शहीद बेटे के सीने से निकली गोली से बंधा शौर्य चक्र दिखाते कर्नल सलारिया के सवाल

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कर्नल सागर सिंह सलारिया
कर्नल सलारिया धागे से बंधी वो गोली भी दिखाते हुए जो आतंकवादियों की बंदूक से निकली थी.

सेना के इतिहास में शायद ही कहीं ऐसी मिसाल मिलती होगी जब एक पिता ने कमान अधिकारी के तौर अपने ही शहीद बेटे के शरीर को उसी तरह की फौजी रस्मों और नियमों का पालन करते हुए सैल्यूट किया होगा जैसा अपनी पलटन के किसी जवान या अधिकारी के मामले में किया जाता हो. ऐसा कर्नल सागर सिंह सलारिया को करना पड़ा था जब उनका इकलौता बेटा सेकंड लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया आतंकवादियों से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान देकर ताबूत में लेटकर आया था. ऐसी में एक अधिकारी की तरह संयमित होकर और अपने भीतर के पिता को उन क्षणों में मारकर हालात का सामना करना कितना तकलीफ भरा हो सकता है इसका अंदाज़ा शायद ही कोई लगा सकेगा.

वो तारीख थी 10 जनवरी 1996. बेटे की शहादत की घटना के बारे में विस्तार से बताते वक्त भारतीय सेना की 23 पंजाब के रिटायर्ड कर्नल सागर सलारिया जब उन लमहों का ज़िक्र कर रहे थे तब उनके हाथ में वो तस्वीर भी थी. किसी भी पिता के लिए ये सबसे तकलीफ भरे लमहे होते हैं जब उसकी नज़रों के सामने संतान इस दुनिया से अलविदा कहे लेकिन इससे भी बड़ा दर्द तो कर्नल सलारिया ने सहा जब अपने ही हाथों अपने लाडले को हमेशा के लिए विदा किया.

कर्नल सागर सिंह सलारिया
शौर्य चक्र में धागे से बंधी वो गोली जो आतंकवादियों की बंदूक से निकली थी.

पंजाब के पठानकोट में अबरोल नगर स्थित अपने घर में बेटे की यादों को संजोए कर्नल सलारिया की ये बड़ी हिम्मत ही कही जाएगी जब बेटे गुरदीप सलारिया को मिले (मरणोपरांत) शौर्य चक्र के साथ धागे से बंधी वो गोली भी दिखाते हैं जो आतंकवादियों की बंदूक से निकली थी. मृत्यु के बाद सीने से निकाली गई ये गोली लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया के साहस की गवाही देने के लिए काफी है. गोली बताती है कि लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया ने आतंकवादियों से आमने सामने की भिड़ंत की थी. हालात बताते हैं कि आतंकवादियों ने निर्भीक प्रवृत्ति के लेफ्टिनेंट सलारिया को टारगेट करके गोली दागी थी.

सड़क से सरहद तक #SadakSeSarhadTak की अपनी विशेष कवरेज के दौरान पठानकोट पहुंची रक्षक न्यूज़ डॉट इन की टीम के साथ अपने और पारिवारिक सदस्यों के फौजी जीवन के और नागरिक प्रशासन के अधिकारियों से सम्पर्क में आने के बाद के अनुभवों को साझा करते वक्त कर्नल सलारिया भावुक भी हुए और नाराजगी भी ज़ाहिर की.

फौजियों का परिवार :

कर्नल सागर सिंह सलारिया
बेटे गुरदीप, पत्नी तृप्ता और बेटी रेनु के साथ कर्नल सागर सिंह सलारिया

फौजी पिता के पुत्र कर्नल सागर सिंह सलारिया के खानदान में यूं तो कई फौजी हैं भाई, भतीजे से लेकर दामाद तक लेकिन शहीद होने वाला लेफ्टिनेंट गुरदीप एकमात्र है. कर्नल सागर सिंह सलारिया के बेटे गुरदीप सिंह सलारिया की शहादत से प्रेरणा लेकर बनाई गई संस्था शहीद सैनिक परिवार परिषद् में भी सक्रिय रहते हैं. कुछ अरसा पहले पत्नी तृप्ता सलारिया भी साथ छोड़ इस दुनिया को अलविदा कह गई. उन्हें कैंसर हुआ था. यूं तो एक डॉक्टर बेटी रेनु सलारिया भी है जो हिमाचल प्रदेश सरकार में कार्यरत हैं और दामाद संजय कांडपाल भीं हैं जो सेना में ब्रिगेडियर हैं लेकिन पठानकोट में कर्नल सलारिया अकेले रहते हैं. हां, बगल में भाई का घर है. इन हालात और उम्र के इस पड़ाव में भी कर्नल सलारिया का जज़्बा ‘वंस सोल्जर इज़ आलवेज़ सोल्ज़र ‘ (एक बार बना सैनिक जीवन पर्यन्त सैनिक वाला रहता है) वाली मान्यता को साबित करता है जब वो परिवार की फ़ौज में जाने की परम्परा से लेकर बेटे की शहादत का ज़िक्र करते हुए फख्र से कहते हैं, ‘ऐसे परिवार भी दुर्लभ ही होंगे जिसमें बाप, बेटा, दामाद एक ही पलटन में हो.” दरअसल, यहां कर्नल 23 पंजाब रेजीमेंट का ज़िक्र कर रहे थे.

परम्परा पर नाज़ :

कर्नल सागर सिंह सलारिया
ये वो शैम्पेन की बोतल है जो गुरदीप ने 11 जून 1994 को पिता को उपहार में दी थी.

‘शौर्य हाउस’ (कर्नल सलारिया के मकान के बाहर गेट पर यही लिखा है) के भीतर ड्राइंग रूम में घुसते ही सामने की दीवार में बने शो केस में बहुत करीने से सजा कर रखे शहीद फौजी बेटे गुरदीप सिंह के मेडल, तस्वीरों और सम्मान प्रतीकों के बीच उन्होंने शैम्पेन की हरे कांच की खाली बोतल भी रखी हुई है. कर्नल सागर सिंह सलारिया इस बोतल की तरफ इशारा करते हुए, पहले थोड़ा मुस्कराते हैं और शायद अपने जीवन के उस सबसे खूबसूरत दिनों में से एक को याद करते हुए उसे उठा लेते हैं. ये वो शैम्पेन की बोतल है जो गुरदीप ने 11 जून 1994 को उनको उपहार में दी थी. ये दोगुनी ख़ुशी का मौका था. बेटे गुरदीप सिंह सलारिया ने उन्हीं की रेजिमेंट में कमीशन हासिल किया था. बोतल पर एक लेवल की तरह चिपके सफ़ेद कागज़ पर बड़े अक्षरों में अंग्रेज़ी में छपा हुआ भी है – GIFT BY SON TO FATHER ON COMMISSION 11 JUNE 1994 BOTH 23 PUNJAB. किसी भी सैनिक के लिए उस पलटन में जाना एक उपलब्धि से कम नहीं है जिस पलटन में उनके पूर्वज या परिवार के लोग रहे हों जिसे पेरेंट क्लेम (parent claim) मिलना कहते हैं.

कर्नल सागर सिंह सलारिया
ले. गुरदीप सलारिया के दादा दादी

पलटन से ऐसा प्यार :

कर्नल सलारिया बताते हैं कि 23 पंजाब का गठन 1966 में हुआ था और 1969 में वे इस पलटन में गये. जब लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया को भी इस पलटन में कमीशन मिल गया तो कर्नल सलारिया के लिए ये ख़ुशी का कारण इसलिए भी बना क्योंकि वे रिटायर होने वाले थे लेकिन गुरदीप के उस पलटन में अधिकारी के तौर पर रहने पर उनके भीतर अलग तरह का भाव जागृत हुआ. कर्नल सलारिया का कहना था, “ऐसा महसूस हुआ जैसे रिटायर्मेंट के बाद भी मैं बेटे के रूप में अपनी पलटन के बीच रहूँगा.” खैर वो सपना भी टूट गया लेकिन अब उनको फ़ख्र इस बात का है कि इस पलटन (23 पंजाब) में शहीद हो शौर्य चक्र जैसा सम्मान पाने वाला पहला अफसर उनका बेटा ही है. सपना तो इकलौते बेटे को दूल्हा बने हुए देखने का भी टूटा. दरअसल कुछ दिन पहले ही लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया की शादी के लिए परिवार वालों ने लड़की पसंद की थी.

पठानकोट के इस सलारिया परिवार को फ़ौज से अपना नाता होने पर कितना फख्र है, इसका अंदाज़ा उनसे मिलने या घर के भीतर जाने से पहले ही हो जाता है जब बाहर दीवार पर नेमप्लेट की तरह लगे छोटे छोटे बोर्ड पर नज़र पडती है. इनमें से एक पर लिखा है, ‘4 पीढ़ी बतौर अफसर सैन्य सेवा व शौर्य चक्र सम्मान ‘. इस जज़्बे को देखकर ही किसी का नत मस्तक होने का मन करेगा.

कर्नल सागर सिंह सलारिया
सेकंड लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया

यूं हुई शहादत :

सेना में भर्ती होने हुए 2 साल भी नहीं हुए थे कि लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया ने सिर्फ 23 साल की छोटी सी उम्र में ही अपने फौजी होने का पूर्ण धर्म निभा दिया. 10 जनवरी 1996 को लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया की यूनिट जम्मू कश्मीर के पुलवामा में तैनात थी जब उन्हें वहां के पंजगाम में एक जगह पर आतंकवादियों के छिपे होने की सूचना मिली. लेफ्टिनेंट सलारिया अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए वहां पहुंचे. यहां दोनों पक्षों के बीच घमासान हुआ जिसमें तीन आतंकवादी मारे गये. इसी मुठभेड़ में गोली लगने से घायल लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया के प्राण गये. उच्च श्रेणी की शूरवीरता, साहस और सूझबूझ दिखाते हुए कर्तव्य की खातिर अपनी जान तक की परवाह न करने वाले जांबाज़ लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया को शौर्य चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया गया. कर्नल सलारिया ने तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से सम्मान प्राप्त किया था.

कर्नल सागर सिंह सलारिया
तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया का शौर्य चक्र (मरणोपरांत) सम्मान प्राप्त करते कर्नल सलारिया.

रण क्षेत्र में पिता – पुत्र :

कर्नल सलारिया ने 1971 में भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान लोंगोवाल की लड़ाई में हिस्सा लिया था. उनके पिता शेर सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था और वे रिसालदार के तौर पर 1945 रिटायर हुए थे. तब भारत में अंग्रेजों का शासन था. उस वक्त उनका परिवार शकरगढ़ तहसील के एक गांव में रहता था जो अब पाकिस्तान में है. भारत के बंटवारे के दौरान सलारिया परिवार पंजाब के पठानकोट में आकर बस गया. यहां उनके गांव में खेतिहर भूमि भी है. लिहाज़ा ये परिवार किसानी भी करता है.

यूं गये सेना में :

कर्नल सलारिया बताते हैं कि पर्याप्त पढ़ाई न होने के कारण उनके पिता सेना में अधिकारी नहीं बन सके थे जिसका उनको मलाल था लेकिन वो चाहते थे कि उनके बेटे सेना में बड़े अधिकारी बने. शायद यही कारण था ग्रेजुएट होने के बावजूद उनके बड़े भाई को पिता ने सेना में सिपाही भर्ती करा दिया और फिर कुछ साल में ही उनके भाई ने अधिकारी के तौर पर कमीशन हासिल किया. खुद कर्नल सलारिया ने भी ऐसा ही किया. हालांकि शुरू में वो एजुकेशन बोर्ड में थे लेकिन अधिकारी बनने पर उन्होंने इन्फेंटरी में जाना तय किया.

कर्नल सागर सिंह सलारिया
बाहर दीवार पर नेमप्लेट की तरह लगे छोटे छोटे बोर्ड

कर्नल सलारिया का दर्द :

तीन दशक से ज्यादा सेना में सेवा के बाद बाहर की दुनिया से जब कर्नल सलारिया का वास्ता पड़ा तो उनके अनुभव अच्छे नहीं रहे. वे बताते हैं कि शौर्य चक्र से सम्मानित किये जाने शहीदों को राज्य से मिलने वाली घोषित राशि पाने के लिए उनको इस बात का प्रमाण देने के लिए डोमिसाइल बनवाना पड़ा कि वे पंजाब के नागरिक हैं. वो सवाल करते हैं कि अगर मेरे जैसे फौजी अफसर को भी इस राशि को लेने के लिए चक्कर काटने पड़े तो आप अंदाज़ा लगा लीजिये कि साधारण सैनिक के मामले में हमारा तंत्र कैसे पेश आता होगा ? कर्नल सलारिया का मानना है कि शासन करने वाले जन प्रतिनिधि और प्रशासन के अधिकारी अभी भी सैनिकों और किसानों के प्रति संवेदन शील नहीं है.

कर्नल सागर सिंह सलारिया
कर्नल सागर सिंह सलारिया के साथ रक्षक न्यूज डाट इन के संपादक संजय वोहरा.

कर्नल सलारिया कहते हैं कि सभी सिविल अधिकारियों के लिए ट्रेनिंग के तौर पर सेना के साथ कम से कम 6 महीने ज़रूर बिताने चाहिए तभी वो सैनिकों की मुश्किलों को समझ पायेंगे. कर्नल सलारिया सेना की ट्रेनिंग को बेहतरीन बताते हुए दावा करते हैं, ‘मैं आज भी किसी भी आईपीएस या आईएएस अधिकारी का काम संभाल सकता हूँ लेकिन कोई सिविल अफसर मेरा काम नहीं कर सकता “. वे कहते हैं, “सैनिक में तीन गुण होते हैं और जिन्हें प्रशिक्षण में पुख्ता किया जाता है – ईमानदारी, वफादारी और ज़िम्मेदारी.’ कर्नल सवालिया अंदाज़ में कहते हैं – क्या नेताओं और सिविल अधिकारियों में ये गुण मिलते हैं ? समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और सैनिकों के प्रति शासन तंत्र की अनदेखी को ही वो बड़ी वजह बताते है जो शहीद सैनिक परिवार परिषद् जैसी संस्था का पठानकोट में गठन करना पड़ा.

कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया :

भारत में सेना और सामरिक नजरिये से पठानकोट बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र है. यही नही पठानकोट के ही कैप्टन गुरबचन सिंह परमवीर चक्र का सम्मान हासिल करने वाले राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के पहले स्नातक अधिकारी थे. वे 5 दिसंबर 1965 को कांगो में एक मोर्चे पर शहीद हुए थे.