भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए बनने वाले दो जहाजों की कील रखी गई

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जहाजों की कील रखे जाने के कार्यक्रम में जीएसआई की महानिदेशक वर्षा अशोक अगलावे और जीआरएसई के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक कमोडोर पीआर हरि सहित अन्य अधिकारी.
जहाजों की कील रखे जाने के कार्यक्रम में जीएसआई की महानिदेशक वर्षा अशोक अगलावे और जीआरएसई के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक कमोडोर पीआर हरि सहित अन्य अधिकारी.
भारत के  रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली कंपनी, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (garden reach shipbuilders and engineers ltd) भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (geological survey of india) के दो तटीय अनुसंधान पोत बना रहा है . इन जहाजों की कील (keel ) मंगलवार को रखी गई . जीएसआई की  महानिदेशक  वर्षा अशोक अगलावे इस रस्मी कार्यक्रम के अवसर पर मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित थीं.

किसी भी जहाज की कील इंसानों की रीढ़ जैसी होती है. जहाज का पूरा ढांचा इसी से जुड़ा होता है, जो प्लेटफॉर्म को ज़रूरी मजबूती देता है. कील रखना (keel laying) जहाज बनाने की प्रक्रिया में एक अहम पड़ाव है, क्योंकि इसी मुख्य हिस्से के आस-पास जहाज के मुख्य ढांचागत हिस्से आकार लेने हैं.

एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़ दिए गए ब्यौरे में कहा गया है कि बनाए जाने वाले ये  तटीय अनुसन्धान पोत ( coastal research vessel ) यानि सीआरवी  64 मीटर लंबे और 13 मीटर चौड़े होंगे और इसकी क्षमता तकरीबन  461 टन भार उठाने की होगी. यह लगातार 15 दिन तक काम करने की क्षमता रखते हैं  और इनकी अधिकतम गति 10 नॉट होगी. हर जहाज पर 35 लोगों के रहने की सुविधा उपलब्ध होगी.

इन अनुसन्धान पोत  में समुद्र में जियोलॉजिकल मैपिंग, खनिजों की खोज (ड्रेजिंग सहित), समुद्री पर्यावरण की निगरानी और अनुसन्धान  करने की क्षमता होगी. इनमें डेटा प्रोसेसिंग और सैंपल एनालिसिस के लिए आधुनिक और अच्छी तरह से सुसज्जित वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं होंगी. इन जहाजों में ‘डायनामिक पोजिशनिंग-1’ लगाया जाएगा ताकि ये ‘सी स्टेट 3’ (समुद्र की स्थिति 3) में भी अपनी जगह पर बने रह सकें. डीजल-इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन से चलने वाले और डीजल जनरेटर से थ्रस्टर्स को चलाने वाले ये जहाज भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) में 5 से 1,000 मीटर की गहराई में काम करेंगे.

जीआरएसई  अभी भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत ‘नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च’ (NCPOR) के लिए एक समुद्री अनुसन्धान पोत  (ocean research vessel ) और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तहत ‘नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी’ (NPOL) के लिए एक एकोस्टिक रिसर्च शिप (ARS) बना रहा है.

जीएसआई की महानिदेशक  वर्षा अशोक अगलावे ने इस अवसर पर कहा – बन रहे दो तटीय अनुसंधान पोत  देश की ज़मीनी सीमाओं के बाहर हमारे खनिज संसाधनों का पता लगाने में बहुत काम आएंगे. एक बार चालू होने के बाद, ये जहाज भारत की ऑफशोर खनिज खोज क्षमताओं को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे. यह प्रोजेक्ट ‘आत्मनिर्भर भारत @2047’ की  हमारी  राष्ट्रीय सोच  और खनिज क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भरता हासिल करने के लक्ष्य के साथ पूरी तरह मेल खाता है.

जीआरएसई (grse) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक  कमोडोर पीआर हरि (रिटायर्ड) ने कहा – दो सीआरवी  की कील लेइंग (निर्माण की शुरुआत) एक अहम पड़ाव है, जो डिजाइन और प्लानिंग से जहाजों के असल निर्माण की ओर बढ़ने का संकेत है.  सभी हितधारकों  के बीच मजबूत सहयोग के साथ जीआरएसई को भरोसा है कि वह इन खास जहाजों को ‘जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ को समय पर और बेहतरीन स्तरीय मानकों   के साथ सौंप देगा.