प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट की नियुक्ति मामलों की समिति ने गुरुवार को अनुराग कुमार को इंटेलिजेंस ब्यूरो से रिलीव करके उनके पेरेंट कैडर में वापसी को हरी झंडी दे दी थी. अनुराग 1994 बैच के अधिकारी हैं. दिल्ली पुलिस में उनहोंने जिले में डीसीपी के स्तर पर भी पुलिसिंग की लेकिन दो दशक से केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर ख़ुफ़िया एजेंसी में काम कर रहे थे. वहीं रहते हुए प्रोन्नति मिली. कई महत्वपूर्ण असाइनमेंट उनको दिए गए जिनमें अमेरिका में भी पोस्टिग शामिल है. पुलिस मेडल्स से भी सम्मानित हुए लेकिन सामान्य पुलिस के काम से वह लम्बे अरसे से दूर रहे हैं .
शुक्रवार ( 17 जुलाई 2026 ) को दिल्ली के जय सिंह रोड स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पहुंचते ही उनको पुलिस परम्परा के मुताबिक़ गार्ड ऑफ़ ऑनर दिया गया. उन्होंने पुलिस कमिश्नर के ओहदे का चार्ज लेते हुए दस्तखत किए. रुखसत होने से पहले सतीश गोलचा ने उनको दिल्ली पुलिस की बैटन थमाई. फोटो में वे मुस्कराने की नाकाम कोशिश करते हुए दिखाई दिए. यूं दोनों ही अधिकारी सहज नहीं लगे. यह स्वाभाविक भी था . किसी भी बड़े संगठन के प्रमुख की अजीबो गरीब तरीके से फटाफट विदाई का होना ऐसा ही नज़ारा पैदा करता है .

लम्बे अरसे बाद अपने घर ( पेरेंट आर्गेनाईजेशन) लौटे अनुराग कुमार को राजधानी का पुलिस प्रमुख बनाते समय केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने उनसे सीनियर तीन आईपीएस अधिकारियों 1992 बैच के गरिमा भटनागर व राजेश खुराना और 1993 के बैच के रोबिन हिबू ( robin hibu ) की वरिष्ठता को भी एक किनारे किया. तीनों स्पेशल कमिश्नर हैं . खैर यह अब कोई नई बात नहीं रही. इससे पहले भी दिल्ली और कई राज्यों में पुलिस प्रमुखों की तैनाती के वक्त ऐसा किया जाता रहा है . शुरू शुरू में यह कौतूहल का विषय बनता था. इक्का दुक्का मामले ही होते थे . अख़बारों में खबरे छपती थीं. सियासत और अफसरशाही में मुद्दा बनता था. इस बात के लिए आलोचना होती थी सत्ताधारी अपने हितों को साधने के लिए उस अधिकारी को पुलिस की कमान सौंपते हैं जो उनके लिए कठपुतली सा नाचे. जब काबिल अधिकारियों को दरकिनार कर पुलिस प्रमुख बनाए जाने में ज्यादा ही मनमर्जी होने लगी तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया . अदालत ने पारदर्शिता लाने और ऐसे पदों पर मेरिट के आधार पर अफसरों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करवा दी तो सत्ता में विराजमान सियासतदानों ने उसका भी तोड़ निकाल लिया . डीजीपी पहले कार्यकारी प्रमुख बनाए जाते और बाद में पात्रता के लिए आधार मज़बूत होते ही उस अफसर को नियमित कर दिया जाता. उत्तर प्रदेश में हालिया डीजीपी की तैनाती इसकी मिसाल है .
खैर अब तो आईपीएस अफसरों को इसकी भी आदत पड़ गई है . और तो और अब तो दूसरे कैडर से लाकर प्रमुख तैनात करने को भी अफसरों ने कबूल कर लिया है . यही नहीं कानूनी पचड़े से बचने और मंत्रालय के आदेश को चुनौती देने की नौबत आने से बचने के लिए एक ही दिन में आईपीएस का कैडर तक बदल दिया जाता है. गुजरात कैडर के रकेश अस्थाना का दिल्ली पुलिस आयुक्त बनने का केस इसकी एक मिसाल है . इसे अफसरों की रीढ़विहीनता कहा जाए , लचीलापन या किसी तरह का दबाव आईपीएस ऑफिसर्स एसोसिएशन तक खामोशी अख्तियार किए रहती है . हालांकि ऐसी नियुक्तियों को लेकर कभी कभार कोई पीड़ित आईपीएस बड़ी अदालतों में पहुंचते भी देखे गए हैं एकाध केस में उनको राहत भी मिली है .
सतीश गोलचा को हटाने के आदेश पर इतनी रफ्तार से काम हुआ कि उनकी नई तैनाती के लिए ओहदा तक तय नहीं किया गया. कह दिया गया कि वे फिलहाल दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर को रिपोर्ट करें. वहीं अभी यह भी तय नहीं किया गया या घोषित नहीं किया गया कि अनुराग कुमार के पुलिस चीफ बनने के बाद उनसे सीनियर बैच के अधिकारियों को कहां तैनात किया जाएगा. स्वाभाविक है कि वे अनुराग कुमार के मातहत तो काम करेंगे नहीं . न ही अनुराग कुमार बतौर बॉस उनसे काम लेने में सहज होंगे. वैसे जो अफसरशाही का हाल है उसमें ऐसा हो जाना भी कोई अचरज की बात नहीं होगी.










