गौरवपूर्ण इतिहास के साथ सीआरपीएफ मना रही है 83 वीं सालगिरह

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सीआरपीएफ
सीआरपीएफ के महानिदेशक कुलदीप सिंह ने गुड़गांव स्थित ग्रुप सेंटर में शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की.

भारत का सबसे पुराना और सबसे बड़ा केन्द्रीय पुलिस संगठन केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ CRPF) आज अपनी 83 वीं सालगिरह मना रहा है. ब्रिटिश शासन के दौरान 27 जुलाई 1939 को क्राउन रिप्रेजेन्टेटिव पुलिस (सीआरपी -CRP) के तौर पर गठित सीआरपीएफ अब 246 बटालियन वाली विशाल पुलिस फ़ोर्स है जिसका मकसद देश में कानून ब्यवस्था की स्थिति कायम रखने में स्थानीय प्रशासन की मदद करना और आंतरिक सुरक्षा को कायम रखना है. स्थापना दिवस के अवसर पर आज सीआरपीएफ के प्रमुख और महानिदेशक कुलदीप सिंह ने गुड़गांव स्थित ग्रुप सेंटर में शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उन जवानों को याद किया जिन्होंने कर्तव्य की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर करते हुए मकसद को सरंजाम दिया. राष्ट्र सेवा में अब तक सीआरपीएफ के 2235 जवान शहीद हो चुके हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और भारत के सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे समेत कई गण्यमान्य लोगों ने इस अवसर पर सीआरपीएफ के काम की तारीफ करते हुए उसको बधाई दी है. सीआरपीएफ का वर्तमान स्वरूप भारत की अँग्रेज़ हुकूमत से आजादी के बाद 28 दिसम्बर 1949 को संसद में पास किये गए अधिनियम के बाद बनाया गया था. सबसे पुराने इस अर्धसैन्य बल को अँग्रेज़ सरकार ने अपनी नीतियों के हिसाब से अपना शासन चलाने में इस्तेमाल किया था.

भारत की पहली पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सोच के मुताबिक़ इस बहुउद्देशीय पुलिस बल का गठन किया गया. इसने रजवाड़ों और रियासतों में बंटे देश को एक करने में अहम भूमिका निभाई. 1955 में सीआरपीएफ अधिनियम बनने के बाद इसके नियम कायदे बनाये और अमल में लाये गये. सीआरपीएफ अधिनियम के बाद 1955 में वीजी कनेतकर को इसका पहला मुखिया यानि महानिदेशक बनाया गया. बागी रियासतों को नियंत्रण में करने में सीआरपीएफ का इस्तेमाल किया गया.

आजादी के फ़ौरन बाद इसकी टुकड़ियों ने पाकिस्तान को छूती राजस्थान, गुजरात और सिंध सीमाओं को सम्भाला था. यही नहीं पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ और इसके बाद हमले रोकने में भी इसे तैनात किया गया था. चीन से सटी सीमा की रखवाली के दौरान 21 अक्टूबर 1959 को इसके गश्ती दल पर चीनी सेना द्वारा हुआ हमला शुरूआती दौर में इसका सबसे बड़ा नुकसान था जिसमें सीआरपीएफ के 10 जवानों ने सबसे बड़ा बलिदान दिया था. ये घटना लदाख सीमा पर तत्तापानी के पास हुई. पूरे भारत में इस दिन को पुलिस स्मृति दिवस के तौर पर मनाया जाता है. यही नहीं 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में सीआरपीएफ ने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा जोड़कर काम किया. 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान भी पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर इसने सेना के साथ मोर्चा संभाला था.