उत्तर प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं सामने आ रहीं हैं जो शर्मनाक भी है और पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली और कार्य क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ( allahabad high court) की बुधवार को यूपी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए ‘ झूठों के झुंड ‘ की संज्ञा देते हुए की गई टिप्पणी के पीछे भी कारण ऐसे ही हैं . हाई कोर्ट ने चार लोगों को कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखने के मामले में थाने की सीसीटीवी फुटेज ( cctv footage ) गायब होने पर उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की कड़ी आलोचना की. यही नहीं अदालत ने यह भी आदेश दिया कि उन चारों लोगों दिए जाने वाली धनराशि देवरिया के गौरी बाज़ार थाने के एसएचओ के वेतन से वसूली जाए जिनको हिरासत में रखा गया .
उपरोक्त टिप्पणी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ( justice atul sreedharan) और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत ( divesh chandra samant) की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण ( habeas corpus ) याचिका पर सुनवाई के दौरान की. अदालत ने देवरिया के पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर शंकर को भी फटकार लगाई.
यह मामला 13 अप्रैल से 24 अप्रैल, 2026 के बीच चार लोगों को कथित तौर पर हिरासत में रखने से संबंधित है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें 10 दिन तक गैर-कानूनी तरीके से थाने में बंद रखा.
पिछली सुनवाई में, हाई कोर्ट ने गौरी बाजार थाने में लगे सीसीटीवी कैमरों और उस समय की फुटेज के बारे में जानकारी मांगी थी. बुधवार को एसपी और एसएचओ ने बताया कि थाने का सीसीटीवी कैमरा खराब था और काम नहीं कर रहा था.
जस्टिस अतुल श्रीधरन पुलिस अधिकारी के स्पष्टीकरण से नाखुश थे. कोर्ट ने पूछा, “इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद एसएचओ को सस्पेंड क्यों नहीं किया गया ?
इसके जवाब में जब एसपी ने माफ़ी मांगी तो उन्होंने कहा – कोर्ट से नहीं, बल्कि उन लोगों से माफ़ी मांगिए जिन्हें हिरासत में रखा गया था. सुनवाई के दौरान जस्टिस अतुल श्रीधरन ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पुलिस अधिकारियों को ‘झूठों का झुंड’ तक कह दिया.
इन चार लोगों ने इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस के कामकाज पर सवाल उठाए.
सबसे पहले, पूरा मामला समझें :
देवरिया के गौरी बाजार थाने में कई दिनों तक चार लोगों को हिरासत में रखने का मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा . महेंद्र गौड़ और तीन अन्य लोगों का आरोप है कि पुलिस ने कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना उन्हें थाने में रखा.
चारों ने हाई कोर्ट में ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की। उनका कहना है कि उन्हें 13 अप्रैल से 24 अप्रैल, 2026 के बीच अलग-अलग समय तक थाने में रखा गया था. कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि उन्हें लगभग 10 दिनों तक हिरासत में रखा गया.
मामले की सुनवाई जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की पीठ कर रही है. आरोपों की जांच के लिए हाई कोर्ट ने थाने से सीसीटीवी फुटेज मांगी थी. पुलिस का जवाब था कि सीसीटीवी खराब था, लेकिन थाने की डायरी में ऐसी कोई एंट्री नहीं थी.
2 सितंबर को उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को बताया कि घटना से पहले ही पुलिस स्टेशन का सीसीटीवी खराब हो गया था. इसके बाद, हाई कोर्ट ने देवरिया के एसपी और थाना प्रभारी को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया.
बुधवार को सुनवाई हुई. अदालत ने एसएचओ से पूछा, “अगर कैमरा 14 अप्रैल से काम कर रहा था, तो उसकी रिकॉर्डिंग कहाँ है? आप दो महीने से एसएचओ हैं. रिकॉर्डिंग कहाँ है?” एसएचओ ने बताया कि सीसीटीवी 12 अप्रैल, 2026 को ही खराब हो गया था.
कोर्ट ने फिर पूछा कि क्या कैमरा खराब होने की जानकारी थाने की डायरी में दर्ज की गई थी या नहीं. एसएचओ ने बताया कि कोई एंट्री नहीं की गई थी. एसपी ने कोर्ट को बताया कि उन्हें सीसीटीवी खराब होने के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी. इस पर कोर्ट ने पूछा कि एसएचओ के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई ?
कोर्ट ने कहा – लोगों से माफ़ी मांगें
एसपी ने कोर्ट से माफ़ी मांगी. इस पर जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा, “कोर्ट से माफ़ी मत मांगिए. लोगों से माफ़ी मांगिए.” बेंच ने पूछा कि एसएचओ के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? क्या उन्हें सस्पेंड किया गया या नौकरी से हटाया गया?
जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि जिस एसएचओ को यह भी नहीं पता कि जनरल डायरी में जांच का ब्यौरा कैसे दर्ज किया जाता है, उसे नौकरी में नहीं रहना चाहिए. ऐसा व्यक्ति कॉन्स्टेबल बनने के लायक भी नहीं है. तब एसपी ने बताया कि एसएचओ का ट्रांसफर क्राइम ब्रांच में कर दिया गया है.
हालांकि, कोर्ट इस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं था. कोर्ट ने पूछा कि अगर एसएचओ दोषी पाया गया था, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
सीसीटीवी लगाने के लिए 46.46 लाख रुपये मिले :
कोर्ट ने 2 सितंबर के अपने आदेश का भी ज़िक्र किया. इसमें पुलिस के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए गए थे. हाई कोर्ट ने सीसीटीवी के बारे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी हवाला दिया. कोर्ट को बताया गया था कि राज्य सरकार ने देवरिया के थानों में सीसीटीवी लगाने के लिए 46.46 लाख रुपये जारी किए थे.
हालांकि, सरकार के हलफनामे में यह नहीं बताया गया था कि यह रकम कब जारी की गई थी. कोर्ट ने इस तारीख को अहम माना. कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई की तारीख पर भी सवाल उठाए. एसपी द्वारा बताई गई कार्रवाई 14 अगस्त, 2026 की थी, जबकि हाई कोर्ट का संबंधित आदेश 4 अगस्त को ही जारी हो चुका था.
कोर्ट ने शुरुआती तौर पर पाया कि ऐसा लगता है कि ज़िला अधिकारियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर होने और 4 अगस्त का आदेश पारित होने के बाद ही कार्रवाई शुरू की. काम पूरा नहीं हुआ, फिर भी पूरा पेमेंट कर दिया गया.
बुधवार को कोर्ट ने सीसीटीवी कैमरे लगाने वाली एजेंसी को किए गए भुगतान पर भी सवाल उठाए. बेंच ने पूछा कि जब सीसीटीवी का काम पूरा नहीं हुआ था, तो एजेंसी को पूरी रकम का भुगतान क्यों किया गया.
कोर्ट ने कहा कि एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय पूरी रकम जारी कर दी गई. भुगतान सिर्फ़ भरोसे के आधार पर किया गया. कोर्ट ने चारों याचिकाकर्ताओं को मुआवज़ा देने का आदेश दिया. याचिकाकर्ता 2, 3 और 4 को बीस – बीस हजार रुपये मिलेंगे.
याचिकाकर्ता नंबर 1 को ₹5,000 दिए जाएंगे। चारों को कुल ₹65,000 का मुआवज़ा दिया जाएगा। यह रकम sho की सैलरी से वसूली जाएगी।
कौन हैं देवरिया के एसपी:
देवरिया जिले के एसपी अभिजीत आर. शंकर वर्ष 2018 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. इससे पहले वे अंबेडकरनगर और औरैया में पुलिस अधीक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने लखनऊ कमिश्नरेट में पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) का पद भी संभाला है. मूल रूप से केरल के निवासी शंकर की छवि एक सख्त, अनुशासित और पेशेवर अधिकारी की रही है.










