पुलिस के तीन हीरो… जो इस टैक्सी ड्राइवर के लिये भगवान हो गये!

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दिल्ली पुलिस
सलाम दिल्ली पुलिस की इस तिकड़ी को जिसने किसी हीरो की तरह एक जिंदगी बचाई. बाएं से सहायक उपनिरीक्षक (ASI ) श्रीराम, हवलदार भाल सिंह और कांस्टेबल सुरेश कुमार

आइये…आपको मिलवाते हैं उन तीन हीरो से जिनकी चर्चा अब दिल्ली में हो रही है. ये तीनों वो हीरो हैं जिनकी वजह से उस टैक्सी ड्राइवर योगेश की जान बच सकी जिसे टैक्सी चलाते वक्त दिल का दौरा पड़ गया था. इनमें से पहले हैं सहायक उपनिरीक्षक (ASI ) श्रीराम… नाम के जैसा ही अच्छा काम भी कल इन्होने किया. किसी की जान बचाने जैसे बड़े काम के लिए जब तारीफ़ की गई तो बड़े विनम्र भाव से कहते हैं, “जनाब ये तो दिमाग काम कर गया और ट्रेनिंग काम आ गई, हमने क्या किया? …ये तो ईश्वर ने करवाया हमसे”. ड्राइवर योगेश को अस्पताल पहुँचाने के बाद भी इन्होने उसकी खैर खबर ली और बताते हैं, ‘ वो ड्राइवर गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है, उसकी माँ से बात हुई थी …योगेश अस्पताल में ही है अभी.”

कब जागेगी दिल्ली ? तड़पते पुलिसकर्मी पर भी दया नहीं आई ..!

दिल्ली पुलिस में नौकरी करते हुए श्रीराम को 35 साल से ज्यादा हो गये हैं. बतौर सिपाही उन्होंने 1982 में राजधानी की पुलिस फ़ोर्स में करियर शुरू किया था.

योगेश की जान बच जाने पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं – ‘जनाब ऐसा दूसरी बार हुआ है.’ इसके बाद वो 15 साल पुराना किस्सा सुनाते हैं जब उन्होंने दिल्ली में एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर की जान बचाई थी. ASI श्रीराम को उसका पूरा नाम तो याद नहीं अब लेकिन उसे तिवारी (उपनाम) कहते हैं. श्रीराम तब दक्षिण दिल्ली में संगम विहार थाने में तैनात थे… याद करते हुए बताते हैं, ‘जनाब ये बात है सन 2002 की… में एक सिपाही के साथ गश्त पर था, दो बदमाश ऑटो वाले को गोली मार के भाग रहे थे… हमने एक बदमाश को तो काबू कर लिया लेकिन दूसरा भाग गया, ऑटो वाले के सर में लगी थी गोली. ” श्रीराम और उसके साथी सिपाही ने वक्त पर उस ऑटो वाले को अस्पताल पहुंचवा दिया तो उसकी जान बच गई थी.

महकमे में उनके इस काम की तारीफ़ भी हुई और अच्छे काम के लिए प्रमाणपत्र भी मिला. बड़े सहज भाव से कहते हैं, ” उस दिन तो जी हमारी किस्मत भी अच्छी थी, बदमाश कट्टा लिए हुये था… वो तो यूँ समझो कि बस डर के मारे वो चला न सका.”

इसका मतलब आपने पहले भी किसी की ज़िन्दगी बचाकर बड़ा का काम किया..! इस पर फिर श्रीराम कहते हैं, ‘ ये तो किस्मत की बात है जी, हम भी बच गये उस दिन तो’ …और ऑटो वाले की प्रतिक्रिया के बारे में पूछा गया तो बोले, ‘वो बाद में मुकदमे के दौरान कोर्ट में मिला तो पाँव पड़ने लगा… मैंने उसे रोका – पंडित जी क्यूँ पाप चढा रहे हो हम पे.’

हीरो नम्बर दो हैं हवलदार भाल सिंह. दिल्ली पुलिस में 1998 में भर्ती हुए. पुलिस में आने की वजह तो रोजगार पाना ही था लेकिन ऐसा कि जिसमें सेवा की भावना भी हो. हरियाणा के नारनौल के रहने वाले इन साहब का भाई वायुसेना में हैं और कुनबे के कई लोग आर्मी या किसी न किसी फ़ोर्स का हिस्सा हैं.

यातायात पुलिस में आये बस एक महीना ही हुआ है. बातें बहुत अच्छी और सच्ची करते हैं और सरल भाव से बोलते हैं – हमने तो जी पोजिविटी पसंद है. पहले PCR में थे तो हमें सिखाया जाता था कि मुसीबत में फंसा आदमी ही हमको बुलाता है क्यूंकि हम इस काबिल है कि उसकी मदद कर सकें. भाल सिंह कल की घटना का ज़िक्र करते हुए बोलते हैं, ‘ हमें PCR की ट्रेनिंग के दौरान सिखाया गया था जी कि दिल का दौरा पड़ने पर किसी बंदे को बचाने के लिए कैसे पम्पिंग की जाती है. ‘

तीसरे पुलिसकर्मी जो योगेश की मदद के लिए आगे आये वो हैं सिपाही सुरेश. राजस्थान के बहरोड़ (अलवर) के रहने वाले सुरेश 2010 में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुए थे. गाँव में सब खेतीबाड़ी करते हैं. लेकिन इन्हें अपनी वर्दी पर फख्र है. बचपन से सपना था पुलिस में जाना सो कहते, ‘ पहली बार अटेम्प्ट किया था और उसी में सलेक्ट हो गया.’