बहुत कुछ कहती है कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की ये दीपावली

जबरदस्त जोखिम के बीच लगातार चलने वाली घंटों की ड्यूटी का दबाव हावी हो तो भला कोई उत्सव कैसे मना सकता है ? ये सवाल किसी के भी जेहन में तब आना आना स्वाभाविक है जब आतंकवाद प्रभावित जम्मू कश्मीर जैसी जगह में सेना , अर्द्धसैनिक बल या पुलिस के जवानों को बच्चों की तरह खेलते , कूदते , नाचते गाते खुशी मनाते दिखाई दें .

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सीमा पर दीवाली
कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की दीपावली.

जबरदस्त जोखिम के बीच लगातार चलने वाली घंटों की ड्यूटी का दबाव हावी हो तो भला कोई उत्सव कैसे मना सकता है ? ये सवाल किसी के भी जेहन में तब आना आना स्वाभाविक है जब आतंकवाद प्रभावित जम्मू कश्मीर जैसी जगह में सेना , अर्द्धसैनिक बल या पुलिस के जवानों को बच्चों की तरह खेलते , कूदते , नाचते गाते खुशी मनाते दिखाई दें . इसका जवाब एक ही है जो सिर्फ भारतीय सुरक्षा बलों और पुलिस के जवानों के पास है जो तमाम तरह के दबावों के बीच थोड़े से भी फुर्सत के पल मिलने पर उनको मस्ती में सराबोर पर्व में तब्दील कर डालते हैं . रक्षक न्यूज़ टीम ने बीती दीपावली की रात ऐसे ही जोशीले जवानों के बीच बिताई .

सीमा पर दीवाली
कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की दीपावली.

अपने परिवारों से सैंकड़ों मील दूर दिन भर तनाव , थकान और जोखिम से भरी ड्यूटी करते रहे और फिर आधी रात तक अपने साथियों के साथ उत्सव मनाते रहे . यही नहीं कडकडाती ठंड में तडके उठकर 6 फिर ड्यूटी के लिए निकल पड़े ताकि देश और देशवासी सुरक्षित रहें . उस पर दिलचस्प यह कि उनका नेतृत्व एक महिला अधिकारी करती है. बहुत से लोगों के लिए ये एक और हैरानी की बात हो सकती है . ये अधिकारी हैं केन्द्रीय रिज़र्व पुलस बल (सीआरपीएफ ) की सहायक कमांडेट साल्वे मोनिका. सुरक्षा कारणों से यहां पर इस यूनिट का और स्थान का के नाम का ज़िक्र नहीं किया जा रहा है लेकिन ये कैम्प ऐसा है जो पहले फिदायीन हमले का शिकार हो चुका है. बीते साल भी यहां तैनात जवानों के वाहन पर बम फेंका गया था. कुछ और भी आतंकवादी गतिविधियां इस क्षेत्र में होती रही हैं लिहाज़ा सुरक्षा के नजरिये से यह काफी संवेदनशील जगह है .

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कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की दीपावली.

भारत के विभिन्न प्रान्तों यूपी , बिहार , केरल , ओडिशा , असम , मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र आदि के इन जवानों ने धार्मिक और सांस्कृतिक तौर तरीकों के साथ यहां दीपावली पर्व की शानदार शुरुआत की. इनमें विभिन्न मजहबों को मानने वाले जवान थे. त्यौहार की खुशी को यहां अलग अंदाज़ से शुरू हुए सिलसिले ने बढ़ा दिया . हंसी मज़ाक के लम्हों के बीच यहां उन फन गेम्स से शुरुआत हुई जो आमतौर पर स्कूली स्तर के बच्चे खेलते हैं या कुछ परम्परागत भारतीय मेलों में दिखाई पड़ते रहे हैं . कागज़ का हवाई जहाज़ बनाना और फिर 10 -12 फुट दूर हवा में लटके रिंग में से उस पार पहुँचाना . पांच पेंसिलों को हवा में उछाल एक साथ लपकने पर नाकाम रहने पर सज़ा भुगतना और सज़ा के तौर पर आते से पूरा मूंह सान दिया जाना , बचपन में खेले गए कंचों से ज़ोर आजमायश जैसे कुछ और मस्ती भरे खेल यहां खिलाये गए . इसके बाद चुटकुलेबाजी , नाच – गाने का सिलसिला तो ऐसा शुरू हुआ कि पहले पहल हिचकिचाने वाले जवान फिर खुद शुरुआत करने पर आमादा दिखे . शायद ये सिलसिला और चलता लेकिन डिनर में पहले से ही हुई देरी और सुबह सुबह की ड्यूटी के समय को ध्यान में रखते हुए समापन का आदेश दिया गया.

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कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की दीपावली.

मस्ती – मनोरंजन के बाद ऐसे मौकों पर सुरक्षा बलों व पुलिस रवायत के मुताबिक़ बड़ा खाना आयोजित किया गया. जवान से लेकर अधिकारियों तक सभी रैंक ने ज़मीन पर पंगत में बैठ साथ खाने का भरपूर मज़ा लिया. सबसे अच्छी बात ये कि इस पूरे आयोजन में एक दूसरे से मस्ती भरी शरारतें भी हुई और वैसी बातें भी हुई लेकिन सम्मान के साथ .

सीआरपीएफ जवानों के साथ मनाई इस दीवाली का ये अनुभव दो बातें स्पष्ट करता है : पहली तो ये कि समाज में पूजा पद्धति , रीती रिवाजों , खान पान, भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर नफरत के बीज बोने वालों को इस मुल्क में कभी भी वो स्थाई कामयाबी नहीं मिल सकती जिसके बूते वो अपनी मन मर्जी करना चाहते हों . चाहे वो सियासत में हो या किसी और क्षेत्र में. जैसे ही यहां दीवाली मनाई गई वैसी ही ईद मनी थी और वैसी ही ख़ुशी क्रिसमस की मनाई गई थी .

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कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की दीपावली.

दूसरा ये कि इस यूनिट को कमान करने वाली मोनिका साल्वे खुद एक मराठी या यूं कहें कि एक गैर हिन्दी प्रांत महाराष्ट्र के एक गांव से ताल्लुक रखने वाली युवा अधिकारी हैं . लेकिन न जवानों को उनसे किसी तरह से बात करने या समझने – समझाने में दिक्कत और न ही हिचकिचाहट . एक अधिकारी के नाते और मातहतों से सम्मान के साथ उनकी कमान की स्वीकारोक्ति भी यहां स्पष्ट दिखाई दी . ये साबित करता है फोर्स में आने के बाद महिला – पुरुष के भेद को कम करना बिलकुल भी मुश्किल नहीं है. ये उन परिवारों के लिए भी एक संदेश है जो परिवार बेटियों को फोर्सेस में भेजने से सिर्फ इसलिए हिचकते हैं कि वो महिला है.

सीमा पर दीवाली
कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ जवानों की दीपावली.