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दिलचस्प किरदार का मालिक 1971 का युद्धवीर मोहम्मद यूसुफ खान

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान

मध्य दिसम्बर में जब दिन में भी मेंडर में जबरदस्त सर्दी होती है तब आधी रात के बाद हाड़ मांस गला देने वाली ठंड के बीच जम्मू कश्मीर मिलीशिया के उन जवानों को हुक्म दिया गया कि पाकिस्तान की सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों की जगह लेनी है क्योंकि उनको वापस बुलाया जाना है. जिसके पास जो रसद पानी हो अपने साथ उठाये और चल दे. इन मिलीशिया जवानों में मोहम्मद यूसुफ खान भी थे जिन्हें भर्ती हुए तीन साल ही हुए थे. ये उनके लिए मोर्चे पर पहला एक्शन होने वाला था.

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान जब सेना में भर्ती हुए थे.

मेंडर से गुलपुर पहुंची लेकिन यहाँ उन्हें आगे मूवमेंट के लिए मना कर दिया गया. 24 दिन यहाँ पर फ़ोर्स ने झाड़ियों में छिप कर काटे. खाने के लिए आसपास के गाँव में रहने वाले लोगों ने इंतजाम किया क्यूंकि पीछे से कोई आने के हालात भी नहीं थे. इसके बाद खुद ही शैल ट्रेंच बनाई. छह जवानों की उनकी पार्टी के पास 2 आरसीएल गन (RCL gun – recoilless) थी. यहाँ दुश्मन की गन पोजीशन ऊंचाई पर थी. पुंछ पहुँचने के लिए कृष्णा घाटी जाना था और नदी पार करनी थी. एक अधिकारी ने दोनों छोर पर रस्सी बंधवाई. इसके बाद जवानों ने कमर में बंधी बेल्ट में रस्सी फंसाई और फिर टाँगे फंसाकर नदी पार की गई.

राइफल मैन मोहम्मद यूसुफ खान को इस एक्शन में शुरू में ज़बरदस्त डर लगा था. वो कहते हैं, ” एयर डिफेन्स हमारा अच्छा था. भारतीय वायुसेना के विमान ऐसे बम बरसा रहे थे जैसे आसमान से बारिश के ओले गिर रहे हों. बम गिरने के बाद कुछ दिखाई नहीं देता था. मेरा तो कलेजा मुंह को आ रहा था. ऐसा पहली बार देखा था लेकिन थोड़ी देर बाद हमें भी इसकी आदत हो गई”. फ़ोर्स यहाँ से आगे जाकर नागी टेकरी चौकी पहुंची लेकिन चौकी खाली थी. वहां कोई बन्दा नहीं था. वहां एक गुरुद्वारा था. सेना की टुकड़ी ने उसी में डेरा डाला. 16 दिसम्बर को सीज़फायर होने के बाद फ़ोर्स को वापस बुला लिया गया. उनकी फ़ोर्स वापस उधमपुर आ गई.

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान

जम्मू कश्मीर के बडगाम के खाग गाँव के निवासी मोहम्मद यूसुफ खान सात भाई बहनों में से एक हैं. वह फौजी बनने वाले अपने खानदान में पहले शख्स थे लेकिन उनकी इस परम्परा को उनके दो बेटों में से एक बेटे मोहम्मद लतीफ़ ने जारी रखा. आठवीं पास लतीफ़ भी फौजी बन गया और उसकी भी रेजिमेंट जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI) थी. 1994 में सेना में भर्ती हुआ लतीफ़ 16 साल सेना की सेवा करके घर लौट आया. लतीफ़ का कहना है कि वो और सेवा करना चाहता था लेकिन चर्मरोग के कारण इतनी परेशानी हुई कि सेना छोड़नी पड़ी. यही नहीं मोहम्मद यूसुफ खान के दोनों दामाद भी सेना की सेवा में हैं.

कश्मीर, कश्मीरियत और भारतीय प्राचीन इतिहास की बातें बेहद दिलचस्पी से बताने वाले मोहम्मद यूसुफ पढ़े लिखे न होने के बावजूद विभिन्न मुद्दों पर इतना ज्ञान रखते हैं और सटीक जानकारी के साथ बताते हैं उन्हें चलता फिरता इनसाइकलोपीडिया भी कहा जा सकता है. मोहम्मद युसूफ बताते हैं कि 1971 में जैक मिलीशिया ने इतना अच्छा काम किया कि इसे नियमित सेना में तब्दील करके जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI ) में शामिल कर दिया गया. 1967 में 20 साल के थे जब मोहम्मद यूसुफ सेना में भर्ती हुए.

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान का बेटा पूर्व फौजी लतीफ खान

सेना में अपने उस कार्यकाल को यूसुफ बहुत याद करते हैं जब उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल के वी कृष्णा राव के साथ काम करने का मौका मिला था. यूसुफ खान कहते हैं कि उन्हें एक व्यक्ति के तौर पर उनसे स्नेह मिलता था और एकाध बार तो अपनी बिसात से बाहर जाकर भी राइफलमैन मोहम्मद यूसुफ ने उनसे कुछ बात कहने की हिमाकत कर डाली थी. तब जनरल राव किसी मसले पर परेशान और तनाव ग्रस्त थे बावजूद इसके उन्होंने इसे मेरी सामान्य प्रतिक्रिया के तौर पर लिया. (जनरल के वी कृष्णा राव इसके बाद सेनाध्यक्ष भी बने थे और दो बार जम्मू कश्मीर के राज्यपाल भी रहे हैं)

मोहम्मद यूसुफ खान
मोहम्मद यूसुफ खान का बेटा पूर्व फौजी लतीफ खान और उसका परिवार

मोहम्मद यूसुफ खान सिक्किम के भारत में विलय से पूर्व वहां के राजा को हिरासत में लिए जाने के लिए किये सेना के ऑपरेशन का ब्यौरा एक एक घटनाक्रम के साथ बेहद दिलचस्प अंदाज़ में बयान करते हैं.

पाकिस्तान से युद्ध में इस फ़ौजी ने जब बारूदी गंध वाली खट्टी बर्फ से भूख प्यास मिटानी चाही

डल की ताज़गी से लेकर रंग बिरंगी सुरीली शाम की गवाह बनी स्वर्णिम विजय मशाल

स्वर्णिम विजय वर्ष
लाइट एंड साउंड शो में सेना का पाइप बैंड

स्वर्णिम विजय वर्ष की मशाल के स्वागत में शनिवार सुबह से ही जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में जगह जगह कार्यक्रम शुरू हुए. श्रीनगर के पूर्वी हिस्सों से होते हुए मशाल जब डल लेक पहुँचीं तो इसमें चार चांद लग गये. मोटर साइकिल सवारों के साथ, साइकिलिस्ट और दिव्यांग जन भी पूरे जोश खरोश के साथ जुड़ गये. इसी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए. शाम को बादामी बाग़ कैंट में लाइट एंड साउंड शो के साथ आज के कार्यक्रम का समापन हुआ.

स्वर्णिम विजय वर्ष
श्रीनगर में डल झील के पास पार्क में स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल यात्रा के स्वागत में फैशन शो भी हुआ.

शनिवार की सुबह विजय मशाल को चार चिनार ले जाया गया. इस मौके पर कराई गई स्केटिंग में लड़को के साथ लडकियां भी शामिल हुई. इसके बाद मशाल डल लेक इलाके में रैली के साथ यात्रा पर निकली. सुरक्षा का ठीकठाक बन्दोबस्त था. खुली जिप्सी पर मशाल के आगे जहां यातायात पुलिस की मोटरसाइकिल थी वहीं पीछे सेना के बख्तरबंद वाहन भी थे. थोड़ा बहुत ट्रैफिक जाम ज़रूर हुआ लेकिन यात्रा सुचारू रूप से चली.

स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल
डल झील पर स्वर्णिम विजय मशाल के स्वागत में रैली

दिलचस्प है कि रास्ते में जो साइकिल सवारों का जत्था मशाल रैली में शामिल हुआ उसका नेतृत्व भारतीय थल सेना की श्रीनगर स्थित चिनार कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पाण्डेय की पत्नी कर रही थीं. पहाड़ी सूबे हिमाचल की मूल निवासी श्रीमती पांडेय साइकिलिंग की शौक़ीन हैं और ये उनके व्यायाम का हिस्सा है. साइकिल सवारों में कई तो कश्मीर के रहने वाले राष्ट्रीय स्तर के खिलाडी थे. इस रैली में कई महिलाओं ने भी दिलचस्पी दिखाई और हिस्सा लिया. मशाल रैली फिर सेंट्रल पार्क में रुकी जहां स्कूली बच्चों ने, भारत पाकिस्तान युद्ध में विजय के प्रतीक के तौर पर 1971 की फोरमेशन बनाई.

स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल
बादामी बाग कैंट में लाइट एंड साउंड शो के दौरान सेल्फी कार्नर भी बनाया गया.

यहाँ गीत, संगीत और मनोरंजन का शानदार कार्यक्रम हुआ. एक फैशन शो का भी आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में सेना के कुछ अधिकरियों ने भी शिरकत कर युवाओं का हौसला बढ़ाया. गीत, संगीत और कला की दुनिया के उभरते कश्मीरी मूल के कुछ सितारे भी यहाँ मौजूद थे. उन्होंने अपनी कला का जलवा दिखाया और तारीफ में खूब तालियाँ भी बटोरी. जम्मू कश्मीर पुलिस की इकाई टूरिस्ट पुलिस की प्रभारी उपाधीक्षक संदीप कौर (DSP Sandeep Kaur) भी यहाँ मौजूद थीं.

स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल
श्रीनगर में स्वर्णिम विजय मशाल यात्रा में शामिल दिव्यांग अपनी ट्राईसाइकिल पर

शाम को बादामी बाग़ कैंट के इबादत-ए- शहादत म्यूजियम में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया गया. अँधेरे में म्यूजियम की दीवारों रंग बिरंगी रोशनी और संगीत ने यहाँ समां बाँधा. सेना के दो पाइप बैंड ने एक दूसरे से मुकाबला करते हुए लोकप्रिय और देशभक्ति वाले गानों की धुनें बजाई. बैंड टीम के सदस्य अपनी अपनी यूनिट की रंगबिरंगी यूनिफार्म में थे लेकिन अँधेरे ने उनकी पोशाक का आकर्षण बेशक ढांप लिया था. अलबत्ता टोपी से लेकर जूतों तक उनकी पोशाक पर जलते छोटे छोटे एल ई डी बल्बों की लड़ी एक अलग ही किस्म का नजारा पेश कर रही थी. सेना के वरिष्ठ अधिकारी और सैनिकों के परिवार भी इस शो को देखने आये. 1971 के युद्ध पर बनाई गई फिल्म भी यहाँ दिखाई गई. शो देखने के लिए वो पूर्व सैन्य अधिकारी भी आये जो खुद इस लड़ाई का हिस्सा रहे हैं.

स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल
इबादत-ए-शहादत म्यूजियम में लाइट एंड साउंड शो

श्रीनगर में चिनार कोर ने अलग अंदाज़ से कश्मीरी युद्ध वीरों का सम्मान किया

चिनार कोर
युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पण समारोह.फोटो : अंजलि कौल

सूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत
पुर्जा पुर्जा कट मरे, कबहू ना छाडे खेत

जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में सर्वधर्म प्रार्थना के अंत में शूरवीरों को पारिभाषित गुरु गोबिंद सिंह रचित इन पंक्तियों के साथ ही, 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को सेना ने पुष्पांजलि अर्पित की. मुख्य कार्यक्रम बादामी बाग़ छावनी स्थित 15 कोर (चिनार कोर) के युद्ध स्मारक पर हुआ. कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डी पी पांडेय और अन्य सैन्य अधिकारियों ने तो स्मारक पर पुष्प चक्र अर्पित किये ही, बड़ी संख्या में आये उन पूर्व सैनिकों ने भी पुष्पांजलि अर्पित की जिन्होंने खुद इस युद्ध को लड़ा है. ये ज़्यादातर वो पूर्व सैनिक हैं जो श्रीनगर के आसपास के ज़िलों में रहते हैं. इनमें से कई तो इस युद्ध में घायल भी हुए थे.

भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध के 50 साल पूरे होने पर मनाये जा रहे स्वर्ण जयंती वर्ष (golden jubilee year) कार्यक्रमों में से एक इस कार्यक्रम में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के भी आने की चर्चा थी लेकिन राजधानी से बाहर होने के कारण वह नहीं आ सके.

चिनार कोर
युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पण समारोह.
फोटो : अंजलि कौल

कार्यक्रम की शुरुआत हिन्दू, ईसाई, इस्लाम और सिख धर्मों की प्रार्थना से हुई. इस्लामिक तरीके से शहीदों के लिए प्रार्थना करते कहा गया कि वतन से मोहब्बत ईमान की शान है और जो लोग देश की रक्षा करते हुए शहीद होते हैं उनको मुर्दा न कहो बल्कि वो जिंदा हैं मगर आपको इनकी ज़िन्दगी का एहसास नहीं होता. इसी तरह हमारे बहादुर जवानों ने जो मिसाल कायम की कि अपनी जान को देश के लिए कुर्बान किया, वो जवान मरे नहीं बल्कि देश के लिए अमर हो गए. यहाँ वीरों को समर्पित एक शेर भी पढ़ा गया……

गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए जंग में, वो तुफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले.

सिख तौर तरीके से की गई प्रार्थना (अरदास) के अंत में गुरु गोविंद सिंह की लिखी उपरोक्त पंक्तियों (सूरा सो पहचानिये …) असली शूरवीर की पहचान यही है कि वो दीन (गरीब, ज़रुरतमंदों) की भलाई के लिए काम करे और जब युद्ध में उतरे तो बेशक उसके टुकड़े टुकड़े हो जाएँ लेकिन वो मैदान छोड़कर नहीं भागेगा.

युद्ध स्मारक से सैनिकों के साथ एनसीसी के कैडेट्स उस मशाल को लेकर आगे बढ़ गये जो कश्मीर के अलग अलग हिस्सों से होते हुए तीन दिन से श्रीनगर के अलग अलग हिस्सों में ले जाई जा रही है. स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल के स्वागत में जगह जगह लोगों का इकट्टा होना और उसे सम्मान देने का ज़िक्र करते हुए कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पाण्डेय ने कश्मीरवासियों का आभार भी तब प्रकट किया जब वे मीडिया से मुखातिब हो रहे थे.

चिनार कोर
1971 युद्ध के दौरान जब पाकिस्तान के सेना कमांडर जनरल नियाज़ी ने जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष सैनिकों के साथ सरेंडर. उस मौके की फोटो पर आधारित पेंटिंग के स्मृति चिन्ह के साथ सैनिक अधिकारी और पूर्व सैनिक.
फोटो : अंजलि कौल

श्रीनगर स्थित वेटरन सेल ने भी इस कार्यक्रम में अपनी अहम भूमिका निभाई. 1971 के युद्ध में हिस्सा लेने वाले बहादुर सैनिकों को सम्मानित करने के लिए अलग अलग हिस्सों से लाकर यहाँ ठहराया गया. युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पण के बाद एक सादा कार्यक्रम चिनार कोर मुख्यालय के बाहरी लॉन में हुआ. कोर कमांडर डीपी पाण्डेय (Lt.Gen. D P Pandey) ने युद्ध वीरों को स्मृति चिन्ह और उपहार भेंट किये. यहीं पर उनके लिए नाश्ते की व्यवस्था थी जिसमें पूर्व सिपाही से लेकर लेफ्टिनेंट जनरल रैंक तक के अधिकारी बराबरी से शामिल दिखे.

बहुत से पूर्व सैनिकों के लिए ये बेहद भावुक माहौल था. उन्होंने 50 साल पुराने युद्ध की यादें ताज़ा की. कइयों के लिए तो उम्र के इस पड़ाव में पहुंचकर लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी से मुलाक़ात और सम्मान प्राप्त होना ही सपने जैसा था. कोर कमांडर भी इन वीरों के कारनामों से प्रभावित दिखे और उनको शुभकामनायें दीं. दोपहर के खाने के बाद 1971 के इन युद्ध वीरों को ससम्मान छावनी से रुखसत किया गया.

चिनार कोर
युद्ध स्मारक पर स्वर्णिम विजय वर्ष मशाल के साथ सैन्य अधिकारी, एनसीसी कैडेट और पूर्व सैनिक.
फोटो : अंजलि कौल

अपने आप में अनूठे इस कार्यक्रम के आयोजन और सम्मान के लिए, बुजुर्ग हो चुके इन पूर्व सैनिकों ने अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त किया और दुआएं दीं. इनमें से सभी 70 से 80 साल के या इससे ज्यादा उम्र के भी थे. ज्यादातर जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI) से ताल्लुक रखते थे. जैक लाई के रूप में लोकप्रिय भारतीय सेना की ये एक ऐसी इकाई है जिसने भारत की आजादी के बाद हरेक युद्ध में हिस्सा लिया और अपना पराक्रम दिखाते हुए वीरता पदक और सम्मान हासिल किये.

चिनार कोर
सम्मानित किए गए युद्धवीर जिन्होंने 1971 में पाकिस्तान को युद्ध में परास्त करने में पराक्रम दिखाया.

भारतीय सेना ने सड़क हादसे में लेफ्टिनेंट अमतोज सिंह को खो दिया

अमतोज सिंह
लेफ्टिनेंट अमतोज सिंह सिधु (फाइल फोटो) और उनकी दुर्घटनाग्रस्त जीप

भारतीय सेना ने युवा अधिकारी लेफ्टिनेंट अमतोज सिंह सिधु को एक सड़क हादसे में खो दिया. लेफ्टिनेंट अमतोज सिंह 64 कैवलरी (64 cavalry) में थे. उनकी तैनाती पठानकोट में थी.

लेफ्टिनेंट अमतोज सिंह को ट्रेनिंग के लिए अहमदाबाद जाना था और वह अपनी जीप ड्राइव करके जा रहे थे.

ये सड़क दुर्घटना सोमवार को राजस्थान के भीलवाड़ा में मंडलगढ़ सब डिवीज़न में बिजोलिया थाना क्षेत्र में हुई. लेफ्टिनेंट अमतोज की जीप मंडोल बांध के पास बेकाबू होकर गहरी खाई में जा गिरी थी.

जज़्बे और ताकत के दम पर एक मजदूर से फौजी बने असली कश्मीरी नायक की कहानी

गुलाम नबी वाणी
गुलाम नबी वाणी. फोटो : अंजलि कौल

फ़ौज में भर्ती होने के कुछ साल बाद ही अनपढ़ गुलाम नबी वाणी नायक बनके जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI ) से रिटायर हुआ लेकिन असल जिंदगी का नायक तो हमेशा रहा है. अच्छे खासे डील डौल के मालिक इस रिटायर्ड फौजी से जब भी सेना में भर्ती और युद्ध की बात की जाये तो उनके पूरे शरीर में अचानक से ऐसे फुर्ती आती है मानो अभी रणक्षेत्र में चल देंगे. हैरान कर देने वाली उनकी आपबीती तो आज के ज़माने के हिसाब से लोगों को शायद सपना या झूठ ही लगे. उनके सुनाये कुछ किस्से तो आजकल के सैनिकों तक को हैरान करने के लिए काफी हैं.

गुलाम नबी वाणी
गुलाम नबी वाणी. फोटो : अंजलि कौल

पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 के युद्धों में सक्रियता से हिस्सा ले चुके और युद्ध भूमि में ही अपनी हिम्मत, फुर्ती और ताकत के बूते पर रैंक की तरक्की पाने की उनकी आपबीती भी ऐसी ही एक दिलचस्प घटना है. ठीक किसी मंजे हुए फिल्म डायरेक्टर की तरह तमाम हालात को गुलाम नबी वाणी जब बयान करते हैं तो कोई भी उनको लगातार देखे और सुने बगैर नहीं रह सकता. ये घटना 1965 में गुरेज़ सेक्टर की है. पहाड़ के दूसरी तरफ से फायर कर रहे पाकिस्तानी सैनिकों के फायर का जवाब देने और उनकी पोस्ट कब्जाने की रणनीति पर कर्नल रैंक के उनके कमांडिंग ऑफिसर ने ऊंचाई पर मोर्टार लगाने का हुकुम दिया था. उस जगह की निशानदेही करके कर्नल लौटते, उससे पहले ही गुलाम नबी वाणी मोर्टार के तीन हिस्सों में से एक सबसे भारी वाला हिस्सा यानि बेस प्लेट लेकर वहां पहुँच भी गए थे. फ़ौजी सामान के साथ साथ तकरीबन 100 किलो से ज्यादा की बेसप्लेट उठाकर इतनी जल्दी पहुंचाने से कर्नल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहीं अपना पेन निकाला और गुलाम नबी वाणी के दाहिने बाजू पर लांस नायक की फीती बना दी. यानि युद्ध भूमि में ही गुलाम नबी वाणी लांस नायक बना दिए गए. ये वो जगह है जहां मई जून में भी बर्फ रहती है. यहाँ इनकी कम्पनी ने पाकिस्तान की जसमीन चौकी पर कब्जा कर लिया था.

गुलाम नबी वाणी
गुलाम नबी वाणी. फोटो : अंजलि कौल

बंदूक की ट्रेनिंग डंडों से :

वो ज़माना था जब थ्री नॉट थ्री राइफल पुलिस के पास भी थी और सैनिक भी इस्तेमाल करते थे. हथियार की बात करते ही गुलाम नबी वाणी के चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है. दाहिने हाथ के अंगूठे और ऊँगली से अपनी ठुड्डी पकड़ते हुए पल भर के लिए सोचने वाले वाले अंदाज़ से उनकी आँखे शून्य की तरफ देखती हैं, फिर कहते है,’ मुझे अगर ठीक से याद है तो मेरी राइफल का नम्बर 210 था, बट पर यही लिखा था’. लेकिन जब हथियार चलाने की ट्रेनिंग की बात पूछने पर उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर हम ही नहीं आसपास मौजूद उनके दोस्त रिटायर्ड राइफलमैन अब्दुल अहद मटकू के परिवार वाले भी अवाक रह गये. “साहब, हमारी ट्रेनिंग डंडों से हुई थी, हम डंडे की बनी बंदूक से सीखते थे. डंडे के पीछे का थोडा सा हिस्सा काला होता था जिसे बंदूक का बट माना जाता था और अगला हिस्सा सफेद (पेंट से) होता था जिसे बैरल मानते थे. धागे और रस्सी से ट्रिगर आदि बनाया जाता था.”

गुलाम नबी वाणी
गुलाम नबी वाणी यह बता रहे हैं कि तब डंडे से बंदूक चलाने की ट्रेनिंग कैसे लेते थे. फोटो : अंजलि कौल

ऐसा भला क्यों? ग़ुलाम नबी वाणी का जवाब था,” साहब, बन्दूक थी कहाँ? इतने रंगरूटों को सिखाने के लिए एक दो ही राइफल हुआ करती थी.” खैर डंडे वाली ट्रेनिंग में तब सैनिकों को बंदूक के बारे में मोटे तौर पर जानकारी दी जाती थी. अलग अलग तरह से पोजीशन लेना वगैरह सिखाया जाता था. डंडे के जरिये ट्रेनिंग की बात सच में ये झटका देने वाली थी जो ज़ाहिर करती है कि कितने कम साधनों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने अपने हौसले, ताकत और जज्बे के दम पर उस दौर में भारत की सीमाओं की चौकसी की और दुश्मन से मुकाबला किया. ये जज़्बा कहां से आता है ..! इस पर नायक गुलाम नबी वाणी का तो यही कहना था कि उन्हें अक्सर ऐसे मौके पर जम्मू कश्मीर के तत्कालीन रियासते सदर शेख अब्दुल्ला की कही जोशीली बातें याद आ जाती हैं जो उन्होंने 1964 में हफशनार में कसम परेड (पासिंग आउट परेड) में कही थीं.

गुलाम नबी वाणी
गुलाम नबी वाणी यह बता रहे हैं कि तब डंडे से बंदूक चलाने की ट्रेनिंग कैसे लेते थे. फोटो : अंजलि कौल

गुलाम नबी वाणी से मुलाकात उनके दोस्त अब्दुल अहद मटकू के घर पर हुई थी जो जम्मू कश्मीर के अनंतनाग स्थित कोठाएर गाँव में है. ये हरा भरा पहाड़ी इलाका है जहां के पुरुष अच्छी कद काठी के तगड़े जिस्मों के मालिक हैं. थोड़ा सा भी भरोसा हो जाये तो अजनबियों से खूब खुल कर बात करते हैं और साथ ही मेहमान नवाज़ी भी.

मज़दूर से बना फौजी :

फ़ौज में भर्ती कैसे हुए? सवाल करते ही हंसने लगते हैं गुलाम नबी वाणी और जो उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर कोई भी जल्दी से यकीन नहीं कर सकता कि 60 के दशक में सेना में इस तरह भर्ती हुआ करती थी. अपनी उम्र भी ठीक से याद नहीं रख पाने वाले गुलाम नबी वाणी का ताल्लुक बेहद गरीब परिवार से था. दिन भर लकड़ियाँ बीनना या गाँव में घर का छोटा मोटा काम करने के अलावा कुछ नहीं आता जाता था. जिस्मानी ताकत अच्छी थी सो मकान बनाने के काम में मजदूरी करने लगे. एक दिन की मजदूरी के बदले में सिर्फ दो आने (12 .5 पैसे) मिलते थे.

गुलाम नबी वाणी
गुलाम नबी वाणी. फोटो : अंजलि कौल

ऐसे ही एक दिन नोगाम में काम कर रहे थे. वहीं पर सेना में भर्ती के लायक नौजवानों को तलाशती सेना की टीम आ गई. इसका शोर मच गया. गुलाम नबी और इनके एक दो साथी मज़दूर भी भर्ती देखने पहुँच गये. तभी भर्ती टीम के एक सदस्य की नजर गुलाम नबी वाणी पर पड़ी लेकिन गुलाम नबी को पढ़ना तो क्या गिनती तक नहीं आती थी. स्कूल की शक्ल तक कभी नहीं देखी थी. वहीं बीच रास्ते पर ही गुलाम से दौड़ लगवाई, वजन उठवाया और इसका नतीजा देखते ही बस गुलाम को चुन लिया गया. भर्ती वाली टीम अपने साथ दफ्तर ले गई. तब जम्मू कश्मीर मिलीशिया हुआ करती थी. सेना में भर्ती होने के बाद उनको 40 रूपये प्रति माह वेतन मिलने लगा. जिंदगी काफी बदल गई. फ़ौज उन्हें बहुत रास आई. मन लग गया.

युद्ध 1971 का :

1971 में पाकिस्तान से फिर युद्ध हुआ. विभिन्न सीमाओं पर लड़ाई छिड़ी हुई थी. गुलाम नबी वाणी बताते हैं कि तब उनकी कम्पनी राजौरी में थी. वे सुंदरबनी में 02 पिकेट पर थे और सियाकोट के किले की तरफ से दुश्मन फायरिंग कर रहा था. ये फासला करीब डेढ़ -दो किलोमीटर का था. तब 17 पंजाब और जाट रेजिमेंट के साथ मिलकर बकरीवाला नाला पार करके वो पकिस्तान में जा घुसे थे. इसी एक्शन के दौरान एक दुश्मन का एक शैल उनसे थोड़ा दूर गिरा था जिससे निकले कुछ छर्रे या कुछ वैसा गुलाम नबी वाणी की टांगों में लगा था. गुलाम नबी कहते हैं कि वो मामूली चोट थी, ” हमारे पास जो थोड़ी बहुत दवाई पट्टी थी, उसी से इलाज कर लिया”. इस युद्ध के बाद उनकी यूनिट उधमपुर और फिर रुड़की (उत्तराखण्ड) आ गई थी. यहीं से 1978 में गुलाम नबी वाणी रिटायर हुए. तब पेंशन भी 40 रूपये ही मिलने लगी. इसके बाद श्रीनगर स्थित आग्नेयास्त्र डिपो (FAD) में उनको पूर्व सैनिक के तौर पर सुरक्षा गार्ड का काम मिला.

गुलाम नबी वाणी
बतौर पूर्व सैनिक गुलाम नबी वाणी का परिचय पत्र

जब दस्तखत करना सीखा :

गुलाम नबी के फौजी जीवन का सबसे दिलचस्प वाकया तब का है जब उनकी यूनिट उधमपुर में थी. लांस नायक बन गये थे लेकिन गुलाम नबी वाणी को लिखना पढ़ना तो क्या अपने दस्तखत करने तक नहीं आते थे. तब उन्हें साथियों ने 1 से 10 तक की गिनती सिखाई और नाम के पहले शब्द को अंग्रेज़ी के दो अक्षर जी एच (G H ) लिखकर कर दस्तखत करने सिखाये. और भी मज़ेदार बात ये हुई कि जिस दिन उनको तनख्वाह मिली और उन्होंने तनख्वाह वाले रजिस्टर पर अंगूठा लगाने की जगह दस्तखत किये उस दिन उनके उस्ताद पलटन के एक हवलदार ने अपनी जेब से 50 पैसे खर्च करके मिठाई बांटी.

सेना ने हारी पर्बत पर स्वर्णिम विजय मशाल और तिरंगे से समां बाँध दिया

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल

भारतीय सेना पाकिस्तान के साथ 1971 में लड़े गए युद्ध की विजय के पचास साल पूरे होने के मौके पर मनाये जा रहे स्वर्णिम विजय वर्ष के आयोजनों के तहत श्रीनगर का ऐतिहासिक किला हारी पर्बत विजय मशाल की रिले दौड़ का गवाह बना. सादगी से किये गए इस आयोजन में मौजूदगी बेशक चुनिन्दा लोगों की रही लेकिन मशाल लेकर दौड़ने वाले अलग अलग उम्र के और अलग अलग खेलों के उन सितारों की शिरकत ने समां बाँध दिया जो कश्मीरी मूल के हैं.

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल

इस दौरान जगह जगह तिरंगों से सजाये गये किले के कुछ हिस्से इस आयोजन में चार चाँद लगा रहे थे लेकिन इस अवसर पर, भारत के पहले ब्लेड रनर एथलीट, रिटायर्ड मेजर डीपी सिंह का न पहुँच पाना थोड़ा निराश कर गया. किन्ही कारणों से उनकी इन आयोजनों में उपस्थिति अब मुश्किल लग रही है.

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल

कनाडा में 1988 में हुए 15 वें विंटर ओलंपिक्स, एशियन गेम्स और विश्वस्तरीय विभिन्न स्कींइंग मुकाबलों में भारत की नुमायन्दगी कर चुके गुल मुस्तफा देव ने सबसे पहले हारी पर्बत की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अगले प्रतिभागी स्पोर्ट्स स्टार को ये मशाल थमाई जो कश्मीर के विभिन्न हिस्सों से होती हुई श्रीनगर पहुंची है. इस तरह एक एक करके ये खिलाड़ी किले की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते एक दूसरे को विजय मशाल थमाते चले गये.

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल

सबसे अंत में ताइक्वांडो चैंपियन मंशा बशीर ने विजय मशाल थामी. मंशा उम्र में इन सभी खिलाड़ियों से छोटी भी थीं. अब कश्मीर घाटी में छात्रों को ताइक्वांडो सिखा मंशा कश्मीर के युवाओं के लिए प्रेरणा की एक शानदार मिसाल है. आतंकवादियों ने उनके सर से पिता का साया तब छीन लिया था जब वो सिर्फ चार दिन की थी. श्रीनगर के पुराने इलाके हबाकदल से ताल्लुक रखने वाली मंशा पहली ऐसी कश्मीरी युवती है जिसने भारतीय खेल प्राधिकरण के ज़रिये एनआईएस पूरा किया.

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल थामे ताइक्वांडो चैंपियन मंशा बशीर
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल थामे ताइक्वांडो चैंपियन मंशा बशीर

मंशा कहती है, ‘इस मशाल को थामकर चलना मेरे लिए गर्व का विषय है और ऐसा मौका देने के लिए मैं दिल से सेना और इसके अधिकारियों को धन्यवाद देती हूँ. स्वर्णिम विजय मशाल लेकर दौड़ने वालों में क्रिकेट खिलाड़ी और कोच बिलाल शम्स भी थे. बिलाल अंडर 14, 16 और 19 टीम के खिलाड़ियों को कोचिंग भी देते हैं.

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल

यहाँ विजय मशाल को लेकर लोगों में बेहद दिलचस्पी और जज़्बा दिखाई दिया. हर कोई मशाल के करीब आना, उसे छूना या थामना चाहता था. यहाँ तक कि हारी पर्बत पर सुरक्षा और अन्य इंतज़ाम में तैनात केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF सीआरपीएफ) जवान भी इस आयोजन में शामिल होने से खुद को रोक न सके. मशाल और अपने अधिकारी के साथ फोटो खिंचवाकर वे भी बहुत खुश हो रहे थे. विजय मशाल के साथ राष्ट्रीय ध्वज की जुगलबन्दी इस आयोजन के मायने भी साफ़ बता रही थी-देश और तिरंगा सर्वोपरि है.

स्वर्णिम विजय मशाल
स्वर्णिम विजय मशाल थामे सैन्य अफसर

श्रीनगर में स्वर्णिम विजय वर्ष कार्यक्रमों में ब्लेड रनर डीपी सिंह की ख़ास शिरकत होगी

स्वर्णिम विजय वर्ष
बादामी बाग़ छावनी में टाइम स्क्वैयर पर स्वर्णिम विजय मशाल के पहुंचने पर उसका स्वागत किया गया

पाकिस्तान के साथ 1971 में लड़े गए युद्ध की विजय की गोल्डन जुबली को स्वर्णिम विजय वर्ष के तौर पर एक उत्सव की तरह मना रही भारतीय सेना के ख़ास कार्यक्रमों में से कुछेक आकर्षण जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में 14 जुलाई से दिखाई देंगे. इसी दौरान स्वर्णिम विजय मशाल भी यहाँ होगी. 1971 के युद्ध में हिस्सा ले चुके कुछ कश्मीरी वीर भी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे. गीत संगीत से लेकर खेल और फिटनेस से ताल्लुक रखने वाले कार्यक्रम भी किये जायेंगे और इनमें आम जनता भी शामिल होगी. भारत के पहले ब्लेड रनर के तौर पर ख्याति प्राप्त भारतीय थल सेना के सेवानिवृत्त मेजर डीपी सिंह विशेष मेहमान के तौर इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे जिन्होंने युद्ध भूमि में अपनी एक टांग गंवा दी थी लेकिन उनके गजब के हौसले व जज्बे ने उनको ऐसे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना दिया जो अपने जिस्म का अंग गंवा चुके हैं.

स्वर्णिम विजय वर्ष
बादामी बाग़ छावनी में टाइम स्क्वैयर पर स्वर्णिम विजय मशाल के पहुंचने पर उसका स्वागत किया गया

थल सेना की 31 सब एरिया कमांड की तरफ से आयोजित किये जाने वाले इन कार्यक्रमों की शुरुआत 14 जुलाई को सुबह विजय दौड़ (विक्टरी रन-Victory Run) से होगी जिसमें ब्लेड रनर मेजर डीपी सिंह शामिल होंगे. दोपहर बाद चार बजे से हरी पर्बत पर विक्टरी क्लाइंब (Victory Climb) का आयोजन है. 15 जुलाई को सुबह झेलम नदी पर बोटिंग होगी उसका रूट बीआरएस गेट से जोगर्स पार्क तक होगा. उसी दिन 12 बजे से 3 बजे तक श्रीनगर के पश्चिमी इलाकों में विजय दौड़ होगी. रात 8 बजे बादामी बाग़ छावनी (BB Cant) के म्यूजियम में वीर शहीदों की याद में ‘इबादत ए शहादत’ नाम से लाइट एंड साउंड शो होगा.

स्वर्णिम विजय वर्ष
बादामी बाग़ छावनी में टाइम स्क्वैयर पर स्वर्णिम विजय मशाल के पहुंचने पर उसका स्वागत किया गया

इन्हीं कार्यक्रमों के तहत 16 जुलाई को बीबी कैंट में सुबह कोर युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित होगी जिसमें जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा शामिल होंगे.

मेजर डीपी सिंह
भारतीय थल सेना के सेवानिवृत्त मेजर डीपी सिंह विशेष मेहमान होंगे

17 जुलाई को श्रीनगर के पूर्वी क्षेत्रों में विजय दौड़ होगी. राजधानी श्रीनगर की पहचान कही जाने वाली डल झील के इलाके में साइकिलिंग, स्केटिंग वगैरह जैसे आयोजन होंगे. उसी दिन शाम को बीबी केंट म्यूजियम में वीर शहीदों की याद में ‘इबादत ए शहादत’ लाइट एंड साउंड शो होगा. 18 और 19 जुलाई को आर्मी पब्लिक स्कूल और केन्द्रीय विद्यालय के छात्रों और अभिभावकों के लिए कार्यक्रम होगा. 15 कोर की तरफ से 20 जुलाई को स्वर्णिम विजय मशाल 14 कोर को सौंप दी जायेगी. ये कार्यक्रम जोजिला पास पर होगा.

सोनाली मिश्रा बीएसएफ का पंजाब फ्रंटियर सम्भालने वाली पहली महिला आईजी

सोनाली मिश्रा
पंजाब फ्रंटियर की कमान सम्भालने वाली पहली महिला अधिकारी सोनाली मिश्रा

भारतीय पुलिस सेवा की वरिष्ठ अधिकारी सोनाली मिश्रा ड्रग्स और हथियारों की स्मगलिंग के लिए कुख्यात पाकिस्तान से सटे पंजाब बॉर्डर की सुरक्षा सम्भालेंगी. महानिरीक्षक (आईजी) के तौर पर पंजाब फ्रंटियर की कमान सम्भालने वाली वह पहली महिला अधिकारी होंगी. सोनाली मिश्रा अभी सीमा सुरक्षा बल (BSF बीएसएफ) के इंटेलिजेंस अनुभाग में हैं जिसे ‘जी ब्रांच’ (G branch) भी कहा जाता है.

भारतीय पुलिस सेवा के मध्य प्रदेश कैडर के 1993 बैच की अधिकारी सोनाली मिश्रा इससे पहले भी चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील माहौल में विभिन्न ओहदों पर तैनाती का अनुभव रखती हैं. आईपीएस सोनाली मिश्रा इससे पहले, आतंकवाद से प्रभावित राज्य जम्मू कश्मीर में भी आईजी के पद पर तैनात रही हैं. कश्मीर एलओसी की निगहबानी में सीमा सुरक्षा बल की तैनाती भारतीय थल सेना की ऑपरेशनल कमांड के तहत होती है.

सोनाली मिश्रा
सोनाली मिश्रा पंजाब फ्रंटियर की कमान सम्भालने वाली पहली महिला अधिकारी

भारत और पाकिस्तान के बीच 553 किलोमीटर के सीमाई इलाके की रखवाली पंजाब फ्रंटियर की ज़िम्मेदारी है. ये फ्रंटियर 1965 में बीएसएफ की स्थापना के साथ ही गठित किया गया था. दोनों मुल्कों के बीच अटारी वागा एकीकृत पोस्ट होने के साथ भारतीय किसानों की सीमाई क्षेत्र में बाड़ के उस पार खेतों में काम करना जैसी गतिविधियाँ भी यहाँ होती हैं.

भारत और पाकिस्तान के बीच अमृतसर-लाहौर का ये वही बॉर्डर है जहां दोनों देशों के सीमाई प्रहरी बीएसएफ व पाकिस्तान रेंजर्स शाम को सूरज ढलने के वक्त अपने देश का ध्वज उतारते हैं. बेहद जोश खरोश वाली इस रस्म को देखने के लिए भारत और पाकिस्तान के लोग बड़ी तादाद में आते हैं.

एनसीसी कैडेट्स के लिए बिना लिखित परीक्षा भारतीय सेना में अधिकारी बनने का मौका

NCC
प्रतीकात्मक तस्वीर

राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी -NCC) विशेष एंट्री योजना के तहत भारतीय सेना में भर्ती के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 15 जुलाई है. इस योजना के तहत, भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए एनसीसी का हिस्सा रहे वही युवक और युवतियां पात्र होंगे जिन्होंने स्नातक (ग्रेजुएशन) में कम से कम 50 प्रतिशत अंक हासिल किये हों. एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम के तहत 50 पदों पर रिक्तियां हैं. इनमें से 50 पद पुरुषों के लिए और 5 महिलाओं के लिए हैं.

भारतीय सेना की तरफ से जारी की गई अधिसूचना के मुताबिक़ ये आवेदन एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम के 50 वें कोर्स के लिए है जो अक्टूबर 2021 में शुरू होगा. इस अधिसूचना में कहा गया है कि भारतीय सेना में शार्ट सर्विस कमीशन के लिए अविवाहित पुरुष और महिलाओं के लिए ये रिक्तियां हैं. युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के आश्रित भी इस योजना के लिए पात्रता रखते हैं. भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट https://joinindianarmy.nic.in के ज़रिये ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है और इस विषय से जुड़ी जानकारी भी यहाँ क्लिक करके ली जा सकती है.

इसमें वही युवक युवतियां आवेदन के लिए पात्र हैं जिनके पास ग्रेजुएट डिग्री होने के साथ साथ एनसीसी का “बी” ग्रेड का ‘सी’ सर्टिफिकेट (NCC का C certificate) और एसीसी में काम करने का 2 – 3 साल का अनुभव हो. आवेदक की उम्र 19 से 25 साल के बीच होनी चाहिए.

कश्मीर की तिरंगा क्रान्ति में सेना और सुरक्षा बलों की दृढ़ भूमिका

तिरंगा क्रान्ति
कश्मीर में तिरंगा

तीन दशक से भी ज्यादा अरसे से आतंकवाद का दंश झेल रहे जम्मू कश्मीर में ‘तिरंगा क्रान्ति’ का स्वरूप भले ही देखने-सुनने में एक छोटा प्रयास लगे लेकिन इसके कुछ पहलू अलगाववाद की भावना को ख़त्म करने और इस इलाके को सम्पूर्ण भारतीयता का लिबास पहनाने में अहम साबित हो सकते हैं. भारतीय थल सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी की पहल पर इसी साल शुरू हुई तिरंगा मुहिम में अब जहां दूसरे सुरक्षा बल भी दिलचस्पी लेने लगे हैं वहीं उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश के बाद नागरिक प्रशासन ने भी जगह जगह तिरंगा फहराने की प्रक्रिया शुरू की है. इसमें भी सेना सहयोग कर रही है.

तिरंगा क्रान्ति
जम्मू कश्मीर में तिरंगे के आर्टिस्ट

हालांकि शुरू शुरू में भले ही इसका विरोध करके इस मुद्दे पर विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई लेकिन सेना और सुरक्षा बलों की दृढ़ता ‘तिरंगा क्रान्ति’ के संचार में चुनौतियों का सामना करते करते अपना योगदान देने में मददगार साबित हो रही है. एक अधिकारी का तो स्पष्ट कहना है कि जो कोई इस मुहिम में रोड़ा अटकाने की कोशिश करेगा या राष्ट्र ध्वज का अपमान करेगा उससे कानूनन सख्ती से निपटा जाएगा.

अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करके उसे दो हिस्सों में तक़सीम करके उन्हें केंद्र शासित क्षेत्र शासित प्रान्तों में तब्दील किया गया था. इस फैसले के खासा अरसा बीतने के बाद जगह जगह भारत का राष्ट्रीय ध्वज लगाने की इस मुहिम के तहत जम्मू कश्मीर के पुराने सूबाई झंडे की भी रुखसती शुरू हुई. हालांकि इस ‘तिरंगा क्रांति’ के दौरान कई बार अफसोसनाक और अजीबो गरीब घटनाएं भी सामने आईं, खासतौर पर जब किसी नये स्थान पर पहली बार झंडा फहराया गया. जब मार्च 2021 में जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने मुख्य सरकारी इमारतों और जिला मुख्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के आदेश जारी किये तब ऐसी घटनाएं और दिखाई दीं.

तिरंगा क्रान्ति
डल झील के शिकारा पर फहराता तिरंगा.

तिरंगा फहराने के समारोह के दौरान, रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन…’ गाया जाता है लेकिन ऐसे मौके पर कुछ ऐसे लोग भी मौजूद होते थे जिन्हें न तो राष्ट्रगान आता था और कुछ में इसे गाने में भी हिचकिचाहट भी थी. कइयों को तो ये भी नहीं पता था राष्ट्रगान बजाते या गाए जाते वक्त ध्वज के सम्मान में किस तरीके से सावधान मुद्रा में खड़ा होना है.

सैन्य प्रशासन एक सोची समझी रणनीति के तहत, कश्मीर के आम जनमानस में तिरंगे को फहराते वक्त अपनाये जाने वाले तौर तरीकों के प्रति जागरूकता लाने में भी भूमिका अदा कर रहा है. उन्हें बताया जा रहा है कि झंडे की लम्बाई-चौड़ाई और आकार के साथ साथ सही रंग कौन से हैं. सरकारी कार्यक्रमों या कुछ ख़ास मौके पर तिरंगा फहराने या लगाने के आदेश के बाद तिरंगों की मांग भी होने लगी है.

तिरंगा क्रान्ति
कश्मीर में तिरंगा

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उन्हें इस काम में सहायता के लिए नागरिक प्रशासन से भी कभी कभार अनुरोध आता है जिसे सेना ख़ुशी ख़ुशी पूरा करती है. तिरंगों की मांग बढ़ने के बाद कुछ महिलाओं को कपड़े के तिरंगे सिलने का काम भी दिया गया है. सेना के ही एक अन्य अधिकारी का कहना था कि राष्ट्रीय ध्वज का जगह जगह दिखाई देना उन लोगों के मन में भारतीयता की भावना को न सिर्फ बढ़ावा देता है जो अब तक सूबाई झंडे को सर्वोपरि मानकर तिरंगे को अहमियत देते थे बल्कि अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली हवा को भी रोकता है. श्रीनगर का दिल कहलाने वाला लाल चौक हो या शानदार डल लेक के शिकारे से लेकर ज़िला नगर परिषदों व नगर पालिकाओं के मुख्यालय तक में अब भारत का राष्ट्र ध्वज फहरता दिखाई देने लगा है.

एक अन्य अधिकारी का तो यहाँ तक मानना है कि ये उन तत्वों के लिए भी सबक है जो पाकिस्तान के समर्थन में या कथित आज़ादी के बहाने से अलगाव की कुभावना को बढ़ाने या पैदा करने की कोशिश करते रहते हैं क्यूंकि उनके बहकावे में आये लोगों के जेहन में ये बात अब धीरे धीरे घर करने लगी है कि वे और उनकी भूमि भारत का ही एक हिस्सा हैं. उनमें ये बदलाव अपनत्व को बढ़ावा देगा और नये निज़ाम को कबूल करने में मदद करेगा.

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