स्विट्जरलैंड की इवा से सावित्री बनी इस महिला ने डिज़ाइन किया था परमवीर चक्र

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सावित्री बाई अपने पति मेजर जनरल विक्रम रामजी खनोलकर के साथ

भारत की आज़ादी का महीना यानि अगस्त  चल रहा हो और ऐसे में इसकी आज़ादी के रखवालों की बात करते वक्त उनकी शूरवीरता और साहस का ज़िक्र होना लाज़मी है. जब  देश की सड़कों से लेकर सरहद तक को सुरक्षित रखने वालों की बात हो तो भला उनकी वर्दी और वर्दी की शान बढ़ाने वाले  वाले सम्मान और मेडल की बात क्यों न की जाए..!   सेना हो या पुलिस हो … या फिर ऐसा ही कोई और संगठन ही क्यों न हो , उसके सदस्य की पहचान वर्दी से होती है. वर्दी किसी रंग या ढंग विशेष के सिले कपड़े से ही नहीं बनती. उन सिले हुए कपड़ों को वर्दी के तौर पर पहचान तब मिलती है जब उस पर उस फ़ोर्स या संगठन की निशानियाँ , बैच , बेल्ट और रैंक लगाये जाते हैं. वर्दी पर जब साहस और शूरवीरता की निशानी के तौर पर मेडल लगते हैं तो पहनने वाले की शख्सियत पर चार चाँद लगा जाते हैं और उसके प्रति सम्मान की भावना कई गुना बढ़ जाती है.

सावित्री बाई और उनका डिजाइन किया परमवीर चक्र

अब अगर हम यहाँ कहें कि भारत में साहस , बहादुरी और शूरवीरता के मेडल बनाये जाने के पीछे की कहानी से जुड़ा अहम किरदार कोई विदेशी महिला रही है  तो ..! मेडल भी कोई साधारण नहीं परमवीर चक्र तक ..! जी हाँ , वही  ‘परमवीर चक्र’ जो  युद्ध में बहादुरी के लिए दिए जाने वाला भारत का सर्वोच्च शौर्य सैन्य अलंकरण है.  सुनने में  थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन सच यही है. और उतना ही सच यह भी  है कि यूरोपियन मूल की  उस महिला का भारत , भारतीयता और इसकी संस्कृति से प्रेम किसी भी भारतीय से ज़्यादा ही रहा. एक ऐसी महिला जिसने भारत की खातिर अपने माँ बाप और मातृभूमि को त्यागकर  हजारों मील  दूर एक अनजान मुल्क में चली आई.  खाने , पहनने से लेकर अपनी सोच तक को भारतीय सांचे में पूरी तरह ढाल देने वाली ये शख्सियत थी इवा योन्ने मडे द मरोस , जिन्होंने अपना नाम तक बदल डाला और बन गईं सावित्रीबाई खनोलकर.

सावित्री बाई अपने पति मेजर जनरल विक्रम रामजी खनोलकर के साथ

भारतीय सैन्य अधिकारी से शादी :
यही नहीं  इवा योन्ने मडे द मरोस से सावित्री बाई बनी इस महिला ने भारतीय नागरिकता ली और  भारतीय सेना के एक कैप्टन की पत्नी भी बनीं  जो मेजर जनरल के ओहदे पर रिटायर हुए. नाम था विक्रम रामजी खनोलकर. दरअसल , ये बात तब की है जब विक्रम रामजी खानोलकर एक युवा अधिकारी के तौर पर इंग्लैंड के सैंडहर्स्ट में रॉयल मिलिटरी एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहे थे. उन्हीं दिनों में छुट्टियों के ब्रेक के दौरान वे स्विजरलैंड घूमने गये जहां के न्यूशटेल शहर की 16 वर्षीय इवा से उनकी मुलाक़ात हुई. हालांकि दोनों के बीच उम्र का काफी फासला था लेकिन दोस्ती ऐसी हुई कि मोहब्बत में तब्दील हो गई. दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन इवा के पिता उन्हें इतनी दूर भारत नहीं भेजना चाहते थे इसलिए शादी के लिए पहले पहल तैयार  नहीं हुए. इवा के पिता हंगरी मूल के थे और जनेवा यूनिवर्सिटी में समाज शास्त्र के प्रोफ़ेसर थे जबकि इवा की मां रूस की रहने वाली थीं. प्रकृति प्रेमी और घूमने की शौक़ीन इवा का बचपन जनेवा में ही बीता.

सावित्री बाई

पिता के न चाहने पर भी इवा कैप्टन विक्रम से शादी करने के पक्के इरादे पर टिकी रहीं और कुछ ही साल बाद विक्रम की खातिर उनके पीछे भारत आ गई. दोनों ने 1932 में लखनऊ में शादी कर ली.  इवा हमेशा कहती थीं कि वे आत्मा से भारतीय हैं लेकिन गलती से यूरोप में पैदा हो गई. उन्होंने अपना नाम बदल कर सावित्री भी इसीलिए रख लिया. संस्कृत की पढ़ाई , वेद पुराणों में दिलचस्पी और उनसे हासिल उनका ज्ञान तो सबको प्रभावित करता ही था वहीं सावित्री बाई खनोलकर का  भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव ही बड़ा कारण था जो मेजर जनरल हीरा लाल अटल ने उनको युद्ध सबसे ऊँचे दर्जे की शूरवीरता दिखाने के लिए दिए जाने वाले मैडल  परमवीर चक्र का डिज़ाइन बनाने की ज़िम्मेदारी दी.

सावित्री बाई ने सभी वीरता पुरस्कार डिजाइन किए.

ये कितना अजीब इतेफाक़ है कि जिस परमवीर चक्र  मैडल को इवा यानि सावित्रीबाई  खनोलकर ने बनाया वो सबसे पहला मैडल उनके ही विस्तृत परिवार के सदस्य मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत प्रदान किया गया. मेजर सोमनाथ शर्मा सावित्रीबाई  खनोलकर की बेटी कुमुदिनी शर्मा के बहनोई थे. मेजर सोमनाथ शर्मा 4 कुमाऊं रेजिमेंट में थे और 1947 में आज़ादी के फौरन बाद पाकिस्तान से लड़े गये पहले युद्ध में जबरदस्त साहस और शूरवीरता का प्रदर्शन करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे. मेजर सोमनाथ शर्मा को 3 नवंबर 1947 को परमवीर चक्र से (मरणोपरांत ) सम्मानित किया गया था. अब तक 21 सैनिकों को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है. इनमें से 17 सैनिकों को ये सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया.

परमवीर चक्र विजेता (मरणोपरांत) मेजर सोमनाथ शर्मा सावित्री बाई के परिवार से ही थे.

परमवीर चक्र का डिज़ाइन  :

परमवीर चक्र

भारत में युद्ध में उच्च स्तर की शूरवीरता के लिए दिए जाने वाले परमवीर चक्र के मैडल को को 3.5 सेंटीमीटर  व्‍यास वाले कांस्‍य धातु की गोलाकार कृति के रूप में तैयार किया गया जिसके चारों ओर वज्र के चार चिह्न बनाए गए. मैडल के बीचों बीच  अशोक स्तम्भ से लिए गए भारत के  राष्ट्रीय चिन्ह चक्र को स्थान दिया गया. कांसे से बनाए परमवीर चक्र मैडल के दूसरी तरफ  कमल के फूल का  चिह्न भी है, जिसमें हिंदी-अंग्रेजी में परमवीर चक्र लिखा गया. डिजाइन पास होने के बाद परम वीर चक्र (पीवीसी – PVC ), भारत की  सभी सेनाओं  के अधिकारियों के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार के तौर पर मान्य हुआ.  सबसे पहले परमवीर चक्र भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर 26 जनवरी 1950 को पेश किया गया था.

और चक्र भी डिज़ाइन किये :
न सिर्फ परमवीर चक्र बल्कि सावित्री बाई खनोलकर ने महावीर चक्र , कीर्ति चक्र , वीर चक्र , शौर्य चक्र और अशोक चक्र के भी डिज़ाइन  तैयार किये थे. यही नहीं उन्होंने जनरल सर्विस मैडल का भी डिज़ाइन बनाया था.

सावित्री बाई ने सभी वीरता पुरस्कार डिजाइन किए.

यूँ बदला जीवन :
असल में फौजी अधिकारी कैप्टन विक्रम खनोलकर से शादी के बाद इवा पूरी तरह से बदल गई थीं. वो पूरी तरह भारतीयता के रंग में ढल चुकी थीं. उनकी पृष्ठभूमि से अनजान जो भी शख्स उनको पहली बार मिलता था वो इवा यानि  सावित्रीबाई खनोलकर को भारतीय ही समझता था.  पति विक्रम खानोलकर की जब मेजर के पद पर तरक्की हुई तो पोस्टिंग भी औरंगाबाद से पटना हो गई. बस यहीं से इवा की जिंदगी में नया मोड़ आया था.

पटना पहुंचकर सावित्रीबाई खनोलकर ने  पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. यहीं पर सावित्री बाई ने संस्कृत नाटक, वेद, और उपनिषद की गम्भीरता से पढ़ाई की. इतना ही नहीं  स्वामी रामकृष्ण मिशन का हिस्सा बनकर इवा ने  सतसंग तक सुनाए. संगीत और नृत्‍य में माहिर  होने के लिए वो उस समय के सबसे नामी गिरामी गुरुओं में से एक  पंडित उदय शंकर के संपर्क में भी आईं और फिर उनकी शिष्‍या बन गईं. कई  विधाओं में पारंगत  होने के बाद उन्होंने सेंट्स ऑफ़ महाराष्ट्र (Saints of Maharashtra)  और संस्कृत डिक्शनरी ऑफ़ नेम्स  (Sanskrit Dictionary of names )  शीर्षक वाली  दो  किताबें भी लिखी . लेकिन 1952 में मेजर जनरल विक्रम खनोलकर के निधन के बाद सावित्री बाई खनोलकर पूरी तरह से अध्यात्म को समर्पित हो गईं.  26 नवम्बर 1990 को इवा यानि सावित्रीबाई खनोलकर ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद इस संसार से विदा ले ली.