…और इस तरह हमेशा के लिए सो गया ‘लदाख का शेर’ कर्नल सोनम वांगचुक

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हमेशा के लिए सो गया 'लदाख का शेर' कर्नल सोनम वांगचुक
हमेशा के लिए सो गया 'लदाख का शेर' कर्नल सोनम वांगचुक

यह खबर स्तब्ध कर देने वाली है .. उन सब के लिए जो ‘ लदाख के शेर  (lion of ladakh ) के तौर पर लोकप्रिय सेवानिवृत्त कर्नल सोनम वांगचुक के जानने वाले हैं . उम्र भले ही 61 थी लेकिन हाल फिलहाल तक एकदम तंदरुस्त थे . गुरूवार की रात लेह ( लदाख)  में  घर में ऐसा सोए कि सोते ही रह गए.  करगिल युद्ध के दौरान अपनी असाधारण बहादुरी के लिए जाने जाने वाले एक सम्मानित युद्ध नायक थे,  वे अपने पीछे साहस और राष्ट्र सेवा की एक महान विरासत छोड़ गए हैं.

प्रतिष्ठित ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित सोनम वांगचुक करगिल युद्ध के समय मेजर के पद पर थे. 30 मई, 1999 को बिना किसी तोपखाने (आर्टिलरी) के सहयोग के, ‘चोरबत ला’ ( chorbat la) की दुर्गम और बर्फ़ीली ऊँचाइयों पर ‘लद्दाख स्काउट्स’ के सैनिकों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने जो ऑपरेशन  किया था वह दुश्मन पाकिस्तानी सेना पर  भारतीय सेना की शुरुआती जीतों में से एक था. इस जीत ने  बाद के सैन्य अभियानों के लिए एक मज़बूत आधार तैयार किया.

कर्नल सोनम वांगचुक  के बहनोई डॉ. सोनम आंगचुक ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि पिछले कुछ दिनों से कर्नल सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत कर रहे थे.  उनके पिता का इसी साल जनवरी में निधन हो गया था.  इसलिए, वे यहाँ [लेह, लदाख ) में  पिता की आत्मा की शांति के लिए होने वाली प्रार्थनाओं और अन्य रस्मों में शामिल होने पहुंचे थे . डॉ सोनम ने का मानना  है कि चूंकि कई रिश्तेदार और दोस्त उनसे मिलकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे थे, इसलिए शायद वे मानसिक तनाव में रहे होंगे.

उन्होंने आगे बताया, “पिछले कुछ दिनों से वे सीने में दर्द की शिकायत कर रहे थे. कल, दोपहर तकरीबन  2:30 बजे, मैं उन्हें सेना के अस्पताल ले गया जहां  उनका ईसीजी , अल्ट्रासाउंड और कुछ  ज़रूरी टेस्ट किए गए.  सभी जांच के नतीजे सामान्य आए.  वे खुद को ठीक महसूस कर रहे थे.  हम घर वापस आ गए और आज उनका ‘इकोकार्डियोग्राम’ (हृदय की जांच) होना था. कल शाम, मैंने उन्हें मांसपेशियों को आराम देने वाली कुछ दवाएं (muscle relaxants) दीं और फिर हम सो गए. आज सुबह तड़के, जो व्यक्ति उन्हें सुबह गर्म पानी या चाय देने उनके कमरे में गया, उसने पाया कि कर्नल किसी बात का जवाब  नहीं दे रहे थे. उसने तुरंत सबको सचेत किया. हम सभी भागकर सोनम के कमरे में पहुँचे और पाया कि अब वे इस दुनिया में नहीं रहे.”

डॉ. आंगचुक ने बताया कि वांगचुक की पत्नी, पद्मा आंगमो, केंद्र शासित प्रदेश (union territory ) कैडर की एक सिविल  अधिकारी हैं और वर्तमान में दिल्ली में तैनात हैं.  इस दंपति का बेटा  , रिग्याल ओत्वुम, आई आई एम (iim ) से स्नातक हैं और बेंगलुरु में काम करता है . वांगचुक की माँ लेह में रहती हैं.

अंतिम संस्कार के बारे में बात करते हुए, डॉ. अंगचुक ने बताया कि बौद्ध धर्म में, रीति-रिवाज पूरे करने के लिए भिक्षु आते हैं. उसके बाद ही अंतिम संस्कार की तारीख तय की जाती है.

क्या है सोनम 1 और सोनम 2:
जनवरी, 1964 को सोनम वांग्याल के घर जन्मे वांगचुक ने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली के लोकप्रिय मॉडर्न स्कूल से पूरी की. शुरू से ही खेलों के प्रति काफी उत्साही रहे वांगचुक ने सेना में करियर बनाने का फैसला करने से पहले क्रॉस-कंट्री मैराथन में हिस्सा लिया था.  सेना में शामिल होने के लिए उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और 4 सितंबर, 1987 को असम रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त किया.  बाद में उनको  स्काउट्स ( ladakh scouts) में तैनात किया गया, जिन्हें ‘स्नो वॉरियर्स’ (बर्फ के योद्धा) के नाम से जाना जाता है.

लदाख  स्काउट्स ने करगिल युद्ध ( kargil war) में अहम भूमिका निभाई थी और अपने शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें तत्कालीन सेना प्रमुख वी.पी. मलिक ने  ‘यूनिट साइटेशन’ से सम्मानित किया गया था.

करगिल युद्ध 1999 में  दरअसल लाहौर घोषणा के बाद शुरू हुआ, जब पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा (line of control) के पास सामरिक  रूप से महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया. 3 मई को घुसपैठ का पता चलने के बाद तनाव बढ़ गया, जिसके फलस्वरूप  भारत की तरफ से समन्वित सैन्य कार्रवाई की गई. इसमें भारतीय वायु सेना द्वारा हवाई हमले और भारतीय सेना द्वारा ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत शामिल थी. भीषण लड़ाई के बाद, यह संघर्ष 26 जुलाई, 1999 को समाप्त हुआ.

युद्ध के दौरान सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बटालिक उप-क्षेत्र में स्थित ‘चोरबत ला’ था, जो 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है. यह क्षेत्र राष्ट्रीय राजमार्ग 1 ए  के करीब होने और ऐतिहासिक रूप से घुसपैठ के रास्ते के तौर पर इस्तेमाल होने के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था.

वांगचुक को बेहद खराब मौसम की परिस्थितियों के बीच चोरबत ला को सुरक्षित करने और वहाँ एक निगरानी चौकी (ऑब्ज़र्वेशन पोस्ट) स्थापित करने का काम सौंपा गया था. असाधारण नेतृत्व का प्रदर्शन करते हुए, उन्होंने बर्फ से ढके गहरे रास्तों और दुर्गम इलाकों से होते हुए एक छोटी सी टीम का नेतृत्व किया. 30 मई, 1999 को, दुश्मन सैनिकों से उनका आमना-सामना हुआ, जिसमें उन्होंने दो सैनिकों को मार गिराया और बाकी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.
बाद में, भारी तोपखाने की गोलीबारी और आसन्न हमले के खतरे के बावजूद, उन्होंने एक अन्य निगरानी चौकी को मज़बूत किया. कई घंटों की भीषण लड़ाई के बाद, वांगचुक ने दुश्मन के कब्जे वाली एक चौकी पर हमला किया, उसे सफलतापूर्वक अपने कब्ज़े में ले लिया और दुश्मन के छह सैनिकों को मार गिराया. उनकी बहादुरी को सम्मान देते हुए, इस सेक्टर में दो चौकियों—’सोनम 1′ और ‘सोनम 2’—का नाम उनके नाम पर रखा गया. संघर्ष के दौरान उनके कार्यों के लिए उन्हें ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया, जो भारत का युद्ध काल का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है.

कर्नल वांगचुक (सेवानिवृत्त) को दृढ़ता और वीरता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है. विपरीत परिस्थितियों का सामना करने में उनकी हिम्मत आज भी सैनिकों और नागरिकों—दोनों की पीढ़ियों को प्रेरित करती है.