कश्मीर में फर्ज़ी मुठभेड़ के दोषी सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई

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फर्जी मुठभेड़
कश्मीर में फर्जी मुठभेड़ में ये तीन युवक मारे गए थे.

जम्मू कश्मीर के शोपियां में चार महीने पहले कथित फर्जी मुठभेड़ में तीन युवकों के मारे जाने की घटना में शुरूआती जांच में ही सबूत मिलने के बाद दोषी सैनिकों के खिलाफ अनुशासनहीनता की कार्रवाई शुरू कर दी गई थी. इस बीच तीनों युवकों के दफनाये गये शवों को कब्र से निकाल कर उनके परिवार वालों को सौंपा गया और शुक्रवार की रात परिवार वालों ने राजौरी स्थित उन्हें अपने कुनबे की कब्रगाहों में सुपुर्द ए खाक किया. तीनों राजौरी के परिवारों से ताल्लुक रखने वाले मज़दूर थे.

जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने समाचार एजेंसी पीटीआई को इस बात की पुष्टि तब की जब ये प्रक्रिया चल रही थी. एजेंसी ने राजौरी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) चन्दन कोहली के हवाले से बताया कि तीनों शवों को परिवारों ने अपने पैतृक कब्रिस्तान में दफना दिया था. इनके नाम मोहम्मद इबरार (21 साल), इम्तियाज अहमद (26 साल) और इबरार अहमद (18 साल) थे.

सेना ने 18 जुलाई को दक्षिण कश्मीर के शोपियां ज़िले के बेहद ऊंचाई वाले अमशीपुरा गाँव में मुठभेड़ में तीन आतंकवादियों के मारे जाने का दावा किया था. लेकिन इस घटना के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भारतीय सेना ने जो जांच शुरू की उसके बूते पर मिले शुरूआती तथ्यों से मुठभेड़ के फर्ज़ी होने का इशारा मिल गया था. इसमें पाया गया था कि तीनों राजौरी के रहने वाले थे. शोपियां में मजदूरी करते थे. इन नौजवानों के गायब होने की रिपोर्ट इनके परिवार वालों ने पुलिस को लिखाई थी.

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ सेना ने चार हफ्ते के अन्दर ही इस मामले की जांच मुकम्मल करके 18 सितम्बर को रिपोर्ट दे दी थी जिसमें पाया गया कि सैनिकों ने आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) के तहत सैन्य बलों को मिले विशेष अधिकारों का दुरुपयोग किया. उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर दी गई. वहीं पुलिस ने भी इस मामले को अंजाम तक पहुँचाने के लिए अलग से कार्रवाई शुरू की. मारे गये युवकों की पुख्ता पहचान साबित करने के लिए डीएनए जांच में मिलान के लिए परिवार के सदस्यों के नमूने भी इसके तहत लिए गये थे.

जम्मू कश्मीर के पूर्व मंत्री चौधरी ज़ुल्फ़िकार अली ने घटना की जांच और इसके बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए शासन की तारीफ की है. उनका कहना था कि इससे लोगों में सरकार और न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ेगा. साथ ही अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने वालों के लिए भी ये घटना एक सबक होगी. विशेष शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करने वाले ऐसा करने वालों में डर रहेगा.

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