सीएपीएफ में आईपीएस की तैनाती का मामला : सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के जवाब में बिल लाएगी

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प्रतिनिधित्व के लिए तस्वीर ( फाइल फोटो )
प्रतिनिधित्व के लिए तस्वीर ( फाइल फोटो )

एक तरफ भारत सरकार  केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (central armed police forces) में  उच्च पदों  पर भारतीय पुलिस सेवा ( indian police service) के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति पर तैनाती कम करने से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश का  पालन करने की प्रक्रिया ज़ाहिर कर रही है वहीं दूसरी तरफ इस आदेश के जवाब में  एक विधेयक लाने की तैयारी में है. कैबिनेट कमेटी ने केन्द्रीय सशस्त्र बल ( सामान्य प्रशासन ) विधेयक मसौदे को मंजूरी दे दी है . उम्मीद है कि इसे संसद के वर्तमान चालू बजट सत्र में ही पेश किया जाएगा.

इस बिल का मकसद  केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के कामकाज को कोडिफाई करना है और यह मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के जवाब में है जिसमें  केंद्रीय गृह मंत्रालय  से कहा गया था इन बलों में  महानिरीक्षक  के रैंक तक आईपीएस अधिकारियों  की प्रतिनियुक्ति पर तैनाती कम की जाए . सर्वोच्च न्यायालय ने इसके लिए दो साल का वक्त दिया था . इस बिल को 10 मार्च को केंद्रीय  कैबिनेट से मंज़ूरी मिली थी.

सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश के साथं   केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के  अधिकारियों को ऑर्गनाइज़्ड ग्रुप  ‘ए ‘  सर्विसेज़ (OGAS) का दर्जा देने का भी फैसला सुनाया गया था. कोर्ट ने छह महीने में कैडर की समयबद्ध समीक्षा करने और सेवा नियम  बनाने के लिए भी कहा था. केन्द्रीय गृह मंत्रालय   ने फैसले को चुनौती देते हुए एक समीक्षा याचिका ( review petition) दायर की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर, 2025 को इसे खारिज कर दिया. लिहाज़ा  इससे फैसला फाइनल हो गया.

गृह मंत्रालय ने  9 मार्च को सुप्रीम कोर्ट  में एक याचिका पेश की  जिसमें टाइमलाइन में एक और साल के लिए बदलाव या बढ़ाने  की मांग की गई ताकि “ज़रूरी पप्रक्रिया  और कानूनी औपचारिकताओं को सही से  पूरा किया जा सके”.जबकि इससे अगले ही दिन  बिल का मसौदा भी  कैबिनेट के सामने पेश किया गया.

गृह मंत्रालय  ने कहा कि “कैडर की समीक्षा ,एक पूर्ण  और कई स्तर वाली प्रक्रिया है . इसके लिए सरकार के अलग-अलग स्तर  पर जांच…और कैबिनेट की मंज़ूरी की ज़रूरत होती है”. इसमें यह भी कहा गया कि कैडर स्ट्रेंथ की समीक्षा के बाद ही सेवा नियमों में परिवर्तन किया जा सकता है . इसके  26 दिसंबर, 2025 से प्रक्रिया शुरू हुई . मंत्रालय ने आगे कहा कि वह “मामले की सक्रिय  रूप से जांच कर रहा है और कानून के अनुसार, जहाँ भी ज़रूरी हो, सही कानूनी और रेगुलेटरी दखल की ज़रूरत पर भी विचार कर रहा है”. याचिका  में कहा गया कि इस मामले में नीतिगत , आर्थिक और ढांचागत प्रभाव  पॉलिसी, फाइनेंशियल और ढांचागत प्रभाव  शामिल हैं जिनके लंबे समय तक प्रशासनिक नतीजे हो सकते हैं, और इसलिए हर स्टेज पर सावधानी और सही तरीके से विचार करने की ज़रूरत है. ”

केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के कई रिटायर्ड अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में , केन्द्रीय गृह सचिव  गोविंद मोहन के खिलाफ उसके आदेश का पालन न करने के लिए अवमानना याचिका दायर की थी .

अभी एक शासकीय आदेश पर  केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में उप महानिरीक्षक ( डीआईजी )  रैंक के 20% पद और महानिरीक्षक ( inspector general ) यानि आईजी  रैंक के 50% पद आरक्षित रखे गए हैं . ,

उधर अलायंस ऑफ ऑल एक्स-पैरामिलिट्री फ़ोर्सेज़ वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष  एच.आर. सिंह ने कहा कि बिल सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने के लिए तैयार किया गया है. श्री सिंह ने कहा, “हम सरकार के इस एकतरफ़ा कदम की कड़ी निंदा करते हैं और प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सभी हितधारकों से  साथ बातचीत करने का अनुरोध करते हैं. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, ऐसा बिल बहुत मनोबल गिराने वाला और बेइज्जत करने वाला होगा.

उन्होंने कहा कि केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल   कैडर के अधिकारी अपने मुश्किल करियर में आतंकवाद, बगावत और नक्सल हिंसा से लड़ने के बाद निश्चित रूप से सरकार से सही बर्ताव  के हकदार हैं.