भारतीय सेना ने चीन सीमा के पास नाथुला में हर साल की तरह इस बार भी बाबा हरभजन सिंह का जन्मदिन मनाया जहां उनकी याद में मंदिर बना हुआ है. भारतीय थल सेना में एक सिपाही के तौर पर सेवा करते हुए बरसों पहले मृत्यु को प्राप्त हुए हरभजन सिंह अब नाथुला के संत भी कहे जाते हैं . यह बाबा हरभजन सिंह का 79 जन्मदिन था .
अविभाजित पंजाब में 30 अगस्त 1946 को जन्मे हरभजन सिंह 1966 में भारती थल सेना में सिपाही के तौर पर भर्ती हुए . उनकी तैनाती 23 पंजाब रेजीमेंट में थी .पूर्वी सिक्किम में नाथुला सीमा पर ड्यूटी के वक्त एक दिन (4 अक्तूबर , 1968) सेना के खच्चरों के साथ खतरनाक रास्ते से गुजरते वक्त पांव फिसलने से हरभजन एक ऐसे झरने में जा गिरे जिसका बहाव तेज था. हरभजन सिंह डूब गए लेकिन उनका कुछ आता पता नहीं चला . यह एक हादसा था. लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ उसने इस सिपाही को एक ऐसे संत का दर्जा दिला दिया जिसकी सेना के इतिहास में कहीं भी मिसाल नहीं मिलती .
बाबा हरभजन सिंह की मृत्यु से ही इन कहानियों का जन्म होना शुरू हुआ. कहा जाता है कि हादसे में लापता हो मृत्यु को प्राप्त हुए सैनिक हरभजन ने अपने ही साथी सपने में उस जगह के बारे में बताया जहां उनका शव है. यह बात सच साबित हुई . वहीं से उनका शव मिला .
इसके बाद कुछ सैनिकों ने कहा कि उनको सिपाही हरभजन सिंह की मौजूदगी का आभास होता है. रात को बंद कमरे में करीने से लगा बिस्तर सुबह ऐसा लगता है मानों कोई रात सो कर उठा हो . वहां हरभजन के पालिश किए रखे जूतों पर धूल या कीचड़ ऐसा मिला मानों इनको पहनकर बाहर गया सैनिक गश्त करके लौटा हो .
सेना ने बाबा हरभजन को वैसा ही रहने को स्थान दे रखा जैसे किसी सैनिक को दिया जाता है . तरक्की के साथ साथ उनकी वर्दी पर फीत व सितारे वैसे ही बदले गए जैसे सेवारत सैनिक के होते हैं . उनको रैंक के मुताबिक़ पहले वेतन और फिर पेंशन भी दी जाती है .
बाबा हरभजन सिंह से जुड़ी हुई अनगिनत कहानिया हैं जिस पर सेना भी यकीं करती है. इनके मुताबिक़ बाबा हरभजन सिंह की आत्मा सीमा पर पहरा देती है और आने वाले खतरों के प्रति साथी सैनिकों को आगाह करती है . ऐसा माना जाता है कि हरभजन सिंह एक फौजी के नाते अभी भी सेवा कर रहे हैं . और तो और चीन की सेना तक बाबा हरभजन सिंह का सम्मान करती है . इतना कि जब सीमा पर अधिकारियों की फ्लैग मीटिंग होती है तो एक कुर्सी बाबा हरभजन सिंह के लिए भी लगाई जाती है.
बाबा हरभजन सिंह को वैसे ही सालाना छुट्टी दी जाती है जैसे सैनिकों को मिलती है. 11 सितम्बर को उनकी यह छुट्टी शुरू होते ही उनका सामान उनके घर भेज दिया जाता है. उनके घर जाने के लिए न्यू जलपाईगुड़ी से ट्रेन में एक बर्थ आरक्षित की जाती है जो पूरी यात्रा के दौरान खाली रखी जाती है . घर तक पहुंचाने के लिए साथ में सैनिक तैनात किए जाते हैं . यह सामान पंजाब स्थित उनके गांव कूका में लाया जाता है जोकि कपूरथला जिले में है .