जब सीआरपीएफ जवानों को कश्मीरी सकीना में छोटी बहन नज़र आई

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'मददगार' सीआरपीएफ की इस टीम ने सकीना की जिंदगी संवारने की पहल की है यह सिलाई मशीन देकर.

इंसानियत और मदद की कई असली कहानियों की इबारत लिखने वाली भारत की केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ-CRPF) के जवानों के जज़्बे ने, आतंकवाद से ग्रस्त राज्य कश्मीर की सकीना और उसके बेबस परिवार की तरफ जब रुख किया तो, हर तरफ से हताश, इस परिवार की तस्वीर ही बदल गई. रोज़ी-रोटी के लिए तरसते और मजबूर परिवार को सीआरपीएफ के 20 जवानों की व्यक्तिगत तौर पर की गई छोटी सी कोशिश इस छोटे से कश्मीरी परिवार के लिए बड़ी उम्मीद बन गई.

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सीआरपीएफ की दी गई सिलाई मशीन पर अब सकीना के हाथ जम गये हैं.
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सीआरपीएफ अब सकीना की छोटी बहन (दाहिने) की पढ़ाई का भी पूरा बन्दोबस्त कर रही है.

सकीना और उसके परिवार के हालात में आये बदलाव की दास्तान का ताल्लुक सीआरपीएफ की उस हेल्पलाइन से है जो कश्मीर के बाशिंदों की इमदाद के लिये 24 घंटे हाज़िर है, चाहे वो बाशिंदा जम्मू कश्मीर राज्य में रहता हो या उसके बाहर. जून 2017 में वजूद में आने के डेढ़ साल के अंदर ‘मददगार’ हेल्पलाइन ने सकीना और इनके जैसे मदद की उम्मीद करके संपर्क करने वाले 3 लाख लोगों की फोन काल्स सुनी हैं.

बुजुर्ग पिता की आखों में मोतियाबिंद की वजह से दृष्टिहीनता और उस पर माँ के बीमार पड़ जाने से मजबूर सकीना को 9वीं कक्षा में स्कूल छोड़ना पड़ गया. घर का जहां खर्च चलना और पेट पालना ही दूभर हो तो ऐसे में पढ़ाई का खर्च भला कैसे उठाया जा पाता. लेकिन अपनी पढ़ाई को बीच सफर में अधूरा छोड़ने वाली सकीना नहीं चाहती थी कि उसकी छोटी बहन के भविष्य का भी यही हाल हो. बहन और परिवार की मदद की आस के साथ सकीना ने सीआरपीएफ की हेल्पलाइन मददगार को जब आपबीती बताई तो उसने मददगार की टीम को अपने साथ खड़ा पाया.

सीआरपीएफ की मददगार हेल्पलाइन के सुपरवाइजर सब इंस्पेक्टर सत्यम यादव ने बताया कि 20 नवम्बर की दोपहर को जब मददगार हेल्प लाइन (टोल फ्री नम्बर 14411) पर सकीना ने फोन किया और अपने व अपने परिवार की कहानी बताई तो हमें यहाँ से दूर बैठे अपने परिवारों का भी ख्याल आया, “लगा जैसे सकीना हमारी छोटी बहन हो”. सकीना की उम्र महज़ 18 साल थी लेकिन वह अपने दम पर परिवार को चलाना चाहती थी. इस मकसद से उसने छह महीने का सिलाई का कोर्स भी किया लेकिन सिलाई मशीन खरीदने के लिए रकम नहीं थी.

सीआरपीएफ के अधिकारियों ने बताया कि इस मददगार टीम के 20 जवानों ने व्यक्तिगत तौर पर पहल की. उन्होंने अपने वेतन में रूपये निकाल आपस में जमा किये और सकीना के लिए सिलाई मशीन का बन्दोबस्त किया ताकि वह कपड़ों की सिलाई करके कुछ आमदनी कर सके. सकीना को आत्मनिर्भर और परिवार के लिए सम्बल बनाने के साथ साथ मददगार अब सकीना की छोटी बहन की पढ़ाई का भी पूरा बन्दोबस्त कर रही है. ये बच्ची 7 वीं क्लास में पढ़ती है.

बीमारों को अस्पताल पहुँचाने से लेकर उनके लिए खून का इंतजाम करने जैसी कई और तरह की मदद पहुंचाने की असंख्य कहानियाँ बना चुकी मददगार हेल्पलाइन सीआरपीएफ में ही नहीं, दूसरे पुलिस संगठनों और कश्मीरियों के दिलों में भी ख़ास जगह बना रही है.

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