पहले सेना, फिर पुलिस और फिर से सेना में भर्ती हुआ ये कश्मीरी वीर योद्धा

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मोहम्मद अफज़ल भट्ट
मोहम्मद अफज़ल भट्ट.

पाकिस्तान के साथ 1971 की जंग में बुरी तरह ज़ख़्मी होने के कारण ‘शहीद’ मान लिए गये मोहम्मद अफज़ल भट्ट का पहाड़ पर गिरकर जमी बारूद से भरी बदबूदार बर्फ से भूख प्यास मिटाने की कोशिश करना तो एक अजूबी बात थी लेकिन इस तरह की मजबूरी जैसे हालात के उतार चढ़ाव से रोज़ाना ही ये फौजी जंग लड़ता रहा है. कई बार उनके ये हालात दिलचस्प लगने वाली घटनाओं में तब्दील हो गये. अफज़ल भट्ट का  सेना में भर्ती होना भी किसी अजीबोगरीब हालात से कम नही था.

उस वक्त मोहम्मद  अफज़ल भट्ट की उम्र तकरीबन 18 साल रही होगी. ये बात साल 1968 की है. उनकी माँ का इंतकाल हो गया था . घर की माली हालत खराब थी … भाई बहन छोटे छोटे थे. ऐसे में मानसिक दबाव को ये सबसे बड़ा लड़का सह नहीं पा रहा  और घर से भागकर अनंतनाग में अपने मामा के घर चला  गया. काम की तलाश थी . तभी वहीँ मामा के एक जानकार सूबेदार मेजर अब्दुल गनी से मुलाक़ात हुई. उन्होंने पूछा – फ़ौज में भर्ती होगा ?   अफज़ल ने हां कह तो दी लेकिन न तो पढ़ाई लिखाई की थी और न ही उस वक्त कद भी फ़ौज के मुताबिक था. वहां 25 नौजवान फिट निकले लेकिन तीन ही सेलेक्ट (select)  हो सके. मोहम्मद अफज़ल भट्ट भी उन तीनों में से एक था. लेकिन जब डॉक्टरी जांच हुई तो वही  हुआ जिसका डर था. डॉक्टर ने कह दिया कि भर्ती के लिए जवान का जितना कद होना चाहिए , अब्दुल भट का कद उससे 2  इंच कम है लेकिन तभी भर्ती अधिकारी को किसी ने बताया कि ये सूबेदार मेजर अब्दुल गनी साहब का लड़का है.

मोहम्मद अफज़ल भट्ट
मोहम्मद अफज़ल भट्ट पुलिस की नौकरी के दौरान

कद बड़ा हो जाएगा :
इस किस्से को हंसते हुए अब्दुल अफज़ल भट्ट बताते हैं, ” भर्ती अधिकारी  को जिसने बताया वो कहना चाहता था कि इस लडके को सूबेदार मेजर साहब ने भेजा है जबकि भर्ती करने वाले अधिकारियों की टीम ने समझा कि मैं उनका बेटा हूँ. इसलिए उन्होंने हमदर्दी दिखाई और कहा कोई बात नहीं कुछ दिन बाद ये बड़ा  (कद) हो जायेगा. अभी उम्र है”. बाकी तमाम शारीरिक और शक्ति वाले भर्ती मापदंडों पर वो खरे उतारते थे सो अब्दुल अफज़ल भट्ट इस तरह जम्मू कश्मीर मिलिशिया में भर्ती हो गए. ये 11 दिसम्बर 1968 की बात है. पढ़ना लिखना तो क्या अफज़ल भट्ट को को तो अपने दस्तखत  तक नही करने आते थे. अब्दुल अफज़ल कुछ मुस्कराने और कुछ हैरान करते हुए बताते हैं , ” साबजी , तीन महीने तो अंगूठा टेक कर तनख्वाह ली है”. इस भर्ती के बाद  13 –  14 दिन में ही उनको ट्रेनिंग के लिए उधमपुर भेज दिया गया था.

छुट्टी लेना भी भारी था :
नौ महीने की ट्रेनिंग के बाद  जवान  मोहम्मद अफज़ल भट्ट छुट्टी लेकर अनंतनाग में अपने गाँव पहलू लौटा. उन दिनों सेना में भर्ती जवान का छुट्टी पर घर लौटना भी शक की नज़र से देखा जाता था खासकर छुट्टी लम्बी हो तो. स्थानीय थाने से पुलिस की तरफ से छानबीन शुरू हो जाती थी . परिवार वालों को डर लगने लगता था. अक्सर पुलिस वाले समझते थे कि जवान सेना का भगौड़ा है. अफज़ल भट्ट  कहते है . ” मेरे पिताजी इस सबसे बहुत डरते थे, मैं छुट्टी लेता ही नही था या लौट जाता था”. लेकिनं कितना अजीब इत्तेफाक है कि जिस  पुलिस की वर्दी से पिता दूर रहना पसंद करते थे वही वर्दी खुद अब्दुल अफज़ल भट्ट को भी पहननी पड़ी.

मोहम्मद अफज़ल भट्ट ने युद्ध के मोर्चे पर क्या किया ? इसे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें …. https://www.rakshaknews.in/special/indian-pakistan-war-kashmir-indian-army-jak-li-war-veteran-afzal-bhat/

जब युद्ध के बाद लौटा :
हुआ यूँ कि 1971 की लड़ाई में बुरी तरह ज़ख़्मी होने के बाद कुछ महीने मोहम्मद अफज़ल का इलाज़ चला लेकिन जब वापस अपनी यूनिट पहुंचे तो उनको सेहत के हिसाब से उस यूनिट के लिए फिट ना बताते हुए  लेने से मना कर दिया गया. तब मिलिशिया को भारत की नियमित सेना की यूनिट के तौर पर जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंट्री बना दिया गया था. मोहम्मद अफज़ल को कहा गया कि आप डिफेन्स सिक्यूरिटी कोर ( डीएससी – DSC )  में जाओ. दरअसल डीएससी ऐसी यूनिट है जो सैन्य संस्थानों की सुरक्षा का काम करती है . मोहम्मद अफज़ल का कहना है कि उनको कह तो दिया गया लेकिन डीएससी में जाने से सम्बन्धित कोई कागज़ी कार्रवाई अधिकारियों ने नहीं की और जब मोहम्मद अफज़ल डीएससी पहुंचे तो वहां उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया गया. दरअसल इसके लिए जवान ज्यादा थे और वेकेंसी कम थीं. मोहम्मद अफज़ल कहते हैं कि इसके लिए वो चक्कर काटते रहे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. इसी दौरान जम्मू कश्मीर पुलिस में अस्थाई ( temporary ) आधार पर सिपाहियों की भर्ती शुरू हुई. वेतन था 1100 रुपये. मोहम्मद अफज़ल ने जम्मू कश्मीर पुलिस की वर्दी पहन ली. उनकी तैनाती श्रीनगर में थीं. उन दिनों भी वहां पथराव की घटनाएं होती रहती थीं.

वापस सेना की सेवा :
इस तरह के हालात में मोहम्मद अफज़ल को काम करना भाता नहीं था,  मजबूरी थी. लेकिन तीन साल बाद सेना के लिए फिर से काम करने की  उनकी इच्छा एक दिन अचानक जैसे पूरी हो गई.  अफज़ल बताते हैं कि  एक दिन ऐसे ही पथराव वाले हालात में उनकी ड्यूटी गुपकार रोड पर थी जहां से अपनी गाड़ी से गुज़र रहे थल सेना के सब एरिया कमांडर गुप्ता साहब की नज़र मुझ पर पड़ी. अफज़ल बताते हैं , ” गुप्ता साहब ने मुझसे थोड़ा बहुत कुछ पूछा और फिर उनके हुकुम  पर मुझे ऑर्ड नेन्स डिपो में तैनाती मिल गई और वेतन था 2000 रूपये. ”   यहाँ 13 साल काम करने के बाद मोहम्मद अफज़ल रिटायर हुए लेकिन बेटों की बेरोजगारी से दुश्वारियां बढ़ रही हैं.

मोहम्मद अफज़ल भट्ट
मोहम्मद अफज़ल भट्ट के घर की दरकी दीवारें

घर के हालात :
अपने आर्थिक हालात से नाखुश मोहम्मद अफज़ल चाहते हैं कि उनके बेटों को कोई स्थाई रोजगार मिल जाये. एक बेटा तो शादीशुदा भी है. दोनों बेटे 10 वीं तक पढ़े हैं. थोड़ी बहुत जमीन थी जिसमें से कुछ तो गाँव के पास बनाये गए ऐम्युनिशन डिपो की जद में आ गई हालांकि उसके ऐवज में 13 हज़ार रूपये सालाना का मुआवज़ा जैसा मिलता है. बाकी जो थोड़ी बहुत है उसमें कोई रोज़गार के लायक खेतीबाड़ी नहीं हो सकती. हाँ , घरेलू इस्तेमाल में थोड़ी बहुत आती है. सेब या कोई और फलों के पेड़ वहां लगा नहीं पाते क्यूंकि बंदरों का खूब उत्पात है. वो पेड़ों पर लगे फल बर्बाद कर डालते हैं. स्थानीय प्रशासन से भी उनकी शिकायतें हैं. गाँव के पास ऐम्युनिशन डिपो में 2007 में धमाके और आग से आसपास के तीन गाँवों के कई मकान तबाह हुए थे उनमें से मोहम्मद अफज़ल भट का भी मकान था.  इस परिवार का कहना है कि तब भी मिला मुआवज़ा काफी नहीं था उसके बाद भी डिपो में अक्सर होने वाले विस्फोटों से उनके मकान को क्षति पहुंची है लेकिन मुआवज़ा फिर नहीं मिल रहा. मकान में दरारें पड़ीं हैं और परिवार इसीमें खतरे के बावजूद रहने को मजबूर है.