सरकार एक तरफ कैबिनेट की मंजूरी के बाद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 मसौदे को संसद में पेश करने की तैयारी में है तो दूसरी तरफ इसी मुद्दे को लेकर नाराज़ इन संगठनों के सेवानिवृत्त अधिकारी 23 मार्च को दिल्ली में बिल के विरोध में धरना देने की योजना बना रहे हैं . यही नहीं अपनी मांग को लेकर वे तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं से सम्पर्क करके उनसे समर्थन भी जुटाने में लगे हैं . इसके लिए वे सांसदों और सियासी दलों के नेताओं को ज्ञापन भी सौंप रहे हैं . यह अधिकारी भारत सरकार के गृह मंत्रालय के आधीन आने वाले केन्द्रीय रिजर्व पुलस बल ( central reserve police force ), सीमा सुरक्षा बल ( border security force ) , केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल ( central industrial security force ) आदि विभिन्न संगठनों के कैडर से हैं.
इन बलों को कभी कभार अर्द्ध सैन्य बल भी कह दिया जाता है जिनका उपयोग आंतरिक सुरक्षा के साथ साथ सीमाओं की रक्षा में भी किया जाता है. लिहाज़ा यह कानून व्यवस्था बनाने में जहां राज्य पुलिस के साथ मिलकर काम करते हैं तो सेना के साथ इनका सम्पर्क रहता है. इन बलों की विभिन्न एसोसिएशन के गठजोड़ ‘एलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन’ ( alliance of all ex paramilitary forces welfare association) ने उपरोक्त आन्दोलन की रूप रेखा तैयार करके घोषित की है .
एलायंस के पदाधिकारियों का कहना है कि वे फिलहाल लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य मनोज कुमार झा, तेजस्वी यादव, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह और तृण मूल कांग्रेस ( टीएमसी ) समेत सहित कई अन्य दलों के नेताओं से संपर्क कर रहे हैं . है। ‘एलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन’ ने इस मामले में 23 मार्च को जंतर मंतर पर धरना देने की घोषणा की है। इस बाबत एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री कार्यालय को नोटिस दे दिया है.
जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना :
अधिकारी 23 मार्च को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से धरने देंगे. इस बाबत उन्होंने केन्द्रीय गृह मंत्रालय से लेकर प्रधानमन्त्री कार्यालय तक बता दिया है .
मामला क्या है :
असल में इन बलों में उन तमाम उच्च पदों में बड़ी तादाद में पद भारतीय पुलिस सेवा ( indian police service ) के अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं जहां बल के प्रबन्धन व नीति निर्धारण से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं . इससे मोटे तौर दो मुख्य समस्याएं पैदा होती हैं जिसे लेकर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल कैडर के अफसर परेशानी महसूस करते हैं . पहली तो यही कि सीमित उच्च पद होने के कारण इनके कैडर के सभी अधिकारियों के लिए तरक्की के अवसर कम होते हैं खास तौर पर कमांडेंट से ऊपर के पद पर भी बहुत अधिकारी पहुंच नहीं पाते हैं. इनकी पहली पोस्टिंग सहायक कमांडेंट के तौर पर होती है जो राज्य पुलिस में पुलिस उप अधीक्षक यानि डीएसपी के बराबर होता है . कमांडेंट बनने तक में ही अब 15 साल लग जाते हैं . अब उसके ऊपर तो तरक्की और भी मुश्किल है . एक तो डीआईजी और उसके ऊपर की पोस्ट यूं ही कम संख्या में होती हैं . उसमें से भी कुछ आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित होती हैं. लिहाज़ा आईपीएस अधिकारी सीधे डीआईजी या उसके ऊपर के ओहदों पर प्रतिनियुक्ति पर आ जाते हैं.
दूसरी दिक्कत यह है कि आईपीएस अधिकारियों ने पूर्व में इन बलों में ज़मीनी स्तर पर काम नहीं किया होता. वे अलग अलग प्रदेशों के साथ साथ अलग अलग कैडर के भी होते हैं. वे पुलिस के अपने अनुभव लेकर आते हैं जो कई मामलों में इन बलों के कामकाज से एकदम भिन्न होते हैं . उन्हें पहले अपने कार्य क्षेत्र को समझने में ही इतना समय लग जाता है कि ज़मीनी स्तर पर बल को सही से समझ ही नहीं पाते. जब तक समझने लगते हैं तब तक उनके कैडर तैनाती या कहीं और तबादला हो जाता है .
कानूनी लड़ाई :
इन तमाम मुद्दों और समस्याओं को लेकर इन बलों के अधिकारी डेढ़ दशक से कानूनी लड़ाई रहे हैं. जब सुप्रीम कोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि अगले दो साल में धीरे धीरे करके उन ओहदों पर ज्यादातर सीएपीएफ कैडर के अधिकारी लगाए जाएं जहां आईपीएस अफसरों की तैनाती होती है . यह ओहदे महानिरीक्षक और अतिरिक्त महानिदेशक के स्तर पर भी हैं . केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा के लिए जब पुनर्विचार याचिका डाली तो सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी और अपने पहले के फैसले पर कायम रही. अब क्योंकि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए बाध्य है लेकिन वह इसे उसी रूप में लागू नहीं करना चाहती . ऐसे में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की काट के तौर पर यह विधेयक लाने की तैयारी कर ली जो संसद के वर्तमान सत्र में पेश किए जाने के संकेत हैं .
ज्ञापन में कही गई बात:
एसोसिएशन की तरफ से सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों को जो ज्ञापन दिया जा रहा है, उसमें कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ( supreme court ) ने 23 मई 2025 के अपने निर्णय में यह घोषित किया कि सीएपीएफ के ग्रुप ‘ए’ कार्यकारी कैडर अधिकारी, वर्ष 1986 से संगठित ग्रुप ‘ए’ सेवा (ओजीएएस) के सदस्य हैं. इसके बावजूद सरकार ने अभी तक इसके लाभ से कैडर अधिकारियों को नहीं दिए . न्यायालय ने कहा था, सेवा/भर्ती नियमों में सभी परिणामी लाभों सहित छह माह के भीतर आवश्यक संशोधन किए जाएं. छह महीने के भीतर कैडर समीक्षा पूरी हो जाए. दो साल के भीतर महानिरीक्षक (आईजी-एसएजी) स्तर तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति के पदों में चरणबद्ध तरीके से कमी की जाए. सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को 28 अक्तूबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने निरस्त कर दिया.













