कश्मीर में हारी पर्बत किले पर 15 अगस्त को फहरेगा दस मंजिला इमारत से भी ऊँचा तिरंगा

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हारी पर्बत
तिरंगे का पोल ले जाते लोग.

भारत की आजादी की इस बार की सालगिरह पर होने वाली एक घटना कश्मीर के बाशिंदों और कश्मीर के बारे में बनी सोच में बदलाव लाने में छोटा ही सही लेकिन अहम पड़ाव साबित हो सकती है. जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के लाल चौक पर जहां भारत का राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराने की कोशिश करना भी बड़ी बात समझी जाती रही उसी शहर में अब ऐसा विशाल आकार का तिरंगा फहराया जाएगा जिसकी छवि मीलों दूर से दिखाई देगी. अभी तक के तय कार्यक्रम के मुताबिक़ 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर ये तिरंगा जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा फहराएंगे.

भारतीय सेना की पहल पर शुरू हुई तिरंगा क्रांति का अहम पड़ाव

श्रीनगर में गुपकार रोड पर 26 जनवरी 2021 यानि बीते गणतंत्र दिवस पर भारतीय सेना के एक अधिकारी की पहल और उसके बाद सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराने के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश के बाद यहां दिखाई दे रही तिरंगा क्रान्ति के लिए तो ये घटना सबसे अहम मानी जायेगी. ये तिरंगा ऐतिहासिक और धार्मिक पहलू से महत्वपूर्ण हारी पर्बत स्थित किले के शिखर पर फहराया जाएगा जिसके पोल की ऊँचाई 100 फुट होगी. वहीं ध्वज के कपड़े की ऊँचाई 24 फुट और चौड़ाई 36 फुट होगी. मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि ये तिरंगा दस मंजिला इमारत से भी ऊँचे पोल पर फहरता दिखाई पड़ेगा. आज़ाद भारत के इतिहास में ये संभवत: पहला ऐसा मौका है जब राष्ट्र ध्वज को कश्मीर में ऐसी भव्यता के साथ सम्मान मिलेगा.

हारी पर्बत
हारी पर्बत किला जहाँ तिरंगा फहराया जाएगा

लाखों रुपये की लागत से यहाँ तिरंगा लगाये जाने की योजना 30 जून 2021 को कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर के साथ विभिन्न विभागों के अधिकारियों की बैठक में बनी थी. इसकी लागत पर आने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा फ्लैग फाउंडेशन आफ इंडिया नाम की वही संस्था उठा रही है जिसके कर्ताधर्ता देश के जाने माने उद्योगपति और कुरुक्षेत्र से पूर्व सांसद नवीन जिंदल हैं. ये संस्था देश में 80 से ज़्यादा स्थानों पर ऊँचे पोल पर बड़े आकार वाले राष्ट्र ध्वज स्थापित करके फहरा चुकी है. वैसे हारी पर्बत पर तिरंगे को पुराना होने या किसी तरह की क्षति होने पर सम्मान से बदलने और यहाँ राष्ट्र ध्वज फहराने से सम्बन्धित नियमों का पालन कराने की ज़िम्मेदारी सेना ने ली है. यहाँ 15 अगस्त को राष्ट्र ध्वज फहराने से कुछ दिन पहले सादा कपड़े का झंडा फहराकर ‘मॉक ड्रिल’ भी की जायेगी.

हारी पर्बत
तिरंगे का पोल लगाने के लिए तैयार किया जा रहा बेस.

हारी पर्बत की अहमियत :

श्रीनगर की खूबसूरती में चार चाँद लगाने वाले हारी पर्बत की महत्ता पर्यावरण, पुरातत्व और पर्यटन के कारण तो है ही इससे कश्मीरी मूल के लोगों की धार्मिक भावनाएं भी जुडी हुई हैं, खासतौर से यहाँ स्थित प्राचीनतम शारिका देवी मन्दिर के कारण. हारी पर्बत की उत्पति और इसके नाम से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं. यहाँ दरअसल जगदम्बा शारिका भगवती का मन्दिर है जिसे कश्मीरी पंडित प्रद्युमन पीठ भी कहते हैं. आमतौर पर लोग यहाँ देवी को मां शारिका भी कहते हैं जो 18 भुजा वाली है और श्री चक्र पर आसीन है.

शारिका मन्दिर :

शारिका माता मन्दिर और हारी पर्बत की उत्पत्ति के पीछे कई तरह के धार्मिक विश्वास और कथाएं प्रचलित हैं. ऐसी ही एक लोकप्रिय कथा के मुताबिक़ जिस जगह अभी हारी पर्बत विद्यमान है वहां कभी विशाल झील हुआ करती थी जिस पर जलोभवा नाम के दानव ने कब्ज़ा किया हुआ था. उससे वहां रहने वाले जीव बेहद परेशान थे और तब उन्होंने भगवान शिव की पत्नी पार्वती देवी से मदद के लिए प्रार्थना की जो कश्मीर की अधिष्ठात्री देवी हैं. कहते हैं कि तब देवी ने मैना (हारी) का रूप धारण किया और उड़ान भरते हुए वो कंकड़ दानव के सिर पर गिरा दिया जो चोंच में था. ये पत्थर दानव के सिर पर गिरने के बाद लगातार बढ़ा होता गया. कंकड़ से बना पत्थर इतना विशाल हो गया कि उसने पर्बत का रूप ले लिया जिसके नीचे दानव जलोभव दब गया. कहा जाता था कि कंकड़ से पर्बत बने हारी पर्बत पर कई हिन्दू देवताओं का वास है.

हारी पर्बत
शारिका देवी का मंदिर

ऐसी ही एक प्रचलित कथा में कहा बताया गया है कि त्संद और मोंद नाम के दो दानवों ने कश्मीर घाटी पर अपना नियंत्रण कर लिया था, इनमें से एक दानव उस जगह पर पानी में छिपा होता था जहां पर अभी हारी पर्बत है और दूसरा दानव उस स्थान पर रहता था जो अभी डल गेट से थोड़ा ऊपर है. ये दानव घाटी के लोगों को आतंकित करते रहते थे. ऐसे में देवताओं ने शक्ति की उपासना की जो हारी यानि मैना बनकर सुमेर के लिए उड़ीं और अपनी चोंच में कंकड़ लेकर आई जिसे त्संद के सिर पर गिराया. ये कंकड़ पर्बत बन गया और दानव इसके नीचे दब गया. इसलिए यहाँ का नाम हारी पर्बत पड़ गया. यहाँ पार्वती देवी को शारिका के रूप में पूजा जाता है. पर्बत की पश्चिमी ढलान पर शारिका भगवती का मन्दिर है. कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए ये स्थान विशेष श्रद्धा का केंद्र है. देवी के जन्म दिवस पर समारोह के आयोजन के दौरान ‘तेहर चरवान’ का प्रसाद बांटा जाता है जो चावल, हल्दी, तेल और नमक के साथ बकरे के गोश्त से बनाने की परम्परा है. इसे ‘हर नवमी’ भी कहा जाता है.

धार्मिक सौहार्द और कश्मीरियत का प्रतीक :

हारी पर्बत, विभिन्न पूजा पद्धतियों और धार्मिक विश्वासों को कबूल और अपने में समाहित करने वाली, कश्मीरियत के प्रतीकों में से भी कहा जा सकता है. सूफियों की धरती कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के हारी पर्बत के दक्षिण छोर पर दिखाई देने वाली मकदूम साहिब दरगाह है जो 16 वीं सदी के स्थानीय सूफी संत हज़रत सुलतान की याद में बनाई गई उनको सुल्तान उल आरफीन भी कहा जाता है. 17 वीं शताब्दी में कादरी सूफी संत की याद में मुग़ल राजकुमारी जहांनारा बेगम की बनवाई शाह बदक्शी को समर्पित मस्जिद भी हारी पर्बत किले के नीचे है.

हारी पर्बत
मकदूम साहिब दरगाह

यहीं पर रैनावाड़ी में काठी दरवाज़ा के पास छठी पातशाही गुरुद्वारा भी है. कश्मीर में अपने प्रवास के दौरान सिखों के छठे गुरु हर गोबिंद यहाँ कुछ दिन के लिए ठहरे थे. यहीं पर गुरुद्वारा गुरु नानक भी है जो सिख पंथ से संस्थापक और सिखों के प्रथम गुरु नानक देव की याद में बनाया गया है. कहा जाता है कि गुरु नानक देव लेह से लौटते वक्त यहाँ पर श्रद्धालुओं से बातचीत करते और प्रवचन देते थे. वह तीन बार हारी पर्बत आये थे. उस वक्त यहाँ किला नहीं था. तब इस जगह पर अकबर के एक जनरल मोहम्मद अता खान ने उस जगह पर एक थड़ा (बैठने की जगह) बनवाया था जहां गुरु नानक देव बैठा करते थे. सिख इतिहासकार इसे 1517 की घटना बताते हैं. उन दिनों में हारी पर्बत के आसपास जो आबादी थी उसमें काफी मन्दिर थे जो क्षतिग्रस्त किये गये थे लेकिन बाद में महाराजा रणजीत सिंह के खालसा राज में उन मन्दिरों को फिर से बनाया गया था.

हारी पर्बत
छठी पातशाही गुरुद्वारा

किले का इतिहास :

हारी पर्बत
हारी पर्बत किला

हारी पर्बत किले की बनावट ये बताने के लिए काफी है कि उस समय के शासन में इसे सुरक्षा और सामरिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना गया था. इसकी महज़ दीवार बनाकर घेराबंदी की थी और ये अकबर के राज में 1590 में हुआ. इस घेराबंदी के बाद इस स्थान को राजधानी बनाने की योजना थी जो पूरी न हो सकी .लेकिन वर्तमान किला अफगानी अहमद शाह के दुर्रानी वंश के शासन के दौरान 1808 में बनाया गया था. अहमद शाह अब्दाली ने ही अपने कबीले का नाम परिवर्तित करके इसे अब्दाली की जगह दुर्रानी किया था. तब अत्ता मोहम्मद खान यहाँ का शासक (गवर्नर) था. हारी पर्बत किले को इसलिए दुर्रानी किला भी कहा जाता था.