बीस वर्षीय अक्षत त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का मूल निवासी है और गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी ( gautam buddha university) में बीए एलएलबी का छात्र है. 4 सितम्बर को उनके बारे में नोटिस जारी किया गया जिसमें आरोप लगाया गया कि अक्षत ने सरकार विरोधी भ्रामक बातें फैलाई और छात्रों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया . अक्षत के कारण शांति भंग होने के अंदेशे के मद्देनजर उसे बंध पत्र ( bond ) देने के लिए कहा गया . हालांकि पुलिस ने नोटिस वापस ले लिए लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इसका जिक्र हुआ. अदालत ने इसका संज्ञान भी लिया. चीफ जस्टिस सूर्यकांत इस पर सवाल किया कि जब इस मामले में हमने पहले ही निर्देश दे रखे है तो किसी मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई ऐसी कार्रवाई करने की ?
इससे पहले कि यूपी सरकार को इस मामले में जवाब देना भारी पड़े , एसीपी रवि शंकर के निलंबन और जांच का आदेश जारी कर दिया गया .
नीट पेपर लीक ( neet paper leak ) और उसके कारण 20 से ज्यादा छात्रों की खुदकुशी के मुद्दे पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था. इस इस प्रदर्शन में देश भर से हजारों युवाओं ने हिस्सा लिया था. सरकार के साथ समझौता बातचीत के बाद सीजेपी ने प्रदर्शन समाप्त कर दिया था लेकिन जब सरकार ने छात्रों के खिलाफ प्रदर्शन से संबद्ध केस वापस लेने व कोई कानूनी कार्रवाई न करने का वादा पूरा न किया गया तो यह पहलू फिर से सुप्रीम कोर्ट में सामने आया . तब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि प्रदर्शन में शामिल युवाओं के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज मामले वापस लिए जाएं और भविष्य में भी उनके खिलाफ इससे संबंधित कोई एक्शन न लिया जाए.
अक्षत जन्तर मन्तर पर प्रदर्शन में शामिल था. वह स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया का सक्रिय कार्यकर्त्ता और पदाधिकारी भी है. प्रदर्शन के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज में वह घायल भी हुआ था.

एसीपी (कार्यपालक मजिस्ट्रेट) का नोटिस :
सुप्रीम कोर्ट ने पहली सितम्बर को ही निर्देश दे दिए थे जबकि चार सितंबर को एसीपी (कार्यपालक मजिस्ट्रेट-तृतीय) ग्रेटर नोएडा डॉ रवि शंकर मिश्रा ने अक्षत त्रिपाठी को शांति भंग करने सहित विभिन्न मामलों को लेकर पांच लाख रुपये के मुचलके का नोटिस भेजा. इसके लिए थाना इको-प्रथम के उप निरीक्षक (sub inspector) शिवा पांडेय की रिपोर्ट को आधार बनाया गया . रिपोर्ट में एसआई शिव पांडेय ने लिखा था कि संबंधित छात्र अपने साथ विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों को धरने में लेकर पहुंचा था. इस दौरान सरकार के विरोध में भ्रामक बातों को फैला कर बाकी छात्रों को उकसाया जा रहा था, जिससे शांति भंग की संभावना बनी थी.
अब पुलिस का बयान :
बुधवार को एक आधिकारिक बयान में नोएडा पुलिस ने कहा कि यह नोटिस विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में बीएनएनएस (bnns ) की धारा 126 और 135 के तहत जारी किया गया था, जिसमें शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने की ज़रूरत थी. जैसे ही यह मामला वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में आया, गलत तरीके से जारी किए गए नोटिस को 5 सितंबर 2026 को रद्द कर दिया गया. बयान में कहा गया कि नोटिस जारी करने में शामिल कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पहले ही शुरू कर दी गई है.
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 135 कानूनी प्रावधान हैं जिनका इस्तेमाल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए करते हैं.
क्योंकि मामले में जिक्र ‘ मजिस्ट्रेट ‘ का हुआ था और गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट के पद पर मेधा रूपम ( medha roopam) हैं और इसमें उनके नाम को लेकर चर्चा भी होने लगी. मेधा रूपम एक प्रभावशाली अफसरशाह परिवार से ताल्लुक रखती हैं . उनके पति तो वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं ही पिता ज्ञानेश कुमार भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ( chief election commissioner ) हैं जिनकी वर्तमान सत्त्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार से निष्ठा छिपी नहीं है . शायद यही कारण है जो पुलिस को अपने बयान में स्पष्ट करना पड़ा कि गौतम बुद्ध नगर के ज़िला मजिस्ट्रेट इस मामले में शामिल नहीं थे. पुलिस बयान में कहा गया कि चूंकि गौतम बुद्ध नगर में पुलिस आयुक्त सिस्टम लागू है, इसलिए संबंधित नोटिस गौतम बुद्ध नगर के मजिस्ट्रेट III के कार्यालय द्वारा जारी किया गया था.
अक्षत ने उठाए सवाल :
इसके जवाब में त्रिपाठी ने कहा कि भले ही नोटिस वापस लिया गया लेकिन यह जारी क्यों किया गया ..इसका उन्हें जवाब चाहिए . अक्षत त्रिपाठी कहना है कि उसने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था और लेकिन वे 25 मई के बाद से अपनी यूनिवर्सिटी गया ही नहीं. इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में अक्षत ने पूछा , “जब मैं 25 मई के बाद से अपनी यूनिवर्सिटी गया ही नहीं, तो मुझ पर लोगों को भड़काने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है?” अक्षत का कहना है कि मई के आखिर में यूनिवर्सिटी में दो महीने की छुट्टियां घोषित होने के बाद वे हॉस्टल छोड़कर चला गया था.
अक्षत ने कहा कि छुट्टियां खत्म होने के बाद, एक महीने तक हमारी क्लास ऑनलाइन चलीं क्योंकि प्रशासन का कहना था कि कॉलेज की बिल्डिंग में मरम्मत का काम चल रहा है. जबकि नोटिस में कहा गया है कि मैंने छात्रों को उकसाया, यह कैसे हो सकता है? लगभग पूरे जुलाई महीने के दौरान, मैं इलाहाबाद हाई कोर्ट में इंटर्नशिप कर रहा था.
कमिश्नरेट प्रणाली में पुलिस के अधिकार:
उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर एक्ट, गुंडा एक्ट, शांति भंग, उपद्रव की आशंका में किसी को भी पाबंद करने, जमीन को कब्जा मुक्त कराने और अवैध कमाई से खरीदी गई जमीन को कुर्क करने के अधिकार पुलिस कमिश्नरेट के पास होते हैं. इन्हीं अधिकारों के तहत गौतमबुद्धनगर के एसीपी (कार्यपालक मजिस्ट्रेट-तृतीय) ने नोटिस जारी किया था .
वैसे यह अधिकार डीएम के पास होते हैं. जहां पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली नहीं है वहां गैंगस्टर एक्ट लगाने, गुंडा एक्ट लगाने, धरना- प्रदर्शन की अनुमति देने, किसी भी व्यक्ति से शांति भंग होने की आशंका में पाबंद करने या निरोधात्मक कार्रवाई करने के सारे अधिकार जिलाधिकारी के पास होते हैं. उनके साथ अपर जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम), उप जिलाधिकारी (एसडीएम) को भी अधिकार हस्तांतरित किए जा सकते हैं.
कौन हैं एसीपी डॉ. रवि शंकर मिश्रा:
डॉ. रवि शंकर मिश्रा राज्य पुलिस सेवा ( पीपीएस ) के 2018 बैच के अफसर अधिकारी है जिनकी भर्ती 31 मई 2021 को हुई थी. वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के हैं.










