आईपीएस राजेश खुराना को सीआरपीएफ के कोबरा सेक्टर का प्रभार सौंपा गया

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सीआरपीएफ
भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी राजेश खुराना को कोबरा सेक्टर की कमान सौंपी गई है.

केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ crpf ) में तैनात भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी राजेश खुराना को कोबरा सेक्टर की कमान सौंपी गई है. राजेश खुराना भारतीय पुलिस सेवा के एजीएमयूटी कैडर के 1994 बैच के अधिकारी हैं. वर्तमान में आईजी रैंक के पुलिस अधिकारी श्री खुराना बीते साल सीआरपीएफ में प्रतिनियुक्ति पर गए थे. उससे पहले आईपीएस राजेश खुराना दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर थे.

राजेश खुराना ने हाल ही में कमांडो बटालियन फॉर रिजॉल्यूट एक्शेन (commando battalion for resolute action – CoBRA) सेक्टर का कार्यभार संभाला है. उनसे पहले अभी तक आईपीएस डॉ महेश्वर दयाल इस सेक्टर के प्रभारी आईजी थे. गोरिल्ला और जंगल युद्ध जैसे ऑपरेशंस के लिए कोबरा बटालियन बनाई गई थीं. शुरू में, साल 2008 – 2009 के दौरान कोबरा की 2 बटालियन थीं जो 2011 तक बढाकर 10 की जा चुकी हैं. इस सेक्टर के पहले प्रभारी के दुर्गा प्रसाद थे.

गृह मंत्रालय की मंज़ूरी के बाद बनी कोबरा बटालियन (cobra battalion) की खासतौर पर तैनाती मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड आदि राज्यों के नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में कार्रवाइयों के लिए की जाती है. नक्सली हिंसा प्रभावित ज़्यादातर आदिवासी आबादी और जंगली क्षेत्र वाले ग्रामीण इलाके हैं लिहाज़ा इन इलाकों में कार्रवाइयों के लिए कमांडो अलग से प्रशिक्षित किये जाते हैं. कोबरा कमांडो को जंगल के योद्धा (jungle warriors ) भी कहा जाता है. इन इलाकों में की जाने वाली कार्रवाइयां काफी संवेदनशील और बेहद जोखिम भरी व खतरनाक स्तर की होती हैं लिहाज़ा यहां तैनात होने वाले कमांडो में साहस, ताकत और देश भक्ति का स्तर भी बेहद ऊँचे दर्जे का होता है.

कोबरा सेक्टर का प्रभार होना चुनौती भरा काम इसलिए भी है क्योंकि केंद्र के अलावा विभिन्न राज्यों की अलग अलग एजेंसियों से भी अलग अलग स्तर पर तालमेल रखना पड़ता है. नक्सली हिंसा से निपटने के लिए सीआरपीएफ की इस इकाई ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन इसके लिए कई कमांडो को अपनी जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी. बड़ी तादाद ऐसे कमांडो की भी है जिनके शरीर के अंग भंग हो गए. इन कार्रवाइयों के दौरान यदा कदा विवाद भी होते रहे हैं. ये एक अलग तरह की चुनौती है जिसे अधिकारियों को निपटना पड़ता है.