दिलचस्प किरदार का मालिक 1971 का युद्धवीर मोहम्मद यूसुफ खान

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मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान

मध्य दिसम्बर में जब दिन में भी मेंडर में जबरदस्त सर्दी होती है तब आधी रात के बाद हाड़ मांस गला देने वाली ठंड के बीच जम्मू कश्मीर मिलीशिया के उन जवानों को हुक्म दिया गया कि पाकिस्तान की सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों की जगह लेनी है क्योंकि उनको वापस बुलाया जाना है. जिसके पास जो रसद पानी हो अपने साथ उठाये और चल दे. इन मिलीशिया जवानों में मोहम्मद यूसुफ खान भी थे जिन्हें भर्ती हुए तीन साल ही हुए थे. ये उनके लिए मोर्चे पर पहला एक्शन होने वाला था.

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान जब सेना में भर्ती हुए थे.

मेंडर से गुलपुर पहुंची लेकिन यहाँ उन्हें आगे मूवमेंट के लिए मना कर दिया गया. 24 दिन यहाँ पर फ़ोर्स ने झाड़ियों में छिप कर काटे. खाने के लिए आसपास के गाँव में रहने वाले लोगों ने इंतजाम किया क्यूंकि पीछे से कोई आने के हालात भी नहीं थे. इसके बाद खुद ही शैल ट्रेंच बनाई. छह जवानों की उनकी पार्टी के पास 2 आरसीएल गन (RCL gun – recoilless) थी. यहाँ दुश्मन की गन पोजीशन ऊंचाई पर थी. पुंछ पहुँचने के लिए कृष्णा घाटी जाना था और नदी पार करनी थी. एक अधिकारी ने दोनों छोर पर रस्सी बंधवाई. इसके बाद जवानों ने कमर में बंधी बेल्ट में रस्सी फंसाई और फिर टाँगे फंसाकर नदी पार की गई.

राइफल मैन मोहम्मद यूसुफ खान को इस एक्शन में शुरू में ज़बरदस्त डर लगा था. वो कहते हैं, ” एयर डिफेन्स हमारा अच्छा था. भारतीय वायुसेना के विमान ऐसे बम बरसा रहे थे जैसे आसमान से बारिश के ओले गिर रहे हों. बम गिरने के बाद कुछ दिखाई नहीं देता था. मेरा तो कलेजा मुंह को आ रहा था. ऐसा पहली बार देखा था लेकिन थोड़ी देर बाद हमें भी इसकी आदत हो गई”. फ़ोर्स यहाँ से आगे जाकर नागी टेकरी चौकी पहुंची लेकिन चौकी खाली थी. वहां कोई बन्दा नहीं था. वहां एक गुरुद्वारा था. सेना की टुकड़ी ने उसी में डेरा डाला. 16 दिसम्बर को सीज़फायर होने के बाद फ़ोर्स को वापस बुला लिया गया. उनकी फ़ोर्स वापस उधमपुर आ गई.

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान

जम्मू कश्मीर के बडगाम के खाग गाँव के निवासी मोहम्मद यूसुफ खान सात भाई बहनों में से एक हैं. वह फौजी बनने वाले अपने खानदान में पहले शख्स थे लेकिन उनकी इस परम्परा को उनके दो बेटों में से एक बेटे मोहम्मद लतीफ़ ने जारी रखा. आठवीं पास लतीफ़ भी फौजी बन गया और उसकी भी रेजिमेंट जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI) थी. 1994 में सेना में भर्ती हुआ लतीफ़ 16 साल सेना की सेवा करके घर लौट आया. लतीफ़ का कहना है कि वो और सेवा करना चाहता था लेकिन चर्मरोग के कारण इतनी परेशानी हुई कि सेना छोड़नी पड़ी. यही नहीं मोहम्मद यूसुफ खान के दोनों दामाद भी सेना की सेवा में हैं.

कश्मीर, कश्मीरियत और भारतीय प्राचीन इतिहास की बातें बेहद दिलचस्पी से बताने वाले मोहम्मद यूसुफ पढ़े लिखे न होने के बावजूद विभिन्न मुद्दों पर इतना ज्ञान रखते हैं और सटीक जानकारी के साथ बताते हैं उन्हें चलता फिरता इनसाइकलोपीडिया भी कहा जा सकता है. मोहम्मद युसूफ बताते हैं कि 1971 में जैक मिलीशिया ने इतना अच्छा काम किया कि इसे नियमित सेना में तब्दील करके जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI ) में शामिल कर दिया गया. 1967 में 20 साल के थे जब मोहम्मद यूसुफ सेना में भर्ती हुए.

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान का बेटा पूर्व फौजी लतीफ खान

सेना में अपने उस कार्यकाल को यूसुफ बहुत याद करते हैं जब उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल के वी कृष्णा राव के साथ काम करने का मौका मिला था. यूसुफ खान कहते हैं कि उन्हें एक व्यक्ति के तौर पर उनसे स्नेह मिलता था और एकाध बार तो अपनी बिसात से बाहर जाकर भी राइफलमैन मोहम्मद यूसुफ ने उनसे कुछ बात कहने की हिमाकत कर डाली थी. तब जनरल राव किसी मसले पर परेशान और तनाव ग्रस्त थे बावजूद इसके उन्होंने इसे मेरी सामान्य प्रतिक्रिया के तौर पर लिया. (जनरल के वी कृष्णा राव इसके बाद सेनाध्यक्ष भी बने थे और दो बार जम्मू कश्मीर के राज्यपाल भी रहे हैं)

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान का बेटा पूर्व फौजी लतीफ खान और उसका परिवार

मोहम्मद यूसुफ खान सिक्किम के भारत में विलय से पूर्व वहां के राजा को हिरासत में लिए जाने के लिए किये सेना के ऑपरेशन का ब्यौरा एक एक घटनाक्रम के साथ बेहद दिलचस्प अंदाज़ में बयान करते हैं.

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