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दिल्ली पुलिस के नये कमिश्नर राकेश अस्थाना कॉन्फ्रेंस में बोले- ‘टीम वर्क’ चाहिए

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दिल्ली पुलिस मुख्यालय में आने पर नवनियुक्त पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना का स्वागत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव ने किया जिन्हें पुलिस आयुक्त का अतिरिक्त काम का काम सौंपा गया था.

भारतीय पुलिस सेवा के गुजरात कैडर से दिल्ली पुलिस में लाये गए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना ने राजधानी की पुलिस की कमान सम्भालते ही अधिकारियों से दिल्ली पुलिस को दुनिया की बेहतरीन मेट्रोपोलिटन पुलिस बनाने का लक्ष्य हासिल करने के लिए ‘टीम’ की तरह काम करने का संदेश दिया. मंगलवार की शाम आदेश जारी होने के बाद बुधवार को पुलिस कमिश्नर का कार्यभार सम्भालने के बाद राकेश अस्थाना ने जय सिंह रोड स्थित पुलिस मुख्यालय में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ‘विमर्श कान्फ्रेंस हॉल’ में बैठक की. इस बैठक में मुख्यालय के बाहर के दफ्तरों में मौजूद बाकी अधिकारियों को वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के जरिये जोड़ा गया था.

बैठक के दौरान कामकाज की रूपरेखा खींचते हुए श्री अस्थाना ने अधिकारियों को स्पष्ट किया कि अपराधों की रोकथाम और केस सुलझाने के साथ कानून व्यवस्था की स्थिति बहाल रखना और विशेष कार्यों पर ध्यान देने को प्राथमिकता बनाकर काम करना होगा. उन्होंने दिल्ली पुलिस की सेवाएँ देने वाले एक प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण हालात में काम करने वाले पुलिस बल के तौर पर सराहना की.

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दिल्ली पुलिस कमिश्नर का कार्यभार लेते आईपीएस राकेश अस्थाना

एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़ नवनियुक्त पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने क़ानून व्यवस्था सम्भालने के साथ साथ साइबर अपराधों, आतंकवाद, नारकोटिक्स और असलहे की तस्करी जैसे अपराध करने वालों की धरपकड करने के दिल्ली पुलिस के ट्रेक रिकॉर्ड की तारीफ की और इस सिलसिले को जारी रखने को कहा. उन्होंने कहा कि अपराधों की रोकथाम के असरदार उपाय और अपराधियों पर नकेल कसने से न सिर्फ अपराधों का बोझ कम होगा बल्कि इससे लोगों में सुरक्षा की भावना भी बढ़ती है और खासतौर से महिलाओं और ऐसे वर्ग में जिनके अपराध की चपेट में आने की आशंका ज्यादा रहती है. श्री अस्थाना ने समुदाय पुलिस व्यवस्था के तहत शुरू की गई विभिन्न योजनाओं जैसे ‘युवा’ और ‘वरिष्ठ नागरिक’ आदि पर भी ज़ोर दिया.

गुजरात के वडोदरा और सूरत शहरों में कमिश्नर रह चुके राकेश अस्थाना के लिए दिल्ली में कानून व्यवस्था की कमान सम्भालना किसी चुनौती से कम नहीं है. यूँ दिल्ली उनके लिए नई नहीं है. उन्होंने आगरा के सेंट जॉन कॉलेज से स्नातक और स्नातकोत्तर जरूर किया है लेकिन दिल्ली में रहकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से पढ़ाई भी की है. सीबीआई, विमान पत्तन सुरक्षा महानिदेशालय और नारकोटिक्स ब्यूरो के प्रमुख के तौर पर दिल्ली में भी रह चुके हैं. लेकिन दिल्ली में क़ानून व्यवस्था सँभालने में उनका इस तरह के काम का पहला अनुभव है और दूसरे कैडर में नई टीम के साथ काम करना व काम कराना उनके लिए चुनौती का एक और पहलू है क्यूंकि कैडर के बाहर के अधिकारी होने के कारण अपनेपन वाले भाव का अभाव उनके लिए स्वाभाविक तौर पर एक परेशानी खड़ी करेगा.

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दिल्ली पुलिस मुख्यालय में विमर्श हाल में नवनियुक्त कमिश्नर के साथ स्पेशल कमिश्नर बालाजी श्रीवास्तव और सुन्दरी नंदा

इससे पहले दिल्ली पुलिस मुख्यालय में आने पर उनका स्वागत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव ने किया जिन्हें पुलिस आयुक्त का अतिरिक्त काम सम्भाले महीना भर भी नहीं हुआ था. बालाजी श्रीवास्तव एजीएमयूटी कैडर के 1988 बैच के आईपीएस हैं और उन्हें एसएन श्रीवास्तव के रिटायर होने पर हाल ही में पुलिस कमिश्नर की कुर्सी सौंपी गई थी. दिल्ली पुलिस के हलकों में माना जा रहा था कि जिस तरह कालान्तर में एसएन श्रीवास्तव को पहले अतिरिक्त कार्यभार के तौर गृह मंत्रालय ने राजधानी के पुलिस आयुक्त की कुर्सी पर बिठाया और बाद में नियमित किया था वैसे ही बालाजी श्रीवास्तव को भी बाद में पूरी तरह से आयुक्त की शक्तियाँ और अधिकार दे दिए जायेंगे.

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब दिल्ली में यूटी कैडर के बाहर से किसी अधिकारी को लाकर पुलिस कमिश्नर बनाया गया हो लेकिन दिल्ली पुलिस के इतिहास ये दो ही बार हुआ है. पहले एसएस जोग को 2000 के दशक के शुरुआत में जब उत्तर प्रदेश कैडर के अजय राज शर्मा को लाया गया. तब भी केंद्र सरकार में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चा की सरकार थी. दिल्ली में संसद भवन जैसा खतरनाक हमला भी हमला भी हुआ था जो भारत में अब तक आतंकवादियों का सबसा बड़ा दुस्साहसिक हमला है. इसके बावजूद अजय राज शर्मा दिल्ली पुलिस के सफलतम आयुक्तों में से एक गिने जाते हैं.

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दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे अजयराज शर्मा
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दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे एसएस जोग.

वर्तमान हालात में कुछ अधिकारियों के पूर्वाग्रह भी श्री अस्थाना के लिए तब तक सुचारू रूप से काम करने में बाधा रहेंगे जब तक दोनों तरफ से एक दूसरे को कबूल करने के भाव का असर नहीं होता या जब तक नवनियुक्त आयुक्त नई टीम में रम नहीं जाते. हालांकि 1984 बैच के श्री अस्थाना की वरिष्ठता और देश की सत्ता के शीर्ष तक उनकी ज़ाहिर हो चुकी पकड़ उनके लिए मुश्किल काम को आसान बनाने में मददगार साबित होगी. सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ – BSF) के महानिदेशक बनने से पहले श्री अस्थाना नागरिक विमान पत्तन महानिदेशालय में महानिदेशक थे.

उससे पहले वह केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई – CBI ) में विशेष निदेशक थे और जहां निदेशक व अपने वरिष्ठ आलोक वर्मा के साथ उनके झगड़ा जगज़ाहिर हो गया था. उन पर भ्रष्टाचार का इलज़ाम लगा था और दोनों ही अधिकारीयों को सीबीआई से हटा दिया गया था. हालांकि बाद में श्री अस्थाना को इसमें क्लीन चिट मिल गई थी. इन सबके बावजूद रिटायरमेंट से सिर्फ चार दिन पहले अचानक राकेश अस्थाना को देश की राजधानी की पुलिस की कमान सौंपा जाना और कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाया जाना उनकी सत्ता में पकड़ जग ज़ाहिर करता है. नई भूमिका में उनकी ये छवि सहायक भी हो सकती है.

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दिल्ली पुलिस के नए कमिश्नर राकेश अस्थाना

उन्होंने भारत के ‘चारा घोटाला’ नाम से चर्चित सैकड़ों करोड़ रुपये वाले घोटाले और धोखाधड़ी व जालसाजी केस का परीक्षण भी किया जिसमें 1997 में पहली बार लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार किया गया था. राकेश अस्थाना का जन्म तत्कालीन बिहार के शहर रांची (अब झारखंड) में हुआ था.

आईपीएस अधिकारी प्रवीर रंजन चंडीगढ़ के नये डीजीपी होंगे

प्रवीर रंजन
प्रवीर रंजन (फाइल फोटो)

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी प्रवीर रंजन को संघ शासित क्षेत्र चंडीगढ़ का पुलिस महानिदेशक नियुक्त किया गया है. श्री रंजन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी संजय बेनीवाल का स्थान लेंगे. उनकी नई तैनाती के सम्बन्ध में भारत सरकार के गृह मंत्रालय की तरफ से आज जारी आदेश में कहा गया है कि श्री बेनीवाल की नई नियुक्ति के बारे में अलग से ऑर्डर जारी किया जाएगा.

भारतीय पुलिस सेवा के एजीएमयूटी कैडर के 1993 बैच के अधिकारी प्रवीर रंजन अभी तक दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर के ओहदे पर हैं. वह कब नया कार्यभार सम्भालेंगे, अभी ये स्पष्ट नहीं है.

प्रवीर रंजन
प्रवीर रंजन चंडीगढ़ के पुलिस महानिदेशक बनाए गए हैं.

संजय बेनीवाल ने जून 2018 में ट्राय सिटी चंडीगढ़ के पुलिस प्रमुख का कार्यभार सम्भाला था. वह भी एजीएमयूटी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और 1989 बैच के हैं.

भारत के केंद्र शासित क्षेत्रों में से एक चंडीगढ़ का अलग से अहम स्थान है. अपराध और ट्रैफिक के मामले में कई स्थानों से बेहतर चंडीगढ़ को सिटी ब्यूटीफुल भी कहा जाता है. भारत के आधुनिकतम शहरों में से एक चंडीगढ़ की एक ख़ासियत इसका दो राज्यों (हरियाणा और पंजाब) की राजधानी होना भी है. तीन तीन सरकारों वाले इस शहर की संवेदनशीलता भी इस मामले में है. वैसे यहाँ का प्रशासक पंजाब का राज्यपाल होता है लेकिन व्यवहारिक तौर पर प्रशासक का सलाहकार ही यहाँ का शासन चलाता है. वह सलाहाकार केंद्र सरकार की तरफ से तैनात यूटी कैडर का वरिष्ठ आईएएस अधिकारी होता है.

रिटायरमेंट से 4 दिन पहले राकेश अस्थाना दिल्ली के पुलिस कमिश्नर नियुक्त

राकेश अस्थाना
राकेश अस्थाना दिल्ली पुलिस के नए कमिश्नर.

रिटायरमेंट से सिर्फ चार दिन पहले ही सीमा सुरक्षा बल (BSF) के महानिदेशक और भारतीय पुलिस सेवा के गुजरात कैडर के अधिकारी राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस का नया कमिश्नर नियुक्त किया गया है. केन्द्रीय जांच ब्यूरो में विशेष निदेशक रहे 1984 बैच के अधिकारी राकेश अस्थाना को नई ज़िम्मेदारी देने की झटकेदार सूचना मंगलवार शाम अचानक ही मीडिया को दी गई. हालांकि एस एन श्रीवास्तव के पिछले महीने रिटायरमेंट के वक्त भी उनकी जगह राकेश अस्थाना को दिल्ली का पुलिस आयुक्त बनाये जाने की चर्चा थी लेकिन श्री अस्थाना की सेवानिवृत्ति की तारीख पास होने की वजह से इन सम्भावनाओं को ख़ारिज कर दिया गया था. 9 जुलाई को 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके राकेश अस्थाना को 31 जुलाई को रिटायर होना था लेकिन उन्हें दो साल का सेवा विस्तार दे दिया गया है.

राकेश अस्थाना
राकेश अस्थाना (दाएं) का स्वागत करते दिल्ली पुलिस के कमिश्नर का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे बाला जी श्रीवास्तव

देसवाल को कमान :

दूसरी तरफ भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी – ITBP) के महानिदेशक एस एस देसवाल को राकेश अस्थाना की जगह सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक का काम संभालने को कहा गया है. वह आईटीबीपी के प्रमुख के साथ साथ अतिरिक्त रूप से बीएसएफ का कार्य तब तक देखेंगे जब तक बीएसएफ के लिए नियमित नियुक्ति नहीं होती या कोई और आदेश नहीं जारी होता. एस एस देसवाल भारतीय पुलिस सेवा के हरियाणा कैडर के 1984 बैच के अधिकारी हैं.

राकेश अस्थाना
राकेश अस्थाना की नियुक्ति का आदेश

दो साल का कार्यकाल :

केन्द्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से जारी आदेश में राकेश अस्थाना को तुरंत प्रभाव से दिल्ली पुलिस की कमान संभालने को कहा गया है. वह 31 जुलाई 2022 तक या अगला आदेश होने तक दिल्ली पुलिस के कमिश्नर बने रहेंगे. वर्तमान में बालाजी श्रीवास्तव दिल्ली पुलिस के कार्यकारी आयुक्त के तौर पर कमान सम्भाले हुए हैं.

अप्रत्याशित फैसला :

आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को राजधानी दिल्ली का पुलिस आयुक्त बनाया जाना अफसरशाही के लिए भी ये अप्रत्याशित ख़बर है. केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण दिल्ली में एजीएमयूटी कैडर के अधिकारी को ही पुलिस कमिश्नर बनाया जाता है. हालांकि एस एस जोग और अजय राज शर्मा अपवाद हैं जो दूसरे कैडर के होते हुए भी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बनाये गए. श्री अस्थाना की पुलिस कमिश्नर पद पर नियुक्ति एक विशेष केस के तौर पर जनहित में लिया गया फैसला बताया गया है जो कैबिनेट की नियुक्ति मामलों की समिति की मंजूरी से हुआ.

राकेश अस्थाना
राकेश अस्थाना दिल्ली पुलिस आयुक्त का पदभार संभालते हुए.

विवादों में अस्थाना :

केन्द्रीय जांच ब्यूरो के तत्कालीन प्रमुख और निदेशक आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को लेकर हुआ वो विवाद जगजाहिर है जिसने देश की सबसे अहम मानी जाने वाली जांच एजेंसी सीबीआई की छीछालेदर कर डाली थी. आलोक वर्मा ने अस्थाना पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. आलोक वर्मा के बाद अस्थाना ही सीबीआई में दूसरे नम्बर पर सबसे बड़े अधिकारी थे. अस्थाना को 2018 में सीबीआई से हटा दिया गया था. इसके बाद 2019 में राकेश अस्थाना को विमानपत्तन सुरक्षा के महानिदेशक के पद पर नियुक्त कर दिया गया था. उन पर मीट के कारोबारी एक्सपोर्टर मोइन कुरैशी से जुड़े मामले में रिश्वतखोरी का आरोप लगा था जिससे उन्हें क्लीन चिट मिल गई थी.

गौरवपूर्ण इतिहास के साथ सीआरपीएफ मना रही है 83 वीं सालगिरह

सीआरपीएफ
सीआरपीएफ के महानिदेशक कुलदीप सिंह ने गुड़गांव स्थित ग्रुप सेंटर में शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की.

भारत का सबसे पुराना और सबसे बड़ा केन्द्रीय पुलिस संगठन केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ CRPF) आज अपनी 83 वीं सालगिरह मना रहा है. ब्रिटिश शासन के दौरान 27 जुलाई 1939 को क्राउन रिप्रेजेन्टेटिव पुलिस (सीआरपी -CRP) के तौर पर गठित सीआरपीएफ अब 246 बटालियन वाली विशाल पुलिस फ़ोर्स है जिसका मकसद देश में कानून ब्यवस्था की स्थिति कायम रखने में स्थानीय प्रशासन की मदद करना और आंतरिक सुरक्षा को कायम रखना है. स्थापना दिवस के अवसर पर आज सीआरपीएफ के प्रमुख और महानिदेशक कुलदीप सिंह ने गुड़गांव स्थित ग्रुप सेंटर में शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उन जवानों को याद किया जिन्होंने कर्तव्य की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर करते हुए मकसद को सरंजाम दिया. राष्ट्र सेवा में अब तक सीआरपीएफ के 2235 जवान शहीद हो चुके हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और भारत के सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे समेत कई गण्यमान्य लोगों ने इस अवसर पर सीआरपीएफ के काम की तारीफ करते हुए उसको बधाई दी है. सीआरपीएफ का वर्तमान स्वरूप भारत की अँग्रेज़ हुकूमत से आजादी के बाद 28 दिसम्बर 1949 को संसद में पास किये गए अधिनियम के बाद बनाया गया था. सबसे पुराने इस अर्धसैन्य बल को अँग्रेज़ सरकार ने अपनी नीतियों के हिसाब से अपना शासन चलाने में इस्तेमाल किया था.

भारत की पहली पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सोच के मुताबिक़ इस बहुउद्देशीय पुलिस बल का गठन किया गया. इसने रजवाड़ों और रियासतों में बंटे देश को एक करने में अहम भूमिका निभाई. 1955 में सीआरपीएफ अधिनियम बनने के बाद इसके नियम कायदे बनाये और अमल में लाये गये. सीआरपीएफ अधिनियम के बाद 1955 में वीजी कनेतकर को इसका पहला मुखिया यानि महानिदेशक बनाया गया. बागी रियासतों को नियंत्रण में करने में सीआरपीएफ का इस्तेमाल किया गया.

आजादी के फ़ौरन बाद इसकी टुकड़ियों ने पाकिस्तान को छूती राजस्थान, गुजरात और सिंध सीमाओं को सम्भाला था. यही नहीं पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ और इसके बाद हमले रोकने में भी इसे तैनात किया गया था. चीन से सटी सीमा की रखवाली के दौरान 21 अक्टूबर 1959 को इसके गश्ती दल पर चीनी सेना द्वारा हुआ हमला शुरूआती दौर में इसका सबसे बड़ा नुकसान था जिसमें सीआरपीएफ के 10 जवानों ने सबसे बड़ा बलिदान दिया था. ये घटना लदाख सीमा पर तत्तापानी के पास हुई. पूरे भारत में इस दिन को पुलिस स्मृति दिवस के तौर पर मनाया जाता है. यही नहीं 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में सीआरपीएफ ने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा जोड़कर काम किया. 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान भी पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर इसने सेना के साथ मोर्चा संभाला था.

کشمیر میں عام لوگ بھی اب دہشت گردوں کی خبریں دے رہے ہیں: لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے

جنرل ڈی پی پانڈے

ہندوستانی فوج کی 15 کور (چنار کور) کے کمانڈر لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے نے آج کہا کہ جموں و کشمیر میں دہشت گردی کے خاتمے اور صورتحال کو معمول پر لانے کی طرف پیش قدمی کرنے کی ہماری حکمت عملی بہت واضح ہے اور اس کا اثر بھی دکھائی دینے لگاہے۔ جموں و کشمیر کے دارالحکومت سری نگر میں بادامی باغ چھاو¿نی میں واقع کور ہیڈ کوارٹر میں رکشک نیوز کے ساتھ ایک مختصر گفتگو میں لیفٹیننٹ جنرل پانڈے نے کشمیر میں دہشت گردی اور سیکیورٹی فورسز سے متعلق کچھ پہلوو¿ں پر تبادلہ خیال کیا۔ سیکیورٹی امور کے ماہر لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے نے چار ماہ قبل ہی ہندوستانی فوج ، شمالی کمانڈ کی 15 ویں کور کی کمان سنبھالی ہے ، جو اپنے زیر کنٹرول علاقے میں دہشت گردی سے متعلق زیادہ سے زیادہ سرگرمیاں دیکھ رہا ہے۔

چنار کور کے کمانڈنگ آفیسر ڈی پی پانڈے نے واضح طور پر کہا کہ “وائٹ کالر” (سفید پوش) دہشت گردوں کو نشانہ بنانا ہماری پہلی ترجیح ہے جس پر فوج اور سکیورٹی فورسز کام کر رہی ہیں۔ وائٹ کالر دہشت گردوں سے ان کا مطلب وہ لوگ تھے جو پردے کے پیچھے رہ کر دہشت گردوں کی مددکررہے ہیں۔ انہوں نے کہا کہ دہشت گردوں اور علیحدگی پسندوں کی مدد کرنے والے اب بے نقاب ہو گئے ہیں۔ اور ان کی اصلیت یہاں کے لوگوں کے سامنے آچکی ہے۔

جموں و کشمیر میں دہشت گردی اور دراندازی سے نمٹنے کا تجربہ رکھنے والے 57 سالہ لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے یہاں کی صورتحال میں ہونے والی تبدیلی کے بارے میں کھل کر بات کرتے ہیں۔ ان کا کہنا ہے کہ تبدیلی واضح طور پر نظر آرہی ہے۔ انہوں نے کہا کہ اب پتھراو¿ کے واقعات رک چکے ہیں۔ نہ صرف سیکیورٹی فورسز کے حوصلے ہی نہیںبڑھے بلکہ مقامی انتظامیہ میں بھی اس مثبت تبدیلی کو محسوس کیا جارہا ہے۔ لیفٹیننٹ جنرل پانڈے کا کہنا ہے کہ اب لوگ دہشت گردوں اور ان کے حامیوں کے خلاف زیادہ آواز اٹھارہے ہیں۔ صرف یہی نہیں ، اب صورتحال بھی ایسی ہے کہ اب عام لوگ ہمیں دہشت گردوں اور ان کے ٹھکانوں کے بارے میں بھی معلومات فراہم کررہے ہیں۔

لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے کا دعوی ہے کہ فوج کو جدید اسلحہ اور آلات کی فراہمی نے دہشت گردی کے خلاف جنگ میں مدد فراہم کی ہے۔ انہوں نے کہا کہ اس کی وجہ سے بھی دہشتگردوں کے خلاف کارروائیوں میں سکیورٹی فورسز کو ہونے والے جانی نقصان میں کمی آئی ہے۔ لیفٹیننٹ جنرل پانڈے ان بدلے ہوئے حالات کو فوج اور سیکیورٹی فورسز کے لئے حوصلہ بڑھانے والاقدم سمجھتے ہیں۔

کون ہیں لیفٹیننٹ جنرل پانڈے :

Lt Gen D P Pandey
لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے سنجے وہرا کے ساتھ (ایڈیٹر ، rakshaknews.in)

دسمبر 1985 میں لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے نے ہندوستانی فوج کے سکھ لائٹ انفنٹری کی نویں بٹالین میں کمیشن حاصل کیا تھا۔ ان کا تعلق اتر پردیش کے گورکھپور سے ہے۔ ہندوستان کے مغربی حصے میں راجستھان اور پنجاب کے سرحدی علاقوں میں اپنے کام کے تجربے کے علاوہ انہوں نے کارگل میں آپریشن وجے میں بھی حصہ لیاتھا۔ بہت اونچائی والے پہاڑی علاقوں میں لڑنے کی تربیت حاصل کرنے والے لیفٹیننٹ جنرل پانڈے کو سیاچن گلیشیر میں بھی تعینات کیا گیاتھا۔ وہ ملک و بیرون ملک بھی مختلف عہدوں پر تعینات رہے ہیں۔ مدراس یونیورسٹی (چنئی) سے ڈیفنس اسٹڈیز میں پوسٹ گریجویٹ اور اندور کے دیوی اہلیہ یونیورسٹی سے ایم فل ان سیکیورٹی مینجمنٹ کر چکے لیفٹیننٹ جنرل ڈی پی پانڈے امریکہ کے واشنگٹن میں واقع نیشنل ڈیفنس یونیورسٹی اور ویلنگٹن میں واقع ڈیفنس سروسز اسٹاف کالج کے طالب علم بھی رہے ہیں۔

15 کور یعنی چنار کور:

ہندوستانی بری فوج کے شمالی کمان کی اس کور کا علاقہ وادی کشمیر ہے۔ انتہائی خوبصورت اور قدرتی وسائل سے مالا مال وادی کشمیر تقریبا 30 سال سے دہشت گردی کی سرگرمیوں کا گڑھ رہا ہے۔ اس علاقے میں چنار کے درختوں کی کثرت کی وجہ سے فوج کی اس 15 ویں کور کا نام چنار کور بھی کہا جاتا ہے ، جس کی علامتی نشان چنار کی پتی ہے۔ ہندوستان میں برطانوی دور حکومت کے دوران وجود میں آنے والی چنار کور 1916 میں معرضِ وجود میں آئی۔ یہ پہلی جنگ عظیم کے دورانکی بات ہے اور اس نے مصر اور فرانس میں جنگ لڑی ، لیکن 1918 میں اس کور کو ختم کردیا گیا۔ ایسا ہی دوسری جنگ عظیم کے دوران 1942 میں ہوا تھا جب اسے برما میں آپریشن کے لئے تیار کیا گیا تھا۔ تقسیم ہند سے قبل ، 1947 میں ، کراچی میں فوج کی 15 کور کو ختم کردیا گیا تھا ، لیکن آزاد ہندوستان میں اس کی تشکیل نو کردی گئی تھی۔ 1948 میں یہ جموں و کشمیر فورس بن گیا ، لیکن 1955 میں اپنی موجودہ شکل میں آنے سے پہلے اس میں بدلاو¿ ہوتے رہے۔ 1972 میں جب فوج نے جموں و کشمیر کے لئے ناردرن کمانڈ تشکیل دی تو تب15کور کا ہیڈ آفس سری نگر بنایا گیا تھا۔ کشمیر کے ساتھ ساتھ لداخ بھی اس کاعلاقہ بن گیا۔ 1999 میں آپریشن وجے کے بعد صرف وادی کشمیر کا علاقہ اس کے زیر کنٹرول ہے۔

چنار کور نے پاکستان کے ساتھ ہوئی تمام جنگوں میں ایک اہم کردار ادا کیا ہے۔ جنرل بکرم سنگھ ، لیفٹیننٹ جنرل سید عطا حسنین اور جنرل سندرراجن پدمانابھن اس کے مقبول ترین کمانڈروں میں شامل ہیں۔

करगिल विजय दिवस : 60 दिन चला युद्ध, भारत ने खोये थे 500 से ज्यादा सैनिक

करगिल विजय दिवस
करगिल विजय दिवस

पाकिस्तान की कब्जाई अपनी सैनिक चौकियां वापस हासिल करने और लदाख को भारत के हिस्से से काटने की बड़ी साजिश को नाकाम करने के लिए शहीद हुए भारत के 500 से ज्यादा सैनिकों की कुर्बानी को याद करने का आज एक अहम दिन है. भारत इसे करगिल विजय दिवस के तौर पर हर साल 26 जुलाई को मनाता है. इसी दिन वर्ष 2000 में, साठ दिन तक पाकिस्तान से चला वो संघर्ष खत्म हुआ जिसे अंतत: करगिल युद्ध का नाम दिया गया. शुरू में न तो भारतीय सेना को अंदाजा था और न ही पाकिस्तान ने ही इसमें अपनी सेना के शामिल होने की बात कबूल की थी. जम्मू कश्मीर के अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में लड़े गये इस युद्ध ने भारत – पाकिस्तान के उन सम्बन्धों में दरार और चौड़ी कर दी थी जो 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की करारी शिकस्त से पैदा हुई थी.

करगिल विजय दिवस
करगिल विजय के हीरो

करगिल का संघर्ष भारतीय सेना के लिए एक बड़ा सबक भी था. ये एक तरह से दोनों मुल्कों के सैनिकों के बीच एक स्तर पर भरोसे का कत्ल था जो पाकिस्तान की सेना ने किया था. इसकी साजिश की भनक कई दिन तक भारतीय सेना और गुप्तचर एजेंसियों को नहीं लगी थी. यही वजह है जो इस युद्ध को भारतीय जासूसों की नाकामी का नतीजा माना जाता है.

असल में अत्यधिक ऊंचाई वाले करगिल इलाके में सर्दियों में मौसम इतने खतरे पैदा कर देता है कि किसी भी इंसान के लिए वहां सामान्य गतिविधियां तक करना तो दूर एक जगह से दूसरी जगह तक जाना भी बेहद मुश्किल है. उस पर वीरान खतरनाक पहाड़ियां. ऐसे में दोनों देशों की सेनाओं ने आपसी समझ के तहत ये तय कर रखा था कि ऐसे खतरनाक हालात में सीमाई चौकियों से तैनाती हटाकर उन्हें खाली छोड़ दिया जाएगा. लेकिन 1998 की सर्दियों के बाद खाली छोड़ी गई इन चौकियों पर पाकिस्तान ने बर्फ पिघलने की शुरुआत में कब्जा करना शुरू कर दिया था.

करगिल विजय दिवस
करगिल विजय दिवस

करगिल युद्ध के शुरू में गैर सैनिकों/पाकिस्तानी जिहादियों की आड़ या भूमिका रही लेकिन उनके साथ पाकिस्तानी सैनिक और सेना का उपलब्ध कराया असलाह होता था. जिस तरह का गोला बारूद इस्तेमाल किया जा रहा था और संघर्ष चल रहा था वो स्पष्ट करता था कि पाकिस्तानी हमलावरों और घुसपैठियों के पीछे युद्ध प्रशिक्षित बल है. पाकिस्तान हमेशा कहता रहा कि इसमें उसकी सेना शामिल नहीं है. नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान के इस प्लान को ‘ऑपरेशन बदरी’ नाम दिया गया था जिसके खिलाफ भारत ने ऑपरेशन विजय किया था जिसमें तकरीबन 2 लाख सैनिकों को तैनात किया गया था.

करगिल विजय दिवस
22 साल पहले

पाकिस्तान ने शुरू -शुरू में इसे चुनिन्दा बागियों की करतूत कहकर प्रचारित किया लेकिन अंतत: साबित हो ही गया था कि इसमें पाकिस्तान की सेना शामिल थी. इसी के साथ इसे संघर्ष या झड़प की श्रेणी से बाहर निकाल कर युद्ध घोषित किया गया. हालांकि इसमें दोनों ही मुल्कों को भारी नुकसान हुआ. भारतीय सेना ने अपने कई नौजवान अधिकारी खोये. करगिल युद्ध के शहीदों की याद में करगिल समेत कई जगहों पर शहीद स्मारक बनाये गए जहां हरेक 26 जुलाई को शहीदों की याद में कार्यक्रम होते हैं. मुख्य कार्यक्रम राजधानी दिल्ली में होता है जिसमें तमाम सैन्य अधिकारियों से लेकर प्रधानमंत्री तक शामिल होते हैं.

भारत ने 22 वें करगिल विजय दिवस पर वीर सैनिकों को यूँ याद किया गया

करगिल विजय दिवस
युद्ध स्मारक पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

करगिल विजय दिवस के मौके पर आज भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने दिल्ली स्थित युद्ध स्मारक पर वीर सैनिकों को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की. उधर भारत के सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने 22 वें करगिल विजय दिवस पर, युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को याद करते हुए कहा है कि देश उनका हमेशा ऋणी रहेगा.

करगिल विजय दिवस
युद्ध स्मारक पर तीनों सेनाओं के प्रमुख

सेनाध्यक्ष नरवणे ने अपने ट्वीटर संदेश में कहा, ” देश की अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देने वाले नायकों को हम स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. राष्ट्र हमारे बहादुरों की शूरवीरता और बलिदान के लिए हमेशा कर्ज़दार रहेगा.”

करगिल विजय दिवस
युद्ध स्मारक पर तीनों सेनाओं के प्रमुख

1999 में जम्मू कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास पाकिस्तान की कब्जाई अपनी सीमान्त फौजी चौकियों को छुड़ाने के लिए भारत की सेना ने ये युद्ध लड़ा था जो 60 दिन चला. शून्य से भी कम तापमान वाले करगिल जैसे दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में भारतीय सेना के वीर जवानों ने अदम्य साहस और शूरवीरता का परिचय दिया था.

करगिल विजय दिवस
युद्ध स्मारक पर रक्षा राज्यमंत्री अजय भट्ट

ऐसे ऐसे स्थानों पर जाकर उन्होंने दुश्मन को सबक सिखाया जहां चलना तो दूर सामान्य तौर पर सांस लेना तक मुश्किल है. वजह ये है कि ये उतनी ऊंचाई वाले क्षेत्र हैं जहां हवा में ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम होती है. लेकिन इस युद्ध में अपने इलाके पर फिर से अपना नियंत्रण पाने के लिए भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. भारत ने करगिल के युद्ध में 500 से ज्यादा सैनिकों को गंवाया.

प्रादेशिक सेना में भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू

प्रादेशिक सेना
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय सेना की इकाई प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) में विभिन्न पदों पर भर्ती की प्रक्रिया की अधिसूचना जारी कर दी गई है. पात्र उम्मीदवारों से 20 जुलाई से 19 अगस्त के बीच ऑनलाइन आवेदन मांगे गए हैं. परीक्षा के लिए योग्य पाए गए उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा देशभर में अलग अलग केंद्रों पर 26 सितंबर 2021 को आयोजित की जायेगी.

सेना में शामिल होने के इच्छुक नौजवानों के लिए ये सुनहरा मौका है. प्रक्रिया के बारे में जानने और आवेदन करने के लिए और ज्यादा ब्यौरा जानने के लिए प्रादेशिक सेना की वेबसाइट jointerritorialarmy.gov.in पर लॉग इन करें. चयनित कर लिए जाने पर उम्मीदवार सिविलियन (नागरिक) के तौर पर भी और सैनिक तौर पर भी देश सेवा कर सकते हैं. आवेदन करने से पहले आवेदकों को शैक्षिक योग्यता, आयु, वेतन, चयन प्रक्रिया, परीक्षा के पैटर्न आदि के बारे में ठीक से जान लेना चाहिए.

प्रादेशिक सेना का गठन भारतीय संविधान सभा की तरफ से 1948 में पास किये गए एक अधिनियम के तहत किया गया. तदोपरांत इसकी स्थापना 1949 में हुई. प्रादेशिक सेना का मकसद संकटकाल में आंतरिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेना और ज़रूरत पड़ने पर नियमित सेना को एक बल प्रदान करना है. इस तरह ये नवयुवकों को देश सेवा का मौका भी देती है. सामान्य मजदूर से लेकर किसी विषय के विशेषज्ञ तक भारतीय नागरिक इसका हिस्सा बन सकते हैं बशर्ते वह शारीरिक रूप से सक्षम हों. इसमें भर्ती के लिए आयु सीमा 18 से 35 साल तक है.

पाकिस्तान से युद्ध में इस फ़ौजी ने जब बारूदी गंध वाली खट्टी बर्फ से भूख प्यास मिटानी चाही

मोहम्मद अफज़ल भट
मोहम्मद अफज़ल भट

दिसंबर का महीना. हाड़ मांस गला देने वाली सर्द अँधेरी रात और भारत-पाकिस्तान सीमा पर दोनों तरफ से होती गोलीबारी. क्षण भर के लिए रोशनी का अहसास भर तब होता था जब किसी बंदूक से लगातार फायरिंग होती थी. खून जमा देने वाली सर्दी में भी अच्छे अच्छों के पसीने निकाल देने के लिए काफी था ये मंजर जो 21 बरस के मोहम्मद अफज़ल भट और उसके कई साथी फौजियों ने पहली बार देखा और महसूस किया था. अफज़ल और उसके साथी बटालिक में तैनात जम्मू कश्मीर मिलीशिया (अब जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी) के जवान थे.

बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल ए जी मुनिआवाला ने इस अल्फ़ा कम्पनी को असाल्ट लाइन बनाकर एडवांस करने का आदेश दिया था. हालत ये थी कि किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. न पहाड़ी के ऊपर मौजूद पाकिस्तानी सैनिकों को और न ही उनकी तरफ चुपचाप और छिपते हुए आगे बढ़ रहे हिंदुस्तानी सैनिकों को. दोनों मुल्कों की सरहद के तौर पर दिखाई देने वाला कुछ था तो वो बस एक पहाड़ी नाला था. उसकी आड़ में चलते चलते ज़रा सी आवाज़ हुई नहीं कि पहाड़ी पर मौजूद दुश्मन की फायरिंग उसी दिशा में होने लगती थी. जहां दिन में चुनौती थी कि कहीं दुश्मन की नजर न पड़ जाए इसलिए घुटने और कोहनियों के बल रेंग रेंग कर भारतीय सैनिक आगे बढ़ रहे थे लेकिन रात को हालात और भी खतरनाक हो जाते थे. पहाड़ी की आड़ लेकर नाले के किनारे किनारे आगे बढ़ते वक्त तब खतरा और बढ़ जाता था जब अँधेरे में पैर की ठोकर लगने पर पत्थर लुढ़क जाया करता था. ज़रा सी हलचल या पत्थर की आवाज़ सुनते ही अलर्ट दुश्मन की बंदूक की गोलियों और मोर्टार के गोलों की बारिश उसी दिशा में होने लगती थी. जब ज़रूरत महसूस होती तो सामरिक रणनीति के हिसाब से ही दुश्मन को जवाब दिया जाता था क्यूंकि हमला करने के नजरिये से दुश्मन सैनिक बेहतर स्थिति में थे.

मोहम्मद अफज़ल भट
फौज में ड्यूटी के दौरान ऐसे थे मोहम्मद अफज़ल भट

…और जब दाहिनी पसलियों के ठीक नीचे लगी गोली आरपार

कभी धीरे धीरे तो कभी तेज़ लेकिन दुश्मन की नज़र बचाकर आगे बढ़ते रहना इनका मकसद था. ऐसे ही हालात के बीच न जाने कब दुश्मन की बंदूक से निकला बर्स्ट आया जिसने मोहम्मद अफज़ल को निशाना बनाया. दाहिनी तरफ से पहाड़ी से बरसी इन गोलियों से एक उसकी दाहिनी तरफ की पसलियों के ठीक नीचे लगी और पीठ से बाहर जा निकली. क्षण भर तो समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है. कुछ और कदम धीरे धीरे बढ़ाने के बाद अफज़ल रुक गया. अब आगे बढ़ना मुमकिन नहीं था.

सिपाही मोहम्मद अफ़ज़ल का हाथ अपनी कमर की तरफ गया लेकिन डर लग रहा था कि कहीं हाथ लगने से जिगर या अंतड़ियां ही बाहर न आ जायें. बस इसी वजह से अफज़ल भट ने उस तरफ ध्यान न देना तय कर लिया. अफज़ल ने एक चट्टाननुमा बड़े पत्थर की आड़ ले ली. पत्थर का आकार कुछ गुफा की तरह था. लाइट मशीनगन पास में थी और वहां तकरीबन 5000 गोलियों से भरा बक्सा भी था. अफज़ल ने वहीं पर मोर्चा सम्भाल लिया. क्यूंकि सब साथी एडवांस कर रहे थे इसलिए उन्हें आगे बढ़ना ही था.

मोहम्मद अफज़ल भट
मोहम्मद अफज़ल भट अपनी पत्नी के साथ (फाइल)

साथियों ने मरा जानकर छोड दिया 

गोली लगने के बाद अफज़ल की हालत देख कुछ साथी उसे मृत ही समझ बैठे थे. ऐसे हालात ही नहीं थे कि उस वक्त किसी मृत या घायल साथी के इलाज के बारे में सोचा जा सके. अफज़ल को ठीक से याद ही नहीं कि कितने दिन वो भूखा प्यासा उस पत्थर के नीचे पड़ा रहा. युद्ध के लिए रवाना होने से पहले जो थोड़े से शकरपारे पिट्ठू बैग में रखे थे वो ख़त्म हो चुके थे. पानी भी खत्म था. भूख-प्यास की हालत में कभी कभी बेहोश भी हो जाता रहा होगा. जब नहीं रहा गया तो किसी तरह रेंगकर और साथ ही अपने बंदूक को भी धीरे धीरे आगे खिसकाते हुए गुफानुमा पत्थर से ज़रा बाहर आया और वहां जमी पड़ी बर्फ को ही खाना चाहा लेकिन ये क्या..! बर्फ तो मुंह में रखते ही बाहर उलट दी. गोली बारूद इतना चला था कि उसका स्वाद और गंध बर्फ में समा गए थे. अफजल शायद फिर से बेहोश हो गया. कई साथियों ने तो यकीन कर लिया कि अफजल अल्लाह को प्यारा हो गया. मोहम्मद अफज़ल को ठीक से याद नहीं कि इस हालत में कितने दिन बिताये होंगे. पूछा तो बोले, ” शायद 10-12 दिन”.

कहीं अंतड़ियां या गुर्दा ही बाहर न आ जाए

‘मुझे तो बस यही डर लगता था कि पेट के आसपास जहां से खून निकल रहा है वहां अपने आप कुछ करना चाहूँ तो कहीं ऐसा न हो कि अंतड़ियां या गुर्दा ही बाहर आ जाए. मैंने जब अपने दाहिने पैर से बूट उतारा तो वो मेरे उस खून से भरा पड़ा था जो कमर से रिसता हुआ टांगों से बहते पैरों तक पहुँच गया था”, मौत को सामने से मात देने वाला पूर्व सैनिक अफज़ल 50 साल पुराने युद्ध में आपबीती को ऐसे बता रहा था मानो सामने कोई फिल्म चल रही हो और साथ में उसकी कमेंटरी.

मोहम्मद अफज़ल भट
मोहम्मद अफज़ल भट अपनी पत्नी के साथ

अंतिम रस्में पूरी की गई…

उधर पाकिस्तान के हथियार डाल देने के साथ ही 1971 के इस युद्ध में सीजफायर हो गया लेकिन अनंतनाग के पहलू गाँव के नौजवान मोहम्मद अफज़ल के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. न सेना से खबर आई न किसी फौजी ने आकर बताया. बस गाँव में इतनी सूचना आई कि घायल हुए सैनिकों में से कइयों को राजधानी श्रीनगर के अस्पताल में लाया गया है. अफज़ल को खोजते अस्पताल पहुंचे उसके पिता हबीब भट को वहां पर इलाज के लिए भर्ती कराए गये घायल सैनिकों ने अफज़ल के मारे जाने के बारे में बताया. ज़ाहिर सी बात है कि तीन साल पहले पत्नी की मौत का सदमा और उसके बाद तीन बच्चों में से सबसे बड़े बच्चे अफज़ल को सेना के हवाले कर चुके हबीब भट को खबर ने भीतर से तोड़ दिया होगा. जवान बेटे की लाश तक न मिल पाने की तकलीफ ने इस गम को और बढ़ा दिया. खैर, वापस अपने गाँव पहलू लौटकर अंतिम रस्में पूरी की गई… कुरान खानी वगैरह.

भाई की तरह नर्स ने सेवा की

इधर राजधानी श्रीनगर के करीबी ज़िले अनंतनाग के पहलू गाँव में अफज़ल को शहीद मान कर सलाम किया जा रहा था और उधर लेह के अस्पताल में ज़िन्दगी के लिए संघर्ष कर रहा फौजी अफज़ल सेवा में रत नर्सों को दिन में सैकड़ों बार सलाम करता था. भारी भरकम गोला बारूद के साथ पहाड़ चढ़ते हुए दुश्मन से मुकाबला करते रहने वाला ये जवान उस हालत में था कि मल-मूत्र तक त्यागने के लिए किसी के सहारे की ज़रुरत पड़ती थी. खाने-पीने से लेकर नहलाने धुलाने और अफज़ल के कपडे बदलने तक का काम अस्पताल में नर्स खुशमिजाजी से करती थीं. मोहम्मद अफज़ल अस्पताल में बिताये उस वक्त को याद करते ही बेहद भावुक हो उठते हैं. कहते हैं, ” प्यार से उतनी सेवा कोई अपना ही सगा कर सकता हो. वो मेरी सेवा ऐसे करती थीं जैसे मैं उनका भाई हूँ. डॉक्टरों ने मुझे बताया कि मेरी जिंदगी मुश्किल से बची है. अगर गोली सूत भर भी इधर उधर होती तो मेरी रीढ़ में लगती. ऐसे में मेरा इतने दिन वहां पड़े रहकर बचना तो नामुमकिन था”.

मोहम्मद अफज़ल भट
मोहम्मद अफज़ल भट का परिवार.

ईमान की जीती जागती मिसाल

इतना ही नहीं जब थोड़ा सा सम्भला और मैंने अपने घर की बात बताई तो नर्स ने मुझे 4000 रुपये देने चाहे और कहा कि ये रखो और जब चाहो लौटा देना. ये बताते हुए 65 बरस के मोहम्मद अफज़ल के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. बोले, ‘मैंने सोचा कि अगर पैसा ले भी लूं तो लौटाऊँगा कैसे? तब पैसा पहुंचाने का कोई साधन भी नहीं था. मुझे तब ये मेरी बहन तो बेईमान समझेगी’. मैंने उसे कहा, “मेरे सीओ के पास मेरा पैसा हिफाज़त से है, तुम चिंता न करो.” डॉक्टरों और नर्सों की मेहनत रंग लाई और मोहम्मद अफज़ल सेहतमंद हो गये. उन्हें कुछ और फौजियों के साथ लेह से विमान में श्रीनगर लाया गया. अफज़ल कहते हैं, ‘वो पहली बार बार था मैं हवाई जहाज़ में बैठा’. गाँव पहुँचने पर अफज़ल को देख सब हैरान थे. किसी को उनके ज़िंदा होने पर आसानी से यकीन ही नहीं हो रहा था. लेकिन इस फौजी अफजल की ज़िन्दगी ने तो अभी और उतार चढ़ाव देखने थे जो मां की मौत के बाद घर बार छोड़कर 18 साल की उम्र में भाग गया था. पढ़ाई लिखाई तो दूर स्कूल की शक्ल तक नहीं देखी थी. अफज़ल कहते हैं, ” साब जी, फौज में भर्ती होने के बाद तीन महीने तक तो अंगूठा लगाकर तनख्वाह ली है मैंने’.

(अब नाती पोते वाले हो गये मोहम्मद अफजल भट की जिंदगी के संघर्ष और भी हैं. उनके फौजी जीवन के करियर की शुरुआत कैसे हुई और इस दौरान कैसी कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा..! इस सबके साथ इस जांबाज की वर्तमान चिंताओं का भी खुलासा करने वाला आलेख रक्षक न्यूज़ पर अगली कड़ी के तौर पर प्रकाशित किया जाएगा)

दिलचस्प किरदार का मालिक 1971 का युद्धवीर मोहम्मद यूसुफ खान

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परम बीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज

आईपीएस अधिकारी परमबीर सिंह
आईपीएस अधिकारी परमबीर सिंह

मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर आईपीएस अधिकारी परम बीर सिंह के खिलाफ धनवसूली के मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई है. उन पर एक बिल्डर से 15 लाख रुपये वसूलने का इलज़ाम है. परम बीर के साथ इस मामले में एक डीसीपी समेत 5 पुलिसकर्मियों को भी एफआईआर में नामजद किया गया है. परम बीर वर्तमान में महाराष्ट्र में होमगार्ड्स के महानिदेशक हैं.

मुंबई के मैरीन ड्राइव थाने में 22 जुलाई को दर्ज की गई इस एफआईआर में इलज़ाम लगाया गया है कि परम बीर ने डीसीपी (पुलिस उपायुक्त) और अन्य पुलिसकर्मियों के ज़रिये 15 लाख रुपये की मांग की थी. इस एफआईआर में दो नागरिकों को भी नामजद किया गया है. इस प्राथमिकी में धन वसूली, धोखाधड़ी, जालसाज़ी और आपराधिक षड्यंत्र रचने जैसे अपराध से सम्बन्धित धाराएं लगाई गई हैं. परम बीर के अलावा इस केस में कई पुलिसकर्मियों के नाम हैं : डीसीपी (क्राइम ब्रांच) अकबर पठान, इन्स्पेक्टर श्रीकांत शिंदे, आशा कोरके, नन्द कुमार गोपाले और संजय पाटिल.

उल्लेखनीय है कि इससे पहले इसी साल पुलिस अधिकारी सचिन वाज़े की गिरफ्तारी और बर्खास्तगी के बाद परम बीर सिंह को मुम्बई के पुलिस आयुक्त पद से हटा दिया गया था.

نوشہرہ کا شیر جس نے پاک فوجی سربراہ بنانے کی جناح کی پیش کش بھی ٹھکرائی:

بریگیڈیئر محمد عثمان
اس وقت کے وزیر اعظم جواہر لال نہرو کے ساتھ نوشہرہ کا شیر

وہ صرف 12 سال کا تھا جب گاو ¿ں میں ایک کنویں میں ڈوبتے بچے کی جان بچانے کے لئے اپنی جان کی پرواہ کئے بغیر کنویں میں چھلانگ لگا دی تھی۔ نہ صرف یہ 35 سال کی عمر میں کسی ملک نے اسے اپنی فوج میں شامل ہونے اور بعد میں فوجی سربراہ بننے کا وعدہ کیا تھا ، لیکن اس نے اسی ملک کی فوج سے مقابلہ کرتے ہوئے خود کو قربان کرنا بہتر سمجھا۔ انھیں ‘ نوشہرہ کا شیر’ کا خطاب ملا۔ یہاں ذکر کیا جارہا ہے ہندوستانی فوج کے لئے فخر بننے والے شہید بریگیڈیئر محمد عثمان کا ۔جنھوں نے آج ہی کے دن 3 جولائی 1948 کو شہادت حاصل کی تھی۔ بریگیڈیئر محمد عثمان ، جسے بعد ازاں بہادری کے لئے دوسرے بڑے اعزاز ‘مہا ویر چکر’ سے نوازا گیا ۔بریگیڈیئر محمد عثمان حقیقی حب الوطنی اور سیکولرازم کی ایک عمدہ مثال ہیں۔ صرف یہی نہیں ، جنگ کے میدان میں شہید کا درجہ حاصل کرنے والے بریگیڈیئر عثمان ہندوستانی فوج کے اب تک کے اعلی درجے کے افسر ہیں۔

بریگیڈیئر محمد عثمان
نوشہرہ کی لڑائی کی ایک تصویر

پاک فوج کی پیش کش:

15 جولائی ، 1912 کو اترپردیش کے اس وقت کے بی بی پور (موجودہ مﺅ) میں پیدا ہوئے بریگیڈیئر محمد عثمان ہندوستانی فوج کے ان مسلم افسروں میں سے ایک تھے جنہوں نے مذہب کے نام پر بانٹے گئے اس ملک پاکستان کی فوج میں شامل ہونے سے انکارکر دیا تھا۔ مذہب سے پہلے ملک یا پھر ملک ہی مذہب ہے جیسی سوچ کے مالک بریگیڈیئر محمد عثمان کی رگوں میں خون سے زیادہ حب الوطنی بہتی ہے۔ وہ بانی پاکستان ، مسلم لیگ کے رہنما اور پاکستان کے پہلے گورنر جنرل محمد علی جناح کی طرف سے آئے لالچ بھرے پیغام کو مکمل طور پر مسترد کر چکے تھے ، جس میں کہا گیا تھا کہ اگر محمد عثمان پاک فوج کا حصہ بن جائیں گے تو ایک دن ان کو پاک فوج کا سربراہ بنا دیا جائے گا۔

دباو ¿ میں نہ آئے:

در حقیقت اس وقت بریگیڈیئر عثمان 10 بلوچ رجمنٹ میں تھے اور اس کی 14 بٹالین کو کمانڈ کرررہے تھے۔ تقسیم ہند کے دوران بلوچ رجمنٹ پاک فوج کا حصہ بن گئی تھی۔ ایک مسلمان افسر ہونے کے ناطے بریگیڈیئر محمد عثمان پر بھی پاکستانی فوج میں شامل ہونے کا زبردست دباو ¿ تھا لیکن انہوں نے خود کو اس دباو ¿ سے باہرنکال لیاتھا ۔ اسی کے ساتھ ان کا تبادلہ بلوچ رجمنٹ سے ڈوگرہ رجمنٹ کر دیا گیا۔

زمین پر سو نا:

یہی نہیں ، 1947 میں پاکستان نے پہلے مسلح قبائلی لوگوں کو ریاست جموں و کشمیر پر قبضہ کرنے کے لئے بھیجا ، اور پھر ان کی حمایت کرتے ہوئے پاک فوج نے 25 دسمبر 1947 کو جھنگر پر قبضہ کرلیا۔ بریگیڈیئر محمد عثمان ، جو اس وقت 77 پیراشوٹ بریگیڈ کو کمانڈ کر رہے تھے ،ان کو 50 ویں پیرا کمانڈکرنے کیلئے جھنگر بھیج دیا گیا۔ اسی دن محمد عثمان نے قسم کھائی کہ جب تک کہ جھنگر سے پاک فوج کو پیچھے نہیں ڈھکیل دیں گے اور جھنگر کو ہندوستان کو واپس نہیں دلا دیں گے تب تک چین سے نہیں سوئیں گے ۔اور سچ میں وہ پر سکون نہیں سوتے تھے۔ وہ بستر پر نہیں بلکہ زمین پر ایک چٹائی پر سوتے تھے۔ جب ان سے پوچھا گیا کہ ایسا کیوں ہے تو ان کا جواب یہ تھا کہ جب تک پاک مقبوضہ کشمیر کے اس حصہ کو ہم واپس نہیں لے لیں گے تب تک وہ بستر پر سو نہیں سوئیں گے۔یہ قسم پوری کرنے میں ان کوتین ماہ لگے ، لیکن اس قسم کو پورا کرنے میں انہیں اپنی سب سے بڑی قربانی دینا پڑی۔

بریگیڈیئر محمد عثمان
پیراٹروپر نے بریگیڈیئر عثمان کو
سلام پیش کیا

نوشہرہ کاشیر:

جنوری اور فروری 1948 میں بریگیڈیئر عثمان نے نوشہرہ اور جھنگر میں پاکستانی فوج پر زبردست حملے کئے۔ یہ دونوں ہی جگہیں بہت اہمیت کی حامل تھیں۔ پاکستان کو نوشہرہ کو بچانے کے لئے جنگ کے دوران زبردست نقصان اٹھانا پڑا۔ اس جنگ میں ہندوستان کے 35 فوجی مارے گئے تھے، لیکن پاکستان کے تقریباً 1000 فوجی مارے گئے اورتقریباً 1000 زخمی بھی ہوئے۔ اس جنگ کے بعد بریگیڈیئر عثمان کا نام ہی پڑ گیا’ نوشہرہ کا شیر‘۔

پاکستان نے رکھا انعام :

نوشہرہ کی شکست سے پاکستان اتنا بوکھلا گیا تھا کہ اس نے بریگیڈیئر عثمان کے سر پر انعام رکھ دیا۔ان نے اعلان کیا کہ جو بھی بریگیڈیئر عثمان کا سر لائے گا اسے 50000 روپے انعام دیا جائے گا۔اتنی شہرت ملنے کے باوجود بھی بریگیڈیئر عثمان اپنے عزم پر قائم رہے۔

بریگیڈیئر محمد عثمان
نوشہرہ کا شیر

اس وقت کے لیفٹیننٹ جنرل کے ایم کیریپپا (جو بعد میں ہندوستان کے فوجی سربراہ بنے اورریٹائرمنٹ کے بعد فیلڈ مارشل بھی بنے) نے ویسٹرن کمانڈ کا چارج سنبھال لیا۔ پھر ان کی نگرانی میں فوج نے فروری 1948 کے آخری ہفتے میں دو آپریشن شروع کئے۔ ایک تھا جھنگر اور دوسرا آپریشن تھا پونچھ۔ اس بار ہندوستانی فوج کی 19 ویں انفنٹری بریگیڈ شمالی پہاڑی کی طرف آگے بڑھی جبکہ 50 پیرا بریگیڈ نے اس پہاڑی علاقے کو دشمن سے خالی کرایا جو نوشہرہ جھنگر روڈ کے جنوب میں تھا۔ آخر کار جھنگر سے دشمن کو پسپا کردیا گیا اور ہندوستانی فوج نے اپناقبضہ جمالیا۔ پاکستان نے جھنگر میں اپنی فوج کو باقاعدہ میدان جنگ میں اتار دیا۔ یہ مئی 1948 کی بات ہے۔ اس بار پاکستان اتنا بوکھلا گیا کہ اس نے جھنگر میں زبردست بمباری شروع کردی۔ اس کے باوجود بریگیڈیئر عثمان نے جھنگر کو اپنے ہاتھ سے جانے نہیں دیا حالانکہ اس طرح کے ایک اور مقابلے میں بم دھماکے کے دوران ایک حملے میں وہ اپنی جان سے ہاتھ دھو بیٹھے۔

شہیدکا درجہ :

حکومت نے انھیں شہید کا درجہ دیا۔ اس وقت کے وزیر اعظم جواہر لال نہرو اور ان کی کابینہ کے ممبران بھی انھیں آخری سفر پر روانہ کرنے کیلئے شریک ہوئے تھے۔اپنی سالگرہ سے 12 دن پہلے شہید ہوئے بریگیڈیئر عثمان کے آخری الفاظ یہ تھے کہ بھلے ہی میری جان چلی جائے مگر وہ علاقہ دشمن کے قبضہ میں نہیں جانا چاہئے۔ اس بہادر بریگیڈیئر کو ریاستی اور فوجی اعزاز کے ساتھ بھیجنے کے ساتھ حکومت نے مہاویر چکر دینے کا اعلان کیا۔

بریگیڈیئر محمد عثمان
جھنگر میں بریگیڈیئر عثمان کا مجسمہ۔

فوج میں کریئر:

مارچ 1935میں برطانوی دور حکومت کے دوران فوج میں شامل ہوئے محمد عثمان کو اپریل 1936میںلیفٹیننٹ بنایا گیااور 31اگست 1941میں ترقی دے کر کیپٹن کا عہدہ دیا گیا۔

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