करगिल : क्यों नहीं इस हीरो का काम नागरिक सम्मान के लायक समझा गया?

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ताशी नामग्याल
लदाख के घरकोन गांव का ताशी नामग्याल अपना सर्टिफिकेट दिखाते हुए. फोटो क्रेडिट : संजय वोहरा

पाकिस्तान और चीन की सीमा से सटा भारत का सबसे दुर्गम पहाड़ी इलाका लदाख. यहां दो खूबसूरत पहाड़ों के बीच कुलांचे भरकर शोर मचाकर तेज रफ्तारी से बहती सिंधु नदी के किनारे बसे छोटे से गांव घरकोन में रहने वाले ताशी नामग्याल से मिलना एक शानदार अनुभव रहा. 58 बरस का ताशी नामग्याल भले ही एक साधारण से अनपढ़ लदाखी गांव वाला है लेकिन उसने जो कुछ किया उसका अहसान भारत और खासतौर से भारतीय सेना तो कभी नहीं उतार सकती. आज से 23 साल पहले अगर ताशी नामग्याल ने सूझबूझ और हिम्मत न दिखाई होती तो कम से कम लदाख में तो पाकिस्तान ने काफी नुकसान कर दिया होता. ताशी ही वो शख्स है जिसने मई 1999 में एलओसी पार करके भारत में घुसते पाकिस्तानी घुसपैठियों की खबर सबसे पहले दी थी.

ताशी नामग्याल
लदाख के बटालिक सेक्टर का इलाका जहां से सिंधु नदी के किनारे घरकोन गांव है. फोटो क्रेडिट : संजय वोहरा

करगिल (kargil) ज़िले के बटालिक सेक्टर (batalik sector) के घरकोन गांव में जब ताशी से मुलाक़ात उसी के उस घर में हुई जो परम्परागत लदाखी तरीके से बना है. ताशी का ये पुराना घर है जिसमें सबसे बड़ा एक ऐसा कमरा है जो रसोई भी है, डाइनिंग रूम भी और लिविंग रूम भी. बर्तन से लेकर फोटो यहां सजे हुए हैं. उस रोज़ क्या हुआ था? हमारा ये सवाल करगिल युद्ध से पहले वाली उस घटना से सम्बन्धित था जब पहाड़ी पर ताशी ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा था. सवाल सुनते ही ताशी झट से उठा (अब भारी हो गए वजन से उसे तकलीफ भी हुई) और इसी कमरे की एक अलमारी से एक फोल्डर फाइल निकाल लाया और साथ ही आवाज़ दी अपने बड़े बेटे को जो घर में किसी कोने में रखी दूरबीन ले आया.

तकरीबन 23 बरस पहले के उस दिन की छोटी – छोटी बात भी ताशी को याद हैं. अगर कुछ थोडा बहुत भूलता भी है तो उस फाइल में रखे कागज़ात याद दिलाने के लिए काफी है. इसमें सेना की तरफ से मिले खूब सारे सर्टिफिकेट, फौजी अफसरों की तरफ से उसकी प्रशंसा में लिखे पत्र, अखबारों में छपी खबरों की कतरने जिनमें ताशी का कमाल और फोटो छपे हैं – ये सब फाइल में करीने से लगे थे. ताशी हालांकि अब भी खेत में काम करने से लेकर काफी कुछ करता है लेकिन खुद को जीवन की दुश्वारियों, तनाव से घिरा पाता है. इन हालात ने शारीरिक शक्ति भी कम कर दी है, वजन थोडा बढ़ने के कारण थोड़ी से भी मेहनत करने पर उखड़ने लगती है. बावजूद इसके उस दिन का ज़िक्र आते ही ताशी नामग्याल की आंखों में चमक आ जाती है, जिस्म जोश से भर जाता है. वो 2 मई 1999 था और ताशी की उम्र थी 35 बरस. किसी तरह का खलल न हो , अपने मोबाइल फोन को किनारे रख के बेटे को कमरे से बाहर भेज , एक तरह से रोमांच में भरा ताशी बताना शुरू करता है – साहब , मैं कुछ ही दिन पहले दस हज़ार रूपये का याक खरीदकर लाया था. उस दिन याक को चरने के लिए बाहर छोड़ा था और चरते चरते वो पता नहीं कहाँ निकला गया. आसपास नहीं दिखा . शायद वो रास्ता भटक गया था .अवाज़ भी लगाई लेकिन वो नहीं आया . इसके बाद मैं दूरबीन लेकर उसे ढूंढ़ने ऊपर पहाड़ की तरफ निकल गया. काफी ऊपर जाकर जब मैं याक को हर तरफ देखने की कोशिश कर रहा था तभी मेरी नजर कुछ लोगों पर पड़ी . वो गिनती में 5- 6 लोग थे और वहां रखे पत्थर और बर्फ हटा रहे थे . इन लोगों का लिबास पठानी सूट जैसा था.

ताशी नामग्याल
लदाख के घरकोन गांव का ताशी नामग्याल फोटो क्रेडिट : संजय वोहरा

क्या हुआ था उस 2 और 3 मई को :

ताशी को पहले तो कुछ समझ नहीं कि क्या हो रहा है और कौन लोग हैं . पहले लगा की गांव की तरफ से वो ऊपर गए होंगे लेकिन इतने लोगों में से किसी के ऊपर जाने के पैरों के निशान भी नहीं थे. ताशी कहता है , ” मैं उलझन में पड़ गया लेकिन तभी ख्याल कि ये हीओ न हो पहाड़ के दूसरी तरफ से ऊपर आए होंगे”. दुसरी तरफ तो पाकिस्तान का इलाका है – ये ख्याल आते ही ताशी को लगा कि ये मामला गड़बड़ है . कहीं ये आतंकवादी या पाकिस्तानी तो नहीं है. ये सोचते ही उसने अपने याक की तलाश तो बीच में ही छोड़ी. ताशी दौड़कर आर्मी की नजदीकी पोस्ट पर पहुंचा जहां तैनात हवलदार बलविंदर सिंह को एक सांस में सारी कहानी बता दी. बलविंदर सिंह ने किसी अधिकारी से बात की . कुछ सैनिक ऊपर गए और लौट आए . अगले दिन यानि 3 मई 1999 की सुबह सेना की टीम ताशी नामग्याल को अपने पहाड़ पर उसी जगह जहां से उसने उन लोगों को देखने का दावा किया था . ताशी का कहना है कि फौजियों को कुछ पता नहीं चल रहा था . पहले तो उनको ताशी की बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था. लेकिन जब ताशी ने सही लोकेशन से दूरबीन से दिखाया तो उन्होंने देखा कि वहां पर 50 -60 लोग हैं जो सफेद लिबास में हैं . अब सेना को हालात स्पष्ट हो चुके थे. सबने ताशी की तारीफ़ की.

फ़ौज के साथ , फौजी बनके जूता रहा :

सेना ने जब यहां एक्शन शुरू किया तो ताशी नामग्याल को अपने साथ ही रखा . दरअसल , स्थानीय निवासी होने के कारण ताशी को इलाके के चप्पे चप्पे का पता था. वो यहां के पूरे भूगोल और रास्तों के अलावा यहां की चुनौतियों से भी वाकिफ था.सेना ने जब दुश्मन पाकिस्तानियों पर कार्रवाई शुरू की तो ताशी ही नहीं घरकोन गांव के तमाम लोग मदद को आगे आए. पाकिस्तानी घुसपैठिए सैनिकों से मुकाबला करने के लिए भारतीय सैनिकों को गोला बारूद पहुंचाने से लेकर खाना पानी वगैरह पहुंचाने में भी गांव ने पहल की. ताशी नामग्याल कहता है, ” साहब , भारतीय होने के नाते ये हमारा फर्ज़ बनता ही था लेकिन साथ ही फौजियों की वजह से ही हमारा गांव बच भी सका वरना पाकिस्तानी तो यहां तक पहुँच ही गए होते. उस वक्त हमारा क्या होता ..? गांव तो वो तबाह ही कर डालते “. घरकोन गांव के लोगों रसद आदि ही नहीं इस युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुए भारतीय सैनिकों के क्षत विक्षत शव तक पहाड़ी जंगल से खोजकर अपनी पीठ पर लेकर लाये. ताशी व उसके साथी भी इस काम में लगे रहे .ताशी बताता है कि गांव की लडकियों तक ने सेना की मदद के लिए अपनी पीठ पर सामान लादकर पहाड़ पर पहुंचाया. यही नहीं , जब तक जंग चली तब तक गांव वाले सेना को हर तरह से मदद करते रहे. बिहार रेजीमेंट के मेजर मरिअप्पन सरवानन (major m sarvanan ) और उनके साथ तीन सैनिकों के शव ताशी नामग्याल और उसके साथी खोज कर लाए थे . मेजर सरवानन को कीर्ति चक्र से सम्मानित (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया था . मेजर सरवानन चार पाकिस्तानी सैनिकों के साथ गुत्थमगुत्था हुए और उनको मौत के घाट उतार डाला था.

सेना ने ताशी को अपनाया :

ताशी नामग्याल किया काम सच में हिम्मत , देशभक्ति और अपने सेना की मदद करने के जज़्बे की एक शानदार मिसाल है. भारतीय सेना ने ताशी के जज्बे और मेहनत की कद्र की . ताशी को प्रशस्ति पत्र और 50 हज़ार रुपए का नकद इनाम भी दिया. ताशी को वेतन भी दिया जाने लगा और सेना की तरफ से राशन भी मिलने लगा. बच्चों की पढ़ाई आदि में भी सेना ने सहायता दी. करगिल के बटालिक सेक्टर में आने वाला शायद सेना का कोई अधिकारी हो जो सम्मान पूर्वक ताशी से न मिला हो . कितने ही अधिकारियों ने ताशी को सर्टिफिकेट और प्रशंसा पत्र दिए है. उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर लिखित में उसके काम की तारीफ़ की है . ताशी सेना की तरफ से मिले सम्मान और मदद की भरपूर तारीफ़ करता है. ताशी के पास सेना की तरफ से मिले इतने सर्टिफिकेट हैं कि इतने शायद ही किसी नियमित सैनिक या नागरिक को सेना से मिले होंगे.

ताशी नामग्याल
ताशी नामग्याल को सेना से मिले सर्टिफिकेट और पत्र. फोटो क्रेडिट : संजय वोहरा

कुछ तकलीफें भी महसूस हुईं :

ताशी का कहना है कि सेना के कई अधिकारी तो बहुत ही अच्छे मिले लेकिन कुछ के कारण परेशानी भी हुई. ताशी एक एसके साहनी नाम के अधिकारी का दस्तखत किया बहुत पुराना एक प्रमाण पत्र भी दिखाता है जिसमें लिखा गया है कि घरकोन गांव निवासी 38 वर्षीय ताशी नामग्याल को कैंटीन और मेडिकल सुविधाएं दी जाएं. ताशी नामग्याल बताता है कि इस सुविधा का इंतज़ार करते उसे 20 साल हो गए. हालांकि ताशी को सेना ने वेतन और राशन देना शुरू कर दिया था. कुछ अरसा पहले उसका वेतन भी बंद कर दिया गया तो ताशी एक अधिकारी से मिला. वेतन मिलना शुरू हुआ लेकिन अब उसको मिलने वाला राशन बंद कर दिया गया है. ताशी इसके लिए भारतीय सेना की राजपूताना राइफल की 16 बटालियन के उन अधिकारियों को इसके लिए दोष देता है जो कुछ अरसा पहले यहां तैनात किये गए.

सरकार से शिकायत भी , उम्मीद भी :

इसमें कोई शक नहीं कि सेना की तरफ से ताशी नामग्याल और उसके काम का सम्मान करने में कोई कसर नहीं रखी गई लेकिन ताशी को शिकायत सिविल प्रशासन और सत्तासीन नेताओं से है. ताशी नामग्याल के पास सेना की तरफ से मिले इतने सर्टिफिकेट हैं कि शायद ही किसी नियमित सैनिक या नागरिक को सेना से मिले होंगे. ताशी नामग्याल को तकलीफ उस सरकारी व्यवस्था से जिसने देश के लिए किये गए उसके काम को अब तक न तो अभी सराहा , न पहचाना. इसमें कोई शक भी नहीं कि ताशी नामग्याल का काम नागरिक सम्मान और मान्यता के लायक है. अगस्त 2019 से पहले तक लदाख जम्मू कश्मीर का हिस्सा था . करगिल युद्ध के बाद से वहां आई कितनी ही सरकारों ने ताशी के काम को राज्य की तरफ से दिए जाने वाले सम्मान के लायक नहीं समझा . अब लदाख को एक अलग केंद्र शासित क्षेत्र बने तीन साल हो गये हैं लेकिन यहां के शासन ने भी के इस सन्दर्भ में ताशी की सुध नहीं ली.

ताशी नामग्याल
सर्टिफिकेट जिसमें ताशी को सुविधाएं देने को कहा गया जो नहीं मिलीं. फोटो क्रेडिट : संजय वोहरा

जब 1999 में करगिल युद्ध हुआ था तब भी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी लेकिन उसने भी ताशी नामग्याल के हौसले और हिम्मत के साथ दिखाई गई देशभक्ति को सम्मान के लायक नहीं समझा. फिर भी न जाने क्यों ताशी नामग्याल को केंद्र की वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी वाली सरकार से उम्मीद है जबकि इससे पहली वाली के राज में भी इस दिशा में कुछ नहीं किया गया था . ताशी को उम्मीद है कि नए निजाम के कानों तक उसके कारनामे और दर्द की आवाज़ जल्द पहुंचेगी. कई गुमनाम और ज़मीन से जुड़े लोगों को पिछले कुछ अरसे में दिए राजकीय सम्मान और पुरस्कारों के कारण ताशी के भीतर उम्मीद का अंकुर फूटा है.

परिवार और जिम्मेदारियां :

ताशी नामग्याल के दो बेटे और दो बेटियाँ है. सबसे बड़ी सन्तान बेटा है जो शादीशुदा है और वो भी एक बेटी का पिता है. उस बेटे के एक हाथ की उंगलियाँ काफी पहले किसी हादसे में कट गईं थीं.वो अब एक प्राइवेट पिकअप वैन चलाता है जो स्थायी रोज़गार नहीं है. छोटा बेटा पुणे में पढ़ाई कर रहा है. गृहस्थी चलाने के लिए जमीन काफी नहीं है और अब शरीर भी उतनी मेहनत नहीं कर पाता. सेहत साथ नहीं दे रही. बच्चों की शादियां करनी हैं . घर चलाने की ज़िम्मेदारी में पत्नी हाथ बंटाती और इसके लिए उसे गांव से दूर राजधानी में रहना पड़ता है जहां वो खुमानी बेचती है. ताशी की इच्छा है कि बड़े बेटे को कोई छोटा मोटा काम मिल जाए जो स्थाई हो.

ताशी नामग्याल
लदाख के घरकोन गांव का ताशी नामग्याल फोटो क्रेडिट : संजय वोहरा