पूजा के लिए खून देने वाले सीआरपीएफ के मुद्द्सिर और रसूल का है कोई जवाब …

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कश्मीर में कैंसर के मरीज की जान बचाने के लिए तोड़ दिया रोज़ा
अस्पताल में भर्ती ब्लड कैंसर की मरीज़ पूजा देवी को रोजा ब्रेक कर खून देता सीआरपीएफ जवान. Photo/CRPF

अस्पताल में भर्ती ब्लड कैंसर की मरीज़ पूजा देवी को जब खून की ज़रूरत पड़ी तो मुद्द्सिर रसूल भट और मोहम्मद असलम भी पीछे न रहे. उन्होंने रमज़ान में रोज़े से होने के बावजूद रक्तदान किया और इस अनजान लड़की के इलाज की खातिर अपने धार्मिक नियम को तोड़ने में जरा भी गुरेज़ नहीं किया. जम्मू से श्रीनगर के अस्पताल में लाई गई पूजा के लिए खून देने वाले ये 2 नौजवान उसी सीआरपीएफ के उन चार जवानों में से हैं जो पूजा के भाई अनिल की एक पुकार पर श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट आफ मेडिकल साइंसेस (SKIMS) में रक्तदान करने दौड़े चले आये थे और जो देश की खातिर कश्मीर में अक्सर पत्थर खाते हैं. मुद्द्सिर रसूल भट और मोहम्मद असलम सीआरपीएफ में सिपाही हैं. उनके अलावा पूजा के लिए सीआरपीएफ के ही सब इंस्पेक्टर संजय पासवान और सिपाही रामनिवास ने भी वहां रक्तदान किया.

असल में 9 जून को सीआरपीएफ की हेल्पलाइन मददगार पर अनिल सिंह ने फोन करके बताया था कि उसकी मौसेरी बहन Leukemia की मरीज है और डाक्टरों ने उसे खून चढ़ाने के लिए 6 यूनिट खून का इंतजाम करने को कहा है. तब परिवार के दो सदस्यों ने तो खून दे दिया लेकिन समस्या थी कि बाकी इंतज़ाम कैसे हो? अनिल ने श्रीनगर से रक्षक न्यूज़ डाट काम को फोन पर बताया, ‘मैंने तब CRPF की हेल्पलाइन मददगार को काल किया था और सीआरपीएफ के चार लोग यहाँ आ भी गये, मेरी बहन को दो यूनिट खून चढ़ा भी दिया गया है.’

कश्मीर में कैंसर के मरीज की जान बचाने के लिए तोड़ दिया रोज़ा
अस्पताल में भर्ती ब्लड कैंसर की मरीज़ पूजा देवी को रोजा ब्रेक कर खून देता सीआरपीएफ जवान. Photo/CRPF
कश्मीर में कैंसर के मरीज की जान बचाने के लिए तोड़ दिया रोज़ा
अस्पताल में भर्ती ब्लड कैंसर की मरीज़ पूजा देवी को खून देता जवान. Photo/CRPF

अनिल सिंह किश्तवाड़ का रहने वाला 12 वीं पास एक बेरोजगार नौजवान है. उसके मौसा किसान हैं और उनकी गैरमौजूदगी में अनिल ही 22 वर्षीय बहन पूजा की देखभाल कर रहा है. अनिल मुश्किल भरी इस घड़ी में सहायता के लिए सीआरपीएफ का बहुत एहसान मान रहा है.

ध्यान देने की बात है कि रक्तदान करने के बाद कुछ खाना पीना ज़रूरी होता है लेकिन ऐसा करने का मतलब है रोज़े के नियम का उल्लंघन करना. बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के मुद्द्सिर रसूल भट और मोहम्मद असलम ने धार्मिक नियम के पालन से ज्यादा ज़रूरी इंसानियत के फ़र्ज़ को समझा और रक्तदान के लिए रोज़ा तोड़ा.

ये घटना उन कट्टरपंथियों के लिए तो तमाचा है ही जो धार्मिक रस्मों रिवाजों को सबसे ऊपर मानते हैं वहीँ धर्म के नाम पर लोगों के बीच भेदभाव व नफरत पैदा करने वालों को भी ये एक सबक है.