दरअसल यह केस चार दशक से भी पुराना है. उत्तर प्रदेश में 1981 में एक पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट 1982 में फैसला सुनाया था. इसमें दोषी पाए गए अभियुक्तों में से एक भैरो सिंह भी है . बयालीस साल बाद यानि 2024 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया लिहाजा जिंदा बचा एकमात्र अभियुक्त भैरों सिंह बरी हो गया. उत्तर प्रदेश राज्य ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. 11 नवंबर को दिए गए आदेश के मुताबिक़ इस केस पर सुनवाई 2 दिसंबर, 2025 को हुई .
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हैरानी ज़ाहिर की कि राज्य के वकील को भी जानकारी नहीं थी. जब उनसे प्रतिवादी के पिछले रिकॉर्ड की जानकारी देने के लिए कहा गया, तो उन्होंने कथित तौर पर माना कि उन्हें निर्देश लेने की ज़रूरत होगी.
बेंच ने अपनी नामंज़ूरी ज़ाहिर करते हुए कहा कि यह स्पष्ट ही नहीं है कि राज्य प्रतिवादी के पिछले रिकॉर्ड या पिछले मामलों के नतीजे के बारे में मूल जानकारी के बिना अपील कैसे दायर कर सकता है ?
कोर्ट का यह भी कहना था कि यह घटना पुलिस सिस्टम के अंदर एक गहरी समस्या को दिखाती है, जहाँ कोर्ट के मामलों में लापरवाही वाला रवैया अपनाया जाता है. जजों ने कहा कि कोर्ट में मौजूद सब-इंस्पेक्टर भी ऐसे किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे पाया. यह तैयारी की कमी ज़ाहिर करता है . अदालत का कहना था कि अगर इस कोर्ट के सामने लापरवाही का यह स्तर है, तो ज़मीनी स्तर पर न्याय देने में इन पुलिस अधिकारियों के प्रत्योत्तर और बर्ताव को समझना मुश्किल नहीं है.
प्रतिवादी की तरफ से वकील लुबना नाज़ पेश हुई . उन्होंने बताया कि उनको प्रतिवादी का पक्ष रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट विधिक सेवा समिति (supreme court legal services committee ) की तरफ से ब्रीफ किया गया था . जबकि उत्तर प्रदेश राज्य और यूपी पुलिस ( up police ) की तरफ से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड अक्षय अमृतांशु तथा वकील दृष्टि रावल , अभय नायर , सार्थक श्रीवास्तव और मयूर गोयल पेश हुए थे .
इस मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी, 2026 को होगी. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि निचली अदालतों के रिकॉर्ड मंगाए जाए (सुप्रीम कोर्ट को भेजे जाएं) और राज्य सरकार तब तक मामले के सभी पहलुओं पर पूरे निर्देश ले ले.













