मिलिए ‘सेना की बेटी’ इनायत से जिसने शहीद पिता की वर्दी पहनने का सपना पूरा किया

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ओटीए में लेफ्टिनेंट इनायत सेना के अधिकारियों और मां शिवानी के साथ

तीन साल की नन्ही सी आयु के बाद से पूरा जीवन पिता के प्यार दुलार से महरूम रही इनायत वत्स ने जब सेना की वर्दी धारण की तो अचानक ही किसी ने उसके बारे में कहा ,’ यह है सेना की बेटी ‘. सच में  इसमें कोई शक ही नहीं है . इनायत ने  उसी वर्दी को चुना जिसे पहने उसके पिता मेजर नवनीत वत्स ने जम्मू – कश्मीर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी . यह बीस साल पुरानी बात है.  इनायत वत्स की प्रेरणादायक इस कहानी को कल तब सबने जाना जब  चेन्नई स्थित सेना की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकेडमी ( officers training academy ) में  शानदार पासिंग आउट परेड के दौरान जानकारी दी गई . इनायत अब लेफ्टिनेंट इनायत वत्स हैं और सेना के प्रति समर्पित परिवार की परम्परा को आगे बढ़ाती  तीसरी पीढ़ी नें शुमार हो गई .

हरियाणा के पंचकूला की रहने वाली इनायत दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज  की स्नातक हैं. वह यहीं के हिन्दू कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम ए कर रही हैं .

मेजर नवनीत वत्स

इनायत वत्स ( inayat vats ) की मां शिवानी ने बताया कि इनायत ने एक बार उनसे पूछा कि अगर मैं लड़का होती तो आप क्या करते? इस पर मैंने उससे कहा कि मैं उसे एनडीए या आईएमए में शामिल होने के लिए कहती. शिवानी कहती हैं कि मुझे खुशी है कि आरामदायक जीवन बिताने के ऑप्शन के बावजूद इनायत ने  अपने पिता की राह पर आर्मी ज्वाइन की.

इस तरह इनायत ने अपने विचार को भी आगे बढ़ाया और देश सेवा के लिए अपने पिता की तरह सेना को चुना.

कौन थे मेजर  नवनीत वत्स :

चंडीगढ़ के रहने वाले मेजर नवनीत वत्स  ( maj navneet vats) हमेशा से ‘ऑलिव ग्रीन’ वर्दी ( olive green uniform) पहनना चाहते थे.  अपने बचपन के सपने को साकार  करते हुए वह सेना में शामिल हुए. उन्हें 3 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन में कमीशन हासिल हुआ . कुछ साल की  सेवा करने के बाद, मेजर नवनीत ने  शिवानी से शादी कर ली और दंपति की एक बेटी हुई – इनायत.  नन्हीं इनायत ने उनके जीवन को अद्भुत पलों और ढेर सारी खुशियों से भर दिया था लेकिन  ऐसा 20 नवंबर, 2003 तक ही रहा. यह दिन  परिवार के लिए  मनहूस दिन साबित हुआ .

श्रीनगर ऑपरेशन: 20 नवंबर 2003:
मेजर नवनीत को अपनी यूनिट के साथ कुछ वर्षों तक सेवा देने के बाद 32 राष्ट्रीय राइफल्स ( 32 rashtriya rifles)  में प्रतिनियुक्ति पर श्रीनगर में तैनात किया गया था. 32 आरआर  ( 32 RR) उग्रवाद विरोधी अभियानों में लगी हुई थी और नियमित आधार पर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करती थी. 18 नवंबर 2003 को, आतंकवादियों के एक गुट  ने श्रीनगर में एक सरकारी इमारत पर कब्जा कर लिया था.  सुरक्षा बलों ने संकट से निपटने के लिए एक संयुक्त अभियान शुरू करने का फैसला किया.  दो दिन तक गतिरोध के बाद यानि 20 नवंबर को  आतंकवादियों को मार गिराने के लिए ऑपरेशन करने की योजना बनी.

इस महत्वपूर्ण ऑपरेशन के लिए  मेजर नवनीत वत्स को आक्रमण टीम के  नेतृत्व  का ज़िम्मा सौंपा गया था. यह बहुत जोखिम भरा मिशन था क्योंकि आतंकवादी इमारत के अंदर सुरक्षित स्थानों पर छिपे हुए थे और स्वचालित हथियारों से लैस थे.   एक दृढ़ संकल्पशील और  के  प्रतिबद्ध सैनिक मेजर नवनीत  ने यह चुनौती स्वीकार  की और सामने से अपनी टीम का  नेतृत्व करते हुए इमारत पर धावा बोल दिया.  मेजर नवनीत और उनके दृढ़निश्चयी साथियों  ने इमारत में घुसने के लिए गज़ब का  साहस दिखाया. क्योंकि आतंकवादी अंदर अच्छी पोजीशन पर  तैनात थे, इसलिए उन्होंने टीम पर भारी गोलीबारी की. ऐसे में  आगे बढ़ना कोई आसान काम नहीं था लेकिन ये बहादुर टीम  आतंकवादियों को ढेर करने के हौंसले से आगे बढ़ा.

भीषण गोलीबारी के दौरान मेजर वत्स के शरीर के ऊपरी हिस्से  में छह गोलियां लगीं .  एक कर्नल समेत  चार अन्य बहादुर सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए.  गोलियां लगने से मेजर नवनीत का काफी खून बह गया और बाद में उन्होंने प्राण त्याग दिए.  मेजर नवनीत ने ऑपरेशन के दौरान उत्कृष्ट साहस और नेतृत्व दिखाया और देश की सेवा में अपना जीवन लगा दिया.  मेजर नवनीत वत्स को उनकी बहादुरी, अडिग लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार, “सेना मेडल” ( sena medal ) दिया गया.