अजीत डोभाल फिर भारत के एनएसए , कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी

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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल

भारतीय पुलिस सेवा के 1968 बैच के रिटायर्ड अधिकारी अजीत डोभाल को फिर पांच साल के लिए भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया है. साथ ही इस बार उनको कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया है. 1988 में कीर्ति चक्र पाने वाले भारत के पहले पुलिस अधिकारी अजीत डोभाल ने अपने करियर का ज़्यादातर हिस्सा गुप्तचर ब्यूरो (इंटेलिजेंस ब्यूरो – IB) में बिताया है और वह इस संगठन के निदेशक (प्रमुख) भी रहे हैं.

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भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का नियुक्ति पत्र

इंग्लेंड और पाकिस्तान में भी तैनात रह चुके अजीत डोभाल को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाइयों का विशेषज्ञ माना जाता है और उनके काम को लेकर संतुष्ट भारत सरकार का उनको फिर से एनएसए की ज़िम्मेदारी सौंपना कोई अप्रत्याशित नहीं है लेकिन कैबिनेट मंत्री का दर्जा देना ज़रूर कुछ हलकों में हैरानी पैदा करने वाला है. बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अजीत डोभाल का काम तो सुरक्षा मामलों में सलाह देना है लेकिन वह गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस संगठनों और अन्य ऐसी एजेंसियों के सुरक्षा एजेंसियों में तालमेल की कड़ी के तौर पर भी काम कर रहे हैं. आंतरिक सुरक्षा के साथ साथ बाहरी सुरक्षा के नजरिये से उनकी भूमिका का ताल्लुक विदेशों से भी है खासतौर से वो देश जिनकी सीमाएं भारत को छूती हैं.

हाल ही में भारत में फिर से पांच साल के लिए वजूद में आई नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपने दूसरे दौर में जिन पूर्व विदेश सचिव सुब्रमन्यम जयशंकर को विदेश मंत्रालय की ज़िम्मेदारी सौंपी है वो असल में भारतीय विदेश सेवा के 1977 बैच के अधिकारी हैं. लिहाज़ा अफसरशाही के करियर के हिसाब से एस. जयशंकर अजीत डोभाल से जूनियर हैं. यही नहीं दोनों अधिकारी साथ साथ भी काम कर चुके हैं. यदि एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाकर अजीत डोभाल को ऐसा ही कुछ पोर्टफोलियो न दिया जाता तो साथ साथ काम करने के दौरान प्रोटोकाल की बंदिशें आड़े आती.

74 वर्षीय अजीत डोभाल को 64 वर्षीय एस. जयशंकर के सामने जूनियर के नाते सामने आना होता. वैसे भी सरकारी स्तर पर सेवा के लिए मिले सम्मान के मामले में भी दोनों एक दूसरे से कम नहीं हैं. जहाँ अजीत डोभाल कीर्ति चक्र विजेता पुलिस अधिकारी हैं तो एस. जयशंकर भारत सरकार के पद्मश्री से सम्मानित हस्ती हैं. लिहाज़ा नये रोल में दोनों अधिकारियों के बीच संतुलन और प्रोटोकॉल में गड़बड़ होने से रोकना भी अजीत डोभाल को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने का एक कारण है. वैसे भी ये स्थिति अजीबो गरीब होती कि पूर्व विदेश सचिव के नाते राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अधीन रहे शख्श को उससे ऊपर कैबिनेट में जगह दी जाती.

प्रोटोकॉल के अलावा कुछ व्यवहारिक पहलू भी ऐसे हैं जिसके लिए अजीत डोभाल को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देना सही माना जा रहा है. असल में सरकार एनएसए को, नोडल एजेंसी या संस्थान के नाते, ज्यादा अधिकारयुक्त संस्था बनाना चाहती है. लिहाज़ा एनएसए के रैंक को बढाना एक बेहतर तरीका समझा गया. कुछ अधिकारी इसे सुचारु काम के लिए भी ज़रूरी मानते हैं.

अजीत डोभाल को 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी एनडीए की पहली सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया था. उडी हमले और फरवरी में पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ की गई अलग अलग कार्रवाइयों के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल की प्लानिंग मानी जाती है. ऐसे में उनके रोल को एक नोडल अधिकारी के तौर लिया गया लेकिन निर्णय लेने के उनके अधिकार को इतना प्रभावी नहीं माना जाता था. मंत्री का दर्जा मिलना उनके निर्णय लेने की शक्ति पर लगने वाले किन्तु परन्तु की गुंजायश कम कर देगा, खास तौर से जब सवाल सरकार के मंत्री स्तर पर उठते हैं.

एनएसए के ओहदे को कैबिनेट मंत्री के रैंक का करने के पीछे सरकार की एक मंशा ऐसा संदेश भी देना है कि ये भारत की पुलिस, सुरक्षा और गुप्तचर सेवाओं को अहमियत देने वाली सरकार है. दूसरा, ये राजनीतिक नज़रिए से लिया गया एक फैसला भी है जिसका मकसद आम लोगों को सन्देश देना है कि देश की सुरक्षा सरकार की उच्च दर्जे की प्राथमिकता है ये सिर्फ चुनावी वायदा भर नहीं है.

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