लगातार संवेदनशील बने हुए भारत – चीन बॉर्डर की निगरानी की जिम्मेदारी संभाल रहे केन्द्रीय पुलिस संगठन भारत – तिब्बत सीमा पुलिस ( indo tibet border police) को क्या पर्याप्त अरसे के लिए मज़बूत नेतृत्व नहीं मिलना चाहिए ? खासकर तब जबकि चीन की तरफ से अरुणाचल और लदाख सीमा पर सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाने गतिविधियां की जा रहीं हो और जिससे तनाव बरकरार हो ! यह सवाल इसलिए उठना लाज़िमी है क्योंकि आईटीबीपी के महानिदेशक के पद पर अपना मात्र साढ़े नौ महीने का कार्यकाल पूरा करके 31 अक्टूबर 2026 को सेवानिवृत्त हो रहे आईपीएस शत्रुजीत कपूर ( shatrujeet kapur ) का काम पूर्णकालिक तौर पर किसी अधिकारी को सौंपने बजाय एक अन्य केन्द्रीय पुलिस संगठन सशस्त्र सीमा बल ( एसएसबी ) के महानिदेशक संजय सिंघल को अतिरिक्त प्रभार के तौर पर देने का ऐलान किया गया है .
वर्तमान में तकरीबन 90 हजार की संख्या वाला आईटीबीपी ( itbp) लदाख में काराकोरम दर्रे से लेकर अरुणाचल प्रदेश में जाचेप ला तक, भारत-चीन की 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा की सुरक्षा करती है. तकरीबन 62 साल पहले गठित आईटीबीपी इस क्षेत्र के लिए विशेषज्ञ बॉर्डर एजेंसी है . परिस्थितियों की मांग है कि इस भारत चीन सीमा की निगहबानी पर तैनात आईटीबीपी को और मज़बूत किया जाए और इस योजना पर काम भी हो रहा है जिसके लिए तकरीबन 400 करोड़ रुपया खर्च करने का प्रस्ताव है . इसमें से काफी खर्च आग्रिम चौकियों को बेहतर करने और ड्रोन व एंटी ड्रोन तकनीक पर होगा . गलवान घाटी ( galwan valley) की झड़पों में अपने 20 सैनिक खोने की घटना के बाद भारत की तरफ से उठाए कदमों में से एक आईटीबीपी में शौर्य कमांडो दस्ते तैयार करना है . लेकिन हैरानी इस बात की है कि जो सीमाई बल इतनी अहमियत रखता हो उसके नेतृत्व की नियुक्ति को हल्केपन से लिया जा रहा है.
भारतीय पुलिस सेवा ( indian police service) के 1990 बैच के हरियाणा कैडर अधिकारी शत्रुजीत कपूर जनवरी 2026 में आईटीबीपी का महानिदेशक बनाए जाने से पहले हरियाणा के पुलिस महानिदेशक थे. हरियाणा के ही एक वरिष्ठ आईपीएस वाई पूरण कुमार ( ips y puran kumar) की चंडीगढ़ में आत्महत्या की घटना में नाम आने के विवाद के बाद अक्टूबर 2025 में शत्रुजीत कपूर को छुट्टी पर भेज दिया गया था और दिसम्बर में उनको हरियाणा सरकार ने पुलिस प्रमुख के पद से हटा दिया था. जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने उनको आईटीबीपी की कमान सौंप दी जबकि साथ वर्ष की आयु के हिसाब से उनके पास दस महीने से भी कम का समय था .
कुछ ही दिन पहले राजस्थान के अलवर में आईटीबीपी शौर्य कमांडो दस्ते ( shaurya commandos unit) के गठन के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में शत्रुजीत कपूर ने भारत – चीन की अरुणाचल सीमा पर चीन के सेना की गतिविधियों के कारण बढ़ते तनाव का ज़िक्र किया था और कहा था कि यह जारी है. यह उस समय की बात है जब सितम्बर के मध्य में ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नई दिल्ली में थे . शत्रुजीत के इस बयान को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार को घेरा था. विदेश मंत्रालय को इस पर स्पष्टीकरण देना पड़ा था. सरकार का कहना था कि कभी कभी सीमा पर गश्त के रास्ते या तरीके में बदलाव के कारण गड़बड़ी वाले हालात बन जाते हैं लेकिन राजनयिक या सैन्य तरीकों से समाधान कर लिया जाता है .

लेकिन कम समय के लिए किसी केन्द्रीय पुलिस संगठन या आईटीबीपी को डीजीपी मिलना कोई नई बात है. खासतौर पर एसएसबी और आईटीबीपी में तो यह देखा ही जा रहा है. बीते 10 साल में आईटीबीपी की कमान 9 बार बदली गई है. एस एस देसवाल को छोड़कर एक भी ऐसा डीजीपी इस बल को नहीं मिला जिसने लगातार दो साल भी इसकी कमान संभाली हो. शत्रुजीत कपूर से पहले तो प्रवीण कुमार सिर्फ चार महीने के लिए आईटीबीपी के डीजी बनाए गए थे . इन्हीं 10 साल में एक ऐसे डीजीपी भी आईटीबीपी को मिले जिनका कार्यकाल मात्र दो महीने ही रहा. यह थे आईपीएस डॉ सुजोय लाल थाओसेन जो 2022 में 1 अगस्त से 2 अक्टूबर तक आईटीबीपी के महानिदेशक रहे . सहज ही अंदाजा लगाया जा रक्त है कि इस बल के प्रमुख पद पर किसी अधिकारी के कार्यकाल को लेकर गृह मंत्रालय कितना गम्भीर है .
अब भारतीय पुलिस सेवा के 1993 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के जिन अधिकारी संजय सिंघल ( ips sanjay singhal ) को आईटीबीपी के महानिदेशक का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है वे सशस्त्र सीमा बल ( sashastra seema bal) के महानिदेशक हैं . एसएसबी का गठन आईटीबीपी से एक साल बाद यानि 1963 में हुआ . जैसाकि नाम से विदित है यह भी सीमाई क्षेत्र के लिए बनाया गया विशेष पुलिस बल है जिसकी जिम्मेदारी में नेपाल और भूटान से लगी सीमा की पहरेदारी करना है . इसके जवानों की तादाद एक आईटीबीपी से थोड़ा ज्यादा यानि एक लाख के आसपास है .
संजय सिंघल ने 1 सितम्बर 2025 को एसएसबी के डीजी का पद संभाला था यानि उन्हें इस तैनाती पर आए बीते महीने ही एक साल बीता है और अब उन्हें इतने ही बड़े बल का प्रभार और सौंप दिया गया है. यानि दोगुना काम . अगर उनका कार्यकाल न्हिन्न बढता है तो वे दिसम्बर 2028 में सेवानिवृत्त हो जाएंगे.
यहां यह भी सवाल उठता है कि जब हरेक अधिकारी की सेवानिवृत्ति की तिथि तय है तो उसके रिटायर होने से पहले ही बल के नए प्रमुख का नाम तय क्यों नहीं कर लिया जाता ? दूसरा यह भी कि चंद महीने की तैनाती में बल के काम काज को, उसके चरित्र को , उसके क्षेत्र को समझना और फिर फ़ोर्स से खुद का संबंध बनाकर नेतृत्व के तौर पर उसका संचालन ईमानदारी से कर पाना संभव है ? और भी एक नहीं दो दो संगठनों की जिम्मेदारी . यह पहलू इन बलों के प्रबन्धन के लिए जिम्मेदार और नीति निर्धारकों की समझ व नीयत पर भी शक की गुंजायश छोड़ता है .










