जापानियों और पाकिस्तानियों से जीता पर ….चुपचाप चला गया योद्धा लेफ्टिनेंट जनरल जोरू

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जांबाज ले. जनरल जोरावर चंद बख्शी
ले. जनरल जोरावर चंद बख्शी.

दूसरे विश्वयुद्ध में जापानियों के और 1965 की जंग में पाकिस्तानियों के दांत खट्टे कर चुका भारतीय फौज का लेफ्टिनेंट जनरल जोरू चुपचाप इस दुनिया को अलविदा कह गया. जी हाँ, भारतीय सेना के इस महावीर यानि ले. जनरल जोरावर चंद बख्शी को, मित्र और अपने इसी नाम से पुकारते थे. लेकिन 96 साल की उम्र में जब 24 मई को इस योद्धा ने आखिरी सांस ली तो इसे आखिरी सलाम करने की फुरसत ना तो सरकारी तन्त्र को और ना ही भारत के नेताओं को मिली. फूलों की माला भिजवा कर ये औपचारिकता ज़रूर पूरी की गई उस शूरवीर के लिए जिसकी गिनती बहादुरी के सबसे ज्यादा तमगे हासिल करने वाले भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों में होती थी. महावीर चक्र, वीर चक्र, परम विशिष्ट सेवा मेडल उनके सीने पर सितारों की मानिंद जगमगाते थे. वो भारतीय सेना के शायद एकमात्र ऐसे अधिकारी भी थे जिसने लेफ्टिनेंट से लेकर मेजर जनरल तक हरेक रैंक पर रहते हुए युद्ध में हिस्सा लिया.

  • तिब्बत संघर्ष के दौरान उन्होंने अहम गुप्त जानकारियाँ जुटाने के लिए 400 मील तक ट्रैकिंग की और वो भी भेष बदलकर. इस उपलब्धि के लिए उन्हें मेकग्रेगर मेडल से सम्मानित किया गया.

21 अक्तूबर 1921 को जन्मे जोरावर बख्शी का परिवार रावलपिंडी (वर्तमान में पाकिस्तान में) के पास गुलयाना गाँव से ताल्लुक रखता था. उनके पिता बहादुर बख्शी लालचन्द अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में ऐसे अधिकारी थे जिन्हें आर्डर आफ ब्रिटिश इंडिया से नवाज़ा गया था.

रावलपिंडी के ही गार्डन कॉलेज से पढ़ाई के बाद, 1943 में ज़ोरावर ने बलूच रेजिमेंट में कमीशन हासिल किया. दूसरे विश्व युद्ध में बर्मा को जापानियों से मुक्त कराने के बाद मलयेशिया में भी जापानी फौज के लिए जोरावर सिरदर्द बने हुए थे. इससे जुड़े उनके कई किस्से पुराने अधिकारियों में चर्चित रहे हैं. उनकी इसी बहादुरी और कर्मठता की वजह से उन्हें मेजर के रैंक पर जल्दी तरक्की मिल गई. भारत के बंटवारे के बाद वो गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटालियन में आ गये और तब जब पाकिस्तान से जब कश्मीर में (1947 -48 ) घमासान हुआ तो उसमें बहादुरी का प्रदर्शन करने पर उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया.

तिब्बत संघर्ष के दौरान उन्होंने अहम गुप्त जानकारियाँ जुटाने के लिए 400 मील तक ट्रैकिंग की और वो भी भेष बदलकर. इस उपलब्धि के लिए उन्हें मेकग्रेगर मेडल से सम्मानित किया गया. वहीं 1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ी गई जंग के बीच उड़ी सेक्टर में दुश्मन फ़ौज से सामरिक महत्व के हाजी पीर पास को ख़ाली कराकर अपने कब्ज़े में ले लिया. तब वो ब्रिगेडियर थे. माना जाता है कि उनकी उसी नेतृत्व क्षमता की वजह से बड़ा इलाका पाकिस्तान के शिकंजे में आने से बचा रहा. उनके इस युद्ध कौशल और सामरिक क्षमता के प्रदर्शन की वजह से सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से नवाज़ा.

इसके अलावा भी इस जांबाज़ जोरावर ने कई मौकों पर अपना लोहा मनवाया चाहे वो देश हो या विदेशी धरती. साठ के दशक में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के आपरेशन के लिए कांगो भेजी गई शान्ति सेना में बटालियन की अगुआई की. इसके लिए उन्हें सेना का विशिष्ठ सेवा मेडल दिया गया था. इसके बाद 1969 -70 में पूर्वोत्तर में घुसपैठियों से निबटने जब उन्हें नागालैंड भेजा गया तो घुसपैठियों के बीच वो खौफ की वजह बन गये थे. वहां से लौटकर वो फिर पुराने दुश्मन यानि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ ही भिड़े. 1971 के इस युद्ध के समय जोरावर डिवीज़न कमांडर थे और उन्होंने सियालकोट आपरेशन की अगुआई की.

  • 1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ी गई जंग के बीच उड़ी सेक्टर में दुश्मन फ़ौज से सामरिक महत्व के हाजी पीर पास को ख़ाली कराकर अपने कब्ज़े में ले लिया. तब वो ब्रिगेडियर थे. माना जाता है कि उनकी उसी नेतृत्व क्षमता की वजह से बड़ा इलाका पाकिस्तान के शिकंजे में आने से बचा रहा.

एक ऐसा फ़ौजी अफ़सर जिसके ज़िक्र के बिना भारतीय सेना के युद्ध के इतिहास के कई अहम पन्ने अधूरे रह जाएँ, वैसे शूरवीर का इस तरह चुपचाप विदा कर दिया जाना, स्वाभाविक है सभी को खलेगा. उन्हें 25 मई को आखिरी सलाम करने न तो सेना का कोई बड़ा अधिकारी गया, ना ही सरकार का कोई मंत्री. इस कद के अधिकारी को श्रद्धांजलि देने के लिए उस सरकार के नेतृत्व ने एक ट्वीट तक नहीं किया जो चार साल पूरे होने का जश्न मना रही थी और जो सेना की हर उपलब्धि का श्रेय लेने में कसर नहीं छोड़ती.

युद्धकला का ये बेमिसाल फनकार अपने पीछे जो परिवार छोड़कर गया है उसमें एक पुत्र और दो बिटियाँ हैं. इनके एक दामाद भारतीय सेना में ही ब्रिगेडियर हैं.

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