भारतीय नौसेना के वाइस एडमिरल बिमल वर्मा दूसरी बार ट्रिब्यूनल पहुंचे

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वाइस एडमिरल बिमल वर्मा
वाइस एडमिरल बिमल वर्मा और उनकी वकील बेटी रिआ वर्मा (फाइल फोटो).

भारतीय नौसेना की अंडमान निकोबार कमान के प्रमुख और वाइस एडमिरल बिमल वर्मा ने फिर सशस्त्र बल पंचाट (Armed Forces Tribunal) का दरवाज़ा खटखटाया है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को सम्बोधित अर्ज़ी पर संतोषजनक जवाब न मिलने के 10 दिन बाद उन्होंने ये कदम उठाया. पंचाट में उनकी अर्ज़ी पर बृहस्पतिवार को सुनवाई होने की उम्मीद है. ये दूसरा मौका है जब एडमिरल विमल वर्मा ने, भारतीय नौसेना के प्रमुख के तौर पर अपनी वरिष्ठता को नज़रन्दाज़ किये जाने के मुद्दे पर पंचाट में अर्ज़ी दी है. सरकार ने पिछले महीने ही वाइस एडमिरल करमबीर सिंह को भारतीय नौसेना का प्रमुख बनाने का ऐलान किया था जो वर्तमान इंडियन नेवी चीफ एडमिरल सुनील लान्बा का स्थान लेंगे. एडमिरल सुनील लान्बा 31 मई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं.

भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान के प्रमुख अपने से जूनियर वाइस एडमिरल करमबीर सिंह को भारतीय नौसेना का प्रमुख बनाने का ऐलान करते वक्त अपने नाम पर विचार न किये जाने पर वाइस एडमिरल बिमल वर्मा ने पिछले महीने याचिका डाली थी लेकिन वापस ले ली थी क्यूंकि पंचाट (AFT) का कहना था कि वाइस एडमिरल बिमल वर्मा को ये मसला पहले सम्बन्धित विभाग में ले जाना चाहिए. ये अर्ज़ी वाइस एडमिरल की वकील बेटी रिआ वर्मा की तरफ से दी गई थी.

पंचाट के निर्देश के बाद वाइस एडमिरल बिमल वर्मा ने मामला रक्षा मंत्रालय पहुंचाया और दस दिन में इस पर जवाब की अपेक्षा की थी. इस अरसे के बीतने पर जवाब न मिला तो वाइस एडमिरल बिमल वर्मा ने मंगलवार को पंचाट (AFT) में अर्ज़ी लगाई. वाइस एडमिरल बिमल वर्मा की दलील है कि उन्होंने 1980 में करमबीर सिंह से छह महीने पहले सेना में कमीशन हासिल किया था जबकि सरकार ने उनकी इस वरिष्ठता को नज़रन्दाज़ करते हुए वाइस एडमिरल करमबीर सिंह की नियुक्ति भारतीय नौसेना के प्रमुख के तौर पर की.

कब कब टूटी परम्परा :

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी – BJP) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए – NDA) की वर्तमान सरकार में ये दूसरा मौका है जब भारतीय सेना में अधिकारियों की वरिष्ठता को नज़रन्दाज़ करते हुए उनसे जूनियर अधिकारी को कमान सौंपी गई हो. भारतीय सेना के वर्तमान प्रमुख जनरल बिपिन रावत को दिसंबर 2016 में सेनाध्यक्ष नियुक्त करते वक्त दो वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल (प्रवीन बक्शी और पीएम हारिज़) को नज़रन्दाज़ किया गया था.

इससे पहले केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (UPA) की सरकार में भी सेना के प्रमुखों की नियुक्ति में वरिष्ठता की परम्परा को तोड़ा जा चुका है जब 2014 में एडमिरल डी के जोशी के इस्तीफे के बाद वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा की बजाय रोबिन धोवन को भारतीय वायु सेना का प्रमुख बनाया गया था.

दिलचस्प ये है कि इन नियुक्तियों को लेकर अंगुलियाँ तो उठीं और सैन्य जगत में आलोचनाएँ भी हुईं लेकिन अधिकारियों ने क़ानून का दरवाज़ा नहीं खटखटाया. सेना ही नहीं इससे मिलते जुलते नियुक्ति सम्बन्धी फैसले अर्द्ध सैनिक बलों और पुलिस संगठनों में देखे जाते रहे हैं जो विवाद व सुर्खियाँ बने.

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