जॉन एलन चाउ के कत्ल की गुत्थी पूरे भारत की पुलिस के लिए चुनौती

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जॉन एलन चाउ
अंडमान निकोबार के 29 द्वीपों में से एक संरक्षित द्वीप उत्तर सेंटिनल में पाषाण युगी आदिम जाति के कबीले आज भी शेष दुनिया से कटे हुए हैं. इण्डियन कोस्ट गार्ड (Indian Coast Guard) ने यह तस्वीर 2006 में हेलिकाप्टर से ली थी. आश्चर्य कि 2004 की सुनामी के बावजूद ये जीवित हैं. इनसेट में जॉन एलन चाउ का फोटो जो उसके इंस्टाग्राम अकाउंट से लिया गया है. चाउ के अकाउंट में एडवेंचर की ढेरों फोटो पोस्ट हैं. मूल फोटो : Indian Coast Guard

पुरातन किस्से कहानियों को छोड़ दें तो आज़ाद भारत के पुलिस इतिहास में जॉन एलन चाउ का केस सबसे चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है. भारत के लिए सिर्फ ही नहीं, अमेरिकी सैलानी और ईसाई मिशनरी जॉन एलन चाउ का किसी अनजान दुनिया के बीच जाकर वहां के बाशिंदों को भगवान से मिलाने की कोशिश जैसे एडवेंचर में अपनी जान गंवा देना, शायद दुनिया के सबसे पेचीदा कत्ल के चुनिंदा मामलों में से है. कानूनी, नैतिक और व्यवहारिक मोर्चे पर इन चुनौतियों का सामना करते हुए केस की गुत्थी सुलझाने की ज़िम्मेदारी जिन पुलिस अधिकारियों पर है वह खुद मानते हैं कि ये सबसे अजीबो गरीब हालात वाला केस है. फिर अपराध भी छोटा मोटा नहीं है. एक विदेशी नागरिक की ऐसी जगह पर हत्या किया जाना जहां पुलिस तफ्तीश तो क्या करेगी. उसे वहां जाने तक की इजाज़त नहीं है. दूसरी बात ये कि इस हत्या को हत्या मानने का ठोस सबूत तक जुटाना बेहद मुश्किल है. यानि उसके शव के बारे में कोई सुराग ही नहीं मिला.

जॉन एलन चाउ
जॉन एलन चाउ का अपने भतीजे के साथ फोटो जो उसके इंस्टाग्राम अकाउंट से लिया गया है. चाउ ने कैप्शन में भतीजे के बारे में लिखा है कि ‘यह भविष्य का Adventrer है’. चाउ ने अपने अकाउंट में एडवेंचर की ढेरों फोटो पोस्ट की हैं.

अमेरिकी सैलानी जॉन एलेन चाउ को अंडमान निकोबार के 29 द्वीपों में से एक संरक्षित द्वीप उत्तर सेंटिनल में पाषाण युगी आदिम जाति के कबीले तक पहुंचाने वाले मछुआरों के बयान और उनसे बरामद हुए जॉन एलेन चाउ के हाथ के लिखे पन्नों (जिनमें जॉन एलेन चाउ ने अपनी हत्या की आशंका जताई) के अलावा ऐसा कुछ है नहीं जो साबित करता हो कि 27 वर्षीय उस जॉन एलन चाउ का कत्ल किया गया है जो मछुआरों की मदद से, प्रतिबंधित द्वीप में जा घुसा था.

प्रशांत महासागर क्षेत्र में नॉर्थ सेंटिनल नाम के इस पर द्वीप रहने वाली सेंटिनल जनजाति के लोगों की आबादी नाममात्र की ही है. शायद 200 से भी कम. आधुनिक दुनिया से एकदम जुदा एकाकी जीवन बिताने वाले इन लोगों का संसार कई रहस्य लिए हुए है और जिनके बारे में जानने की कोशिश अक्सर जिज्ञासु सैलानी करते रहे हैं. ये क्या करते हैं? क्या खाते, पीते, पहनते और बोलते हैं? ये सब राज़ हैं. आधुनिक मानव को देखते ही उसे मार डालने की हरदम कोशिश करने वाले इस कबीले के लोग पहले भी लोगों को मार चुके हैं. अपने बीच बाहर से किसी का आना ये बर्दाश्त ही नहीं करते.

जॉन एलन चाउ
अंडमान निकोबार के 29 द्वीपों में से एक संरक्षित द्वीप उत्तर सेंटिनल में पाषाण युगी आदिम जाति के कबीले आज भी शेष दुनिया से कटे हुए हैं. इण्डियन कोस्ट गार्ड (Indian Coast Guard)ने यह तस्वीर 2006 में हेलिकाप्टर से ली थी. आश्चर्य कि 2004 की सुनामी के बावजूद ये जीवित हैं. फोटो : Indian Coast Guard

80 और 90 के दशक में जब इस टापू के किनारे टूटे समुद्री जहाज़ का मलबा लाने वाले व्यापारी वहां गये थे तो सेंटिनल्स और उनके बीच जबरदस्त संघर्ष हुआ था जिसमें काफी खूनखराबा हुआ. तभी से संरक्षित इस क्षेत्र में किसी के भी जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी लेकिन 2006 में गैरकानूनी तरीके से समुद्री जन्तुओं को पकड़ने के चक्कर में नार्थ सेंटिनल पहुंचे दो लोगों सुंदर राज और पंडित तिवारी को इस कबीले ने मार डाला था. उन्हें बचाने के लिए जब भाररतीय तटरक्षक का दल हेलिकाप्टर वहां गया तो लैंड करने से पहले ही सेंटिनल्स उस पर तीरों से हमला करने लगे लिहाज़ा उस दल को खाली हाथ लौटना पड़ा था. हाँ कुछेक तस्वीरें हेलिकाप्टर से ली जा सकी थीं जिसमें ये कबीले वासी लगभग नाममात्र के कपड़े पहने दिखते हैं.

एक मछुआरे को मारने के कुछ दिन बाद इन्होंने उसके शव को खड़े हुए व्यक्ति की मुद्रा में बांस से बांधकर उसका चेहरा समुद्र की तरफ कर दिया था ताकि समुद्र में वहां से गुज़रने वाले जहाज़ के सवारों की उस शव पर नज़र पड़ जाए और वो चाहें तो उस शव को वहां से ले जाएँ.

उस घटना को ध्यान में रखते हुए अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि 17 नवम्बर 2018 को गायब हुए अमेरिकी सैलानी जॉन एलेन चाउ के साथ भी कहीं ऐसा न हो क्यूंकि उसके जीवित बचे होने की उम्मीद नहीं लगती. जॉन चाउ को टापू पर पहुँचाने के मामले में पुलिस अब तक सात लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है. उन्हीं से पूछताछ में पुलिस को पता चला था कि सेंटिनल कबीले के लोगों ने उसे मार डाला था.

इन चश्मदीदों का कहना है कि उन्होंने सेंटिनलीज़ को जॉन का शव ले जाते देखा था. जॉन एलेन चाउ के लिखे कुछ पन्ने पुलिस ने मछुआरों के पास से बरामद किये हैं जिसमें जॉन ने अपने ऊपर तीर से हुए हमले का ज़िक्र किया है. जॉन का कहना था कि वो सेंटिनलीज़ को जीसस क्राइस्ट की मौजूदगी का एहसास कराने और भगवान पर विश्वास का विचार देना चाहता है. जॉन अपने साथ बाइबिल भी लेकर गया था.

दक्षिण अंडमान ज़िले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) विजय सिंह ने आधिकारिक बयान में कहा है कि मामले की संवेदनशीलता के साथ पड़ताल की जा रही है. जांच के लिए बनाई गई टीम में वन विभाग, आदिवासी कल्याण विभाग और तटरक्षक दल की मदद ली जा रही है. कोशिश की जा रही है कि बिना इस कबीलाई आदिम जाति को ठेस पहुंचाये जॉन एलेन चाउ का सुराग लगाया जा सके. सबसे बड़ी चुनौती यही है कहीं पुलिस को या किसी बाहरी व्यक्ति को देख वो नकारात्मक प्रतिक्रिया न कर बैठें या उन पर कोई कुप्रभाव न पड़े.

वहीँ उत्तर सेंटिनल द्वीप पर फिर से ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ ( Restricted Area Permit – आरएपी) लागू किया जा सकता है जिसके तहत बिना इजाजत के लोगों को प्रतिबंधित क्षेत्रों में जाने की इजाज़त नहीं होती है. केंद्र सरकार को अंडमान निकोबार द्वीप समूह में हाल में विदेशी नागरिकों के नियम-कायदों के उल्लंघन के 44 मामलों के बारे में भी पता चला है. वैसे इन घटनाओं का ताल्लुक आरएपी से नहीं है. दूसरी तरफ आदिवासियों द्वारा जॉन एलेन चाउ की हत्या के बाद पैदा हुए हालात की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) का एक प्रतिनिधिमंडल प्रमुख नंद कुमार साय के नेतृत्व में चार दिसंबर को केंद्र शासित प्रदेश अंडमान निकोबार भेजा जाएगा.

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक मंत्रालय को अंडमान निकोबार द्वीप समूह प्रशासन से घटना पर रिपोर्ट मिली है और उत्तर सेंटिनल द्वीप के साथ कुछ अन्य द्वीपों पर आरएपी को लागू करना सबसे खराब स्थिति होगी. अंडमान के तमाम द्वीपों में से एक द्वीप उत्तर सेंटिनल है जहां जाने के लिए जून तक विदेशियों को आरएपी या विशेष अनुमति की जरूरत होती थी. आरएपी हटाने के बावजूद सैलानियों को वहां जाने के लिए वन विभाग और अंडमान प्रशासन से इजाजत लेना जरूरी है, क्योंकि यह दो अन्य कानूनों के तहत संरक्षित क्षेत्र है.

मामले की संवेदनशीलता और चुनौती का अंदाजा अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पुलिस महानिदेशक दीपेन्द्र पाठक की इस बात से लगाया जा सकता है, ‘28 बरस के उनके पुलिस करियर में ऐसी पेचीदगियों से भरा केस सामने नहीं आया जहां पुलिस को मामले की छानबीन इसलिए करनी है क्यूंकि कानून और व्यवस्था बनाये रखने की ज़िम्मेदारी की वजह से वो इलाका पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है लेकिन पुलिस वहां जा नहीं सकती’. भारतीय पुलिस सेवा के 1990 बैच के आईपीएस अधिकारी दीपेन्द्र पाठक राजधानी दिल्ली में ज़िले की पुलिसिंग से लेकर अपराध शाखा के वरिष्ठतम ओहदे के अलावा कई राज्यों में पुलिस के काम का अनुभव रखते हैं.

इस मामले में सबसे बड़ा काम तो सुराग लगाकर जॉन एलेन चाउ का शव बरामद करना है. इसके बाद जांच हो भी जाए तो भी अगर उसमें कबीले वाले शामिल भी हों तो भी उन्हें सज़ा देना तो दूर हाथ तक नहीं लगाया जा सकेगा.

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