फिरोजपुर के हुसैनीवाला में लाइट एंड साउंड शो की तैयारी

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हुसैनीवाला बॉर्डर
केसर - ए - हिन्द टावर पर लाइट एंड साउंड शो की तैयारी.

भारत और पाकिस्तान के बीच 3323 किलोमीटर लम्बे बॉर्डर में सबसे लोकप्रिय बेशक पंजाब के अमृतसर का अटारी-वाघा बॉर्डर हो लेकिन इतिहास , देशभक्ति की पवित्र भावना और शूरवीरता की कहानियां समेटे फिरोज़पुर का हुसैनीवाला बॉर्डर और उसके आसपास के स्थान कई मामलों में उससे काफी दिलचस्प हैं. इसकी एक वजह है यहां भारत के राष्ट्रीय शहीद स्मारक और केसर-ए-हिन्द टावर का होना जिनकी देखरेख में भारतीय सेना का अहम रोल है. उम्मीद की जा रही है कि यहां पर लाइट एंड साउंड शो के शुरू से इसकी लोकप्रियता में भी इज़ाफा होगा.

हुसैनीवाला बॉर्डर
हुसैनीवाला युद्ध का स्मारक

फिरोजपुर से तकरीबन 10 किलोमीटर के फासले पर इस केसर-ए-हिन्द टावर पर लाइट एंड साउंड शो की तैयारियां हो रही हैं. यहां के इतिहास को असरदार तरीके से बताने के लिए उस ज़माने जैसी ट्रेन का एक हिस्सा भी तैयार किया जा रहा जो भारत के बंटवारे से पहले चला करती थी. ये भी एक दिलचस्प सच्चाई है कि समाधिस्थल का ये इलाका पहले पाकिस्तान के पास था.

हुसैनीवाला बॉर्डर
क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह और उनके साथियों की ये अर्द्ध प्रतिमाएं पहले सोने की थीं जो ब्रिटिश शासक जाते जाते उतार ले गए थे. उनकी जगह ये ब्रास की लगाई गई हैं.

पाकिस्तान से सटे फिरोजपुर के बार्डर वाले इलाके में राष्ट्रीय शहीद स्मारक पर महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का समाधिस्थल तो है ही यहां उन महान क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त की भी समाधि है जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत और भारत की आज़ादी के लिए आंदोलन में अहम रोल अदा किया था. दिल्ली में 8 अप्रैल 1929 को सेन्ट्रल असेम्बली हाल में क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था. इस जुर्म में बटुकेश्वर दत्त को उम्र कैद की सज़ा हुई थी. जेल से छूटने के बाद बटुकेश्वर दत्त को टीबी रोग ने अपनी चपेट में ले लिया. दिल्ली में इलाज के लिए एम्स में भर्ती बटुकेश्वर दत्त का 19 जुलाई 1965 को निधन हो गया था. क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त की इच्छा थी कि उन्हें उसी स्थान पर पंचतत्व में विलीन किया जाये जहां तीनों क्रांतिकारी साथियों भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव की समाधि है. लिहाज़ा बटुकेश्वर दत्त का पार्थिव शरीर दिल्ली से यहां हुसैनीवाला में लाकर अंतिम संस्कार किया गया. यहीं उनकी समाधि भी बनाई गई.

हुसैनीवाला बॉर्डर
शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का समाधि पर प्रज्ज्वलित इंकलाब ज्योति.

इसी स्थान पर क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह की मां विद्यावती की भी समाधि है जिनको पंजाब माता का दर्जा दिया गया है. हंसते हंसते शहादत का जाम पीने वाले भारत के क्रांतिकारियों शहीद भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव की समाधिस्थल के साथ ही ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की ज्योति भी है जो सुबह से शाम तक प्रज्ज्वलित रहती है.

केसर – ए – हिन्द टावर :

हुसैनीवाला बॉर्डर
केसर – ए – हिन्द टावर के ऊपरी हिस्से में पाकिस्तान की तरफ से दागे गए गोलों के निशान

किलेनुमा दिखाई देने वाला ढांचा केसर – ए – हिन्द टावर और उस पर दुश्मन की गोलियां और गोलों की मार के निशाँ हुसैनीवाला के उस युद्ध की जीती जागती मिसाल हैं जो दिसंबर 1971 में लड़ा गया. एक ज़माने में रेलवे पुल के एक हिस्से के तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले इसी टावर पर भारतीय सेना की 15 पंजाब की ‘सी’ कंपनी के जवानों ने पाकिस्तानी सेना (41 बलूच रेजीमेंट) के सैनिकों से मुकाबला करते हुए करारा जवाब दिया था. इस जंग में अकेले बचे नायक सुरजीत सिंह और उनकी टुकड़ी ने हिम्मत नहीं हारी और न ही अपनी जगह छोड़ी. नायक सुरजीत सिंह टावर के ऊपरी हिस्से से अपनी एमएमजी (मशीनगन) की पोजीशन बदल बदल कर दुश्मन पर हमला करते रहे. आमने सामने की लड़ाई में जबरदस्त शूरवीरता का परिचय देने के लिए 15 पंजाब बटालियन को थियेटर आनर – पंजाब 1971 से सम्मानित किया गया था.

हुसैनीवाला बॉर्डर
पंजाब माता की समाधि पर लगा शिलालेख जिसमें भगत सिंह के परिवार के सदस्यों का वर्णन है.

पाकिस्तान रेंजर और बीएसएफ की परेड :

हुसैनीवाला बॉर्डर
हुसैनीवाला बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट

भारत – पाकिस्तान के बीच अटारी – वाघा बॉर्डर पर सैन्य रीति रिवाज़ के अनुरूप रोज़ाना शाम को अपना अपना राष्ट्रीय ध्वज साथ साथ झुकाने के लिए होने वाली बीटिंग रिट्रीट परेड जैसी परेड फिरोजपुर के हुसैनी वाला बॉर्डर पर भी होती है. लेकिन यहां होने वाली अटारी बॉर्डर वाली परेड से ज्यादा प्रभावशाली इसलिए लगती है कि यहां दोनों तरफ के सुरक्षाकर्मी ही नहीं दोनों तरफ के दर्शक भी आमने सामने होते हैं, करीब भी होते हैं. 1959 से शुरू हुई साथ साथ होने वाली ऐसी परेड दो देशों के बीच जहां प्रतिद्वंद्विता के अलावा भाई चारा और सहयोग का भी प्रतीक होती है. इस परेड के दौरान दोनों तरफ के सुरक्षाकर्मी अपने पैर ज्यादा से ज्यादा ऊंचाई तक ले जाते हैं और नाटकीय तरीके से गुस्सा भी ज़ाहिर करते हैं. कोविड -19 संक्रमण के मद्देनज़र प्रोटोकॉल के तहत भीड़ भाड़ रोकने के मकसद से यहां भारत की तरफ से वैसी एक दूसरे से मुकाबले वाली परेड बंद की गई है.

हुसैनीवाला बॉर्डर
हुसैनीवाला बॉर्डर

बीएसएफ म्यूज़ियम :

इसके अलावा इस बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का संग्रहालय भी है जिसमें क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह की ऐतिहासिक पिस्तौल भी लाकर रखी गई है. ये यहां आकर्षण का एक और केंद्र है. यहां बीएसएफ के जवानों के अलग अलग किस्म के हथियार भी प्रदर्शित किये गये हैं जो अलग अलग कालखंडों में इस्तेमाल किये जाते रहे हैं.