फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ : ऐसा सेनाध्यक्ष शायद ही किसी देश को मिला हो

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जनरल सैम मानेकशॉ

भारत के सैन्य इतिहास में अब तक के सबसे लोकप्रिय रहे सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैम होरमूज़जी फ़्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ यानि जनरल सैम मानेकशॉ यानि सैम बहादुर को आज उनके जन्म दिन पर, उनके सैनिक जीवन और निजी जीवन की घटनाओं के साथ याद किया जा रहा है. जीवन के दोनों ही पहलुओं में उनकी जिंदादिली बेमिसाल थी. गुजरात के बलसाड से पंजाब के अमृतसर में आकर बसे पारसी परिवार में पैदा हुए मानेक शॉ के अनुशासन, स्पष्टवादिता और साहस के साथ संवेदनशीलता के इतने किस्से कहानियाँ हैं कि आज के दौर में उनकी सचाई पर भी संदेह होने लगता है.

साथी जवानों के बीच जनरल सैम मानेकशॉ

बांग्लादेश की गारंटी :

पाकिस्तान से उसके पूर्वी हिस्से को आज़ाद करवाकर बांग्लादेश बनाने में जितनी भूमिका तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी की थी, उससे कम भूमिका जनरल मानेकशॉ की भी नहीं थी. असल में 1971 में इंदिरा गांधी चाहती थीं कि मार्च में ही पाकिस्तान पर हल्ला बोला जाए लेकिन जनरल मानेकशॉ ने तब इसके लिए इनकार कर दिया था और कहा था कि भारतीय सेना अभी इसके लिए तैयार नहीं है. इंदिरा गांधी इस जवाब से थोड़ा खिन्न भी हुई थीं लेकिन मानेक शॉ ने इंदिरा गांधी को कुछ महीने इंतज़ार करने के साथ युद्ध जीतने की गारंटी दी थी और फिर हुआ भी वही.

इंदिरा गांधी के साथ जनरल सैम मानेकशॉ

इंदिरा गांधी का साथ :

इंदिरा गांधी और जनरल मानेकशॉ के बीच के कई किस्से मशहूर हैं. तब के भी जब मानेक शॉ सेनाध्यक्ष नहीं थे. भारत अंग्रेजी शासन से नया नया आज़ाद हुआ था. पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमन्त्री थे और तत्कालीन रक्षा मंत्री यशवंत राव चव्हाण के साथ सीमाई इलाकों के दौरे पर निकले थे. बेटी इंदिरा गांधी भी साथ थी लेकिन मानेक शॉ ने इंदिरा गांधी को ऑपरेशन्स रूम में नहीं घुसने दिया और कहा कि उन्होंने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है. लेकिन इस घटना से उनके बीच कोई कटुता नहीं आई. 1969 में सैम बहादुर को भारतीय सेना की कमान सौंपी गई. इंदिरा गांधी प्रधानमन्त्री थीं. सब साथी और अधिकारी इंदिरा गांधी को मैडम या मैडम प्राइम मिनिस्टर कह कर सम्बोधित करते थे लेकिन मानेकशॉ ने उन्हें मैडम नहीं कहा. वो उन्हें प्राइम मिनिस्टर ही पुकारते थे. इन्दिरा गांधी के साथ उनकी बेतकल्लुफी भी थी. एक बार विदेश से लौटीं इंदिरा गांधी को उन्होंने पालम हवाई अड्डे पर रिसीव किया. तब मानेकशॉ को इंदिरा गांधी का हेयर स्टाइल अच्छा लगा और उन्होंने इंदिरा गांधी के सामने ही इसका ज़िक्र करते हुए कॉम्प्लीमेंट भी दिया. जवाब में इंदिरा गांधी मुस्कराते हुए बोलीं कि किसी और ने ये बात नोटिस नहीं की.

जनरल सैम मानेकशॉ 1971 युद्ध के दौरान

मौत को हराया :

3 अप्रैल 1914 को पैदा हुए मानेकशॉ की शुरूआती पढ़ाई अमृतसर में ही हुई लेकिन इसके बाद वह नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हुए. देहरादून स्थित भारतीय सेना अकादमी के पहले बैच यानि 1932 में चुने गये 40 छात्रों में से एक मानेक शॉ 1934 में ब्रिटिश राज में सेना का हिस्सा बने. वह 17 इन्फेंटरी डिवीज़न में थे. उन्हें पहली बार शोहरत तब मिली जब फ्रंटियर्स फ़ोर्स रेजिमेंट में वो कैप्टन के तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध के मोर्चे पर घायल हुए थे. बर्मा अभियान के दौरान जापानी सैनिकों से भिड़ते हुए उन्हें गोलियां लगीं थीं. उनके कमांडर मेजर जनरल कोवान ने अपना मिलिटरी क्रॉस सीने से उतारकर मानेक शॉ को लगा दिया क्यूंकि ये सैन्य सम्मान जिंदा रहते ही सैनिक को दिया जाता था मृत को नहीं. मानेकशॉ जब घायल हुए तब घायलों को उसी हालत में छोड़ने का हुकुम दिया गया था क्यूंकि सेना को आगे बढ़ना था. अगर घायलों को वापस लाया जाता तो बटालियन की रफ्तार कम हो जाती. इस हालत में मानेकशॉ को उनका अर्दली सूबेदार शेर सिंह अपने कंधे पर उठाकर पीछे लेकर आया लेकिन हालत इतनी खराब थी कि डॉक्टर ने उनका इलाज करना अपने वक्त के बरबादी समझा. ऐसे में सूबेदार शेर सिंह ने डॉक्टर पर बंदूक तान दी और कहा कि हम अपने अफसर को इसलिए नहीं कंधे पर उठाकर लाये कि वह बिना इलाज के ही मर जाए. डॉक्टर ने बेमन से ही सही लेकिन एक एक करके सात गोलियां शरीर से निकालीं. इस दौरान उनकी आंत का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था जिसे काटना पड़ा. गज़ब के जीवट वाला ये अफसर बच गया. मानेक शॉ को पहले मांडले, फिर रंगून और इसके बाद भारत लाया गया.

शादी के वक्त जनरल सैम मानेकशॉ

सैनिकों के हीरो बने:

1946 में मानेक शॉ को दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय में बतौर लेफ्टिनेंट कर्नल तैनात किया गया था. कश्मीर के भारत में विलय के सिलसिले में वी पी मेनन और कश्मीर के महाराजा हरी सिंह के बीच हुई बैठक के दौरान मानेक शॉ मौजूद थे. मेनन उन्हें साथ लेकर गये थे. चीन से 1962 में जंग हारने के बाद सेना की 4 कोर की कमान बी जी कौल से लेकर मानेकशॉ को दी गई थी. इसके बाद का एक किस्सा बहुत मशहूर हुआ था. नया कार्यभार सम्भालते ही उन्होंने सैनिकों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि आज के बाद आप में से कोई भी तब तक पीछे नहीं हटेगा जब तक आपको इस बारे में लिखित तौर पर आदेश नहीं मिलते. साथ ही ध्यान ये भी रखिये कि ये आदेश आपको कभी नहीं दिए जायेंगे.

जनरल सैम मानेकशॉ

बहादुर यूँ कहलाये :

सैम मानेक शॉ आज़ाद भारत में गोरखों की कमान संभालने वाले पहले भारतीय फौजी अधिकारी थे. गोरखों ने ही उनको सबसे पहले सैम बहादुर नाम से पुकारना शुरू किया था.

सेनाध्यक्ष बने मानेक शॉ :

साल 1969 की 7 जून को जनरल कुमारमंगलम के रिटायर होने के बाद सैम मानेकशॉ को भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का ओहदा सौंपा गया. उनके युद्ध कौशल से पाकिस्तान की जबरदस्त शिकस्त हुई और बांग्लादेश का निर्माण हुआ. सैम मानेकशॉ को उनकी देशभक्ति और देश के प्रति निस्वार्थ सेवा के कारण उन्हें 1972 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. इससे पहले उनको नागालैंड समस्या को सुलझाने में योगदान देने के लिए 1968 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था. 1 जनवरी 1973 को उन्हें फील्ड मार्शल के पद से भी अलंकृत किया गया.

किस्सा मोटर साइकिल का :

ये बात 1947 से जुड़ी है जब सैम मानेकशॉ और जनरल याह्या खान दिल्ली में सेना मुख्यालय में तैनात थे. याह्या खान को मानेकशॉ की मोटर साइकिल बहुत पसंद थी और वो इसे ख़रीदना चाहते थे लेकिन सैम मानेक शॉ बेचने के लिए तैयार नहीं थे. जब याह्या खान ने बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाने का फैसला लिया तो मानेक शॉ ने उन्हें मोटर साइकिल बेचने की हामी भर दी लेकिन दाम लगाया 1000 रूपये. याह्या ये वादा करके मोटर साइकिल ले गये कि पाकिस्तान से पैसा भिजवा देंगे. काफी साल बीत गये लेकिन चेक नहीं आया. याह्या पाकिस्तानी सेना के जनरल बन गये थे.

कई साल बाद जब पाकिस्तान और भारत में युद्ध हुआ तो मानेकशॉ और याह्या खान अपने अपने देशों के सेनाध्यक्ष थे. जंग जीतने के बाद सैम मानेक शॉ ने मज़ाक किया था कि मैंने याह्या खान के चेक का 24 साल तक इंतज़ार किया लेकिन कभी नहीं आया. आखिरकार 1947 में लिया गया उधार याह्या खान ने अपना आधा देश देकर चुकता किया.

याह्या खान का पूरा नाम आगा मुहम्मद याह्या खान था जो बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति भी बने. याह्या खान पाकिस्तान के तीसरे राष्ट्रपति थे.

अनुशासन और नेतृत्व :

बिना लाग लपेट के साफ साफ़ बात करने वाले सैम बहादुर मानेकशॉ सेना या सैनिकों के सम्मान से कभी समझौता नहीं करते थे. जवान हो या अधिकारी उन्हें इस बात का पूरा ख्याल रहता था. ऐसा ही एक किस्सा लोग उनके बारे में बताते हैं जब तत्कालीन रक्षा सचिव और उस जमाने में काफी रसूख वाले नौकरशाह हरीश सरीन सेना मुख्यालय में अधिकारियों की बैठक ले रहे थे. रक्षा सचिव ने जैसे कर्नल रैंक के एक अधिकारी को बिना नाम या पद पुकारे हुक्म देने के लहज़े से कहा कि वो अपने पास वाली खिड़की खोलें तो मानेकशॉ को बुरा लगा और उन्होंने सबके सामने रक्षा सचिव हरीश सरीन को टोक दिया. उन्होंने रक्षा सचिव से इतना तक कहा कि वह आइंदा से सैन्य अधिकारी के साथ इस लहज़े में बात न करें. शायद रक्षा सचिव को भी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने माफ़ी भी मांगी.

जीवन की आखिरी पारी :

15 जनवरी 1973 को फील्ड मार्शल के पद के तौर पर रिटायर होने के बाद सैम मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंग्टन में बस गए थे. वृद्धावस्था में उनको फेफड़े संबंधी रोग हुआ और वे कोमा में चले गए थे. वेलिंगटन के सैन्य अस्पताल में 27 जून 2008 की आधी रात को उन्होंने अंतिम सांस ली. नाम वाला भी और काम वाला भी …भारतीय सेना का एक बहादुर 40 साल की सेवा करके इस दुनिया से चला गया.

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