जैसा कि शीर्षक ही स्पष्ट करता है वैसा ही कविता संग्रह यह है भी . तरह तरह की मानवीय संवेदनाओ , अनुभवों और स्मृतियों की जलधाराएं मानो इकट्ठा हो समन्दर बन कर एक किताब में समा गई हों. आसान भाषा में व्यक्त किए मानव मन को बस कवि मन से लिखा गया है.
अपने भीतर के विचारों और अनुभवों को औरों से भी जोड़ने की कोशिश इन कविताओं में कुछ इस तरह की गई है कि पाठक इनको पढ़ते हुए इनमें खुद को खोजता है . कवि का प्रकृति प्रेम तो पुस्तक के सादा और अर्थपूर्ण आवरण से ही झलकता है. पेड़ पर लटकी पीली हुई पत्तियाँ मानवीय जीवन के विभिन्न अनुभवों और यादों के साथ साथ इस वास्तविकता की भी प्रतीक हैं कि सबको अपनी अपनी भूमिका निभाते हुए संसार से जाना है. लेकिन इससे पहले बहुत कुछ जीना है वो चाहे पीड़ा हो , हर्ष हो , प्रेम हो , मिलन हो या बिछोह.
कवि आलोक कुमार ने कई रचनाओं को लय से स्वतंत्र भी रखा है . कहीं कहीं चंद शब्दों से बने छोटे वाक्य तो कहीं उनको विस्तार भी दिया गया है. संवादधर्मिता का गुण लिए कविताएं पाठक को आसानी से खुद को जोड़ लेती हैं . कविता आपसे बात करती है . कविताओं के अलग अलग विषय के जरिए कवि कहना चाहता है कि जीवन की तमाम घटनाओं , भावों और यादों की अलग अलग महक होती. हर किसी का जीवन इन महकों का साझापन लिए होता है . हर महक की एक अहमियत और भूमिका होती है .
हाल ही में प्रकाशित ‘ साझे लमहों की महक ‘ आलोक कुमार का लिखा पहला कविता संग्रह है जिसमें 76 कविताएं हैं. इसे वाणी प्रकाशन ने छापा है .
इस कविता संग्रह के मर्म को आसानी से समझना हो संतोष आनद का लिखा लोकप्रिय फ़िल्मी गीत ‘ जिन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है …’ याद आ जाता है. वैसे यह गीत शोर फिल्म का है लेकिन ‘ साझे लमहों की महक ‘ की कविता बिना शोर किए पाठक के अंतर्मन में जगह बनाती है.
लेखक के बारे में :
मूल रूप से बिहार के बेगू सराय के रहने वाले आलोक कुमार भारतीय पुलिस सेवा के एजीएमयूटी कैडर (agmut cadre ) के 1996 बैच के अधिकारी हैं. पटना कॉलेज से इतिहास की पढ़ाई करने के बाद दिल्ली आए और दिल्ली विश्विद्यालय से कानून की पढ़ाई की. आईपीएस अधिकारी बनने के बाद दिल्ली पुलिस समेत अन्य केंद्र शासित क्षेत्रों और केन्द्रीय पुलिस बलों में सेवा दी. वर्तमान में गोवा में पुलिस महानिदेशक ( director general of police ) हैं .

प्रकृति प्रेमी होने के कारण प्राकृतिक सौन्दर्य की खोज उनको अक्सर पहाड़ों पर ले आती है . उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र उनकी पसंदीदा जगहों में से एक है. आलोक कुमार कहते हैं मानते हैं कि कविता किसी अनुशासन की मोहताज नहीं होती . न तो इसके लिखने की परिस्थिति तय की जा सकती है और ही कालखंड . कविता खुद ब खुद आती है . वैसे ‘ साझे लमहों की महक ‘ संग्रह में छपी उनकी यह सभी कविताए वो हैं जो उन्होंने 2023 में लिखीं थीं . तब आलोक कुमार केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल ( central reserve police force ) में तैनात थे.










