भारतीय सेना की सिख रेजीमेंट ने शान से मनाया 175वां स्थापना दिवस

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झारखंड के रामगढ़ स्थित रेजीमेंटल सेंटर ने अपनी स्थापना के 175 साल पूरे होने युद्ध स्मारक पर शहीद बहादुरों को श्रद्धांजलि अर्पित की.

भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा सम्मान प्राप्त सिख रेजीमेंट ने शनिवार को झारखंड के रामगढ़ स्थित रेजीमेंटल सेंटर में अपनी स्थापना के 175 साल पूरे होने की खुशी मनाई और विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया. सैन्य परम्परा के मुताबिक़ स्थापना दिवस कार्यक्रमों की शुरुआत रेजिमेंटल सेंटर में युद्ध स्मारक पर शहीद बहादुरों को श्रद्धांजलि अर्पित करके हुई. किन्हीं कारणों से स्थापना दिवस मनाने में एक महीने की देरी भी हुई है.

सिख रेजीमेंट के कर्नल और लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन ने लेह से वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन ने युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की और सैनिक सम्मेलन को सम्बोधित किया. लेफ्टिनेंट जनरल मेनन ने इस अवसर पर ‘सिख’ पत्रिका और ‘डोड्रेंसबायसेंटेनियल सिल्वर ट्रॉफी ( Dodransbicentennial यानि  175 वीं वर्षगांठ ) का विमोचन भी किया.  ‘सिख ‘ (SIKH)  पत्रिका में सिख सैनिकों द्वारा लड़े गये युद्धों की विस्तृत कहानियाँ प्रकाशित की गई हैं.

सारागढ़ी युद्ध : 21 सिख सैनिकों की शूरवीरता और शहादत की बेमिसाल गौरव गाथा

लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन ने इस दिन की स्मृति के तौर पर ‘फर्स्ट डे कवर’ जारी किया.

लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन सिख रेजीमेंट के कर्नल और लेह स्थित भारतीय सेना की उस 14 कोर के कमांडर हैं जो चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा की निगहबानी करती है. लेफ्टिनेंट जनरल मेनन ने  इस दिन की स्मृति के तौर पर ‘ फर्स्ट डे कवर ‘ भी जारी किया.

युद्ध में अपनी शूरवीरता , साहस और बलिदानों के दम पर दुनियाभर में अलग पहचान रखने वाली सिख रेजीमेंट की स्थापना 30 जुलाई 1846 को 15 फिरोज़पुर सिख के तौर पर हुई थी और तब ये एक बटालियन थी. इस रेजीमेंट ने भारत की आज़ादी से पहले प्रथम और द्वितीय , दोनों ही विश्व युद्धों में अपनी कामयाबी की कहानियाँ कायम की हैं. पूरी दुनिया में सैनिकों के लिए प्रेरणा बनी 1897 में लड़ी गई  ‘ सारगढ़ी की लड़ाई ‘ और उसमें अपनाया गया नियम  ‘आखिरी गोली – आखिरी आदमी ‘ को भला कौन नहीं जानता. खुद तादाद में  सिर्फ 21 होते हुए भी हज़ारों अफगान लड़ाकुओं से मुकाबला करने ये जज़्बा जिनमें था वो इसी रेजिमेंट के सिख फौजी थे.

यहाँ लडी गई थी सारागढी की लडाई.

ब्रिटिश शासन से आज़ादी के बाद 1947 में  जब महाराजा हरी सिंह ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के समझौता दस्तावेज़ पर दस्तखत किये थे तब घाटी को बचाने के लिए 27 अक्टूबर 1947 को सिख रेजीमेंट के जवान ही आसमान से श्रीनगर में उतारे गये थे.