बोलने और अपनी बात कहने की आज़ादी के मौलिक अधिकार और सम्मान के साथ जीने के अधिकार को प्रभावित करती है.”













